गणतंत्र दिवस परेड में जब बमवर्षक विमानों ने दी थी पहली सलामी

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- Author, नलिन चौहान
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
26 जनवरी 1950 को पहले गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम नई दिल्ली के इरविन स्टेडियम (अब नेशनल स्टेडियम) में हुआ था.
इस अवसर पर दोपहर 3.45 बजे में हुई समारोह परेड में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के तिरंगा फ़हराने के साथ भारतीय वायुसेना के 'लिबरेटर' नामक बमवर्षक विमानों ने सलामी उड़ान (फ्लाई पोस्ट) भरी थी.
उल्लेखनीय है कि जनवरी 1950 में भारत ने एक गणराज्य बनने के बाद भारतीय वायु सेना के नाम के आगे लगे 'रॉयल' शब्द को हटा दिया था.
परेड समारोह कार्यक्रम में झंडारोहण के समय ही, सलामी उड़ान वाले विमानों के स्टेडियम के ठीक ऊपर से उड़ान भरने के तालमेल को सुनिश्चित करने के लिए ज़मीन पर दृश्य-नियंत्रण की सुविधा से लैस एक कार स्टेडियम में खड़ी की गई थी.
इस कार में तैनात सैनिक लिबरेटर विमानों के बेड़े के कमांडर से सीधे रेडियो संपर्क में थे.
उल्लेखनीय है कि तब विंग कंमाडर एच.एस.आर. गुहेल के नेतृत्व में चार 'लिबरेटर' विमानों ने इरविन स्टेडियम के ऊपर से आकाश में भारतीय राष्ट्रपति के लिए सलामी उड़ान भरी थी.

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विमानों के फ़ॉर्मेशन पर था प्रतिबंध
यह इस बात के बावजूद हुआ था कि भारत में क़स्बों और शहरों के ऊपर से विमानों के एक समूह (फ़ॉर्मेशन) के रूप में उड़ान भरने पर प्रतिबंध था. जबकि रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स के कमांडर इन चीफ़ और चीफ़ ऑफ़ एयर स्टाफ़ एयर मार्शल सर थॉमस एलमर्हिस्ट ने इस विशिष्ट समारोह और उसमें भी देश की सशस्त्र सेनाओं की व्यापक भागीदारी तथा वायु सेना के महत्वपूर्ण स्थान को ध्यान में रखते हुए इसकी अनुमति दी थी.
परेड कमांडर ब्रिगेडियर जे.एस. ढिल्लन के नेतृत्व में क़रीब तीन हज़ार सैन्य और पुलिस अफ़सर-जवान इस समारोह में शामिल हुए थे.
इसमें नीली वर्दी पहने भारतीय वायु सेना के 240 वायु सैनिक भी थे. इसमें कमान एयर हेडक्वॉर्टर टुकड़ी स्क्वॉड्रन लीडर वी.एम. राधाकृष्णन और ऑपरेशन कमान टुकड़ी का नेतृत्व स्क्वॉड्रन लीडर जे.एफ़. शुक्ल ने किया था.
वर्ष 1948 में रॉयल इंडियन एयरफ़ोर्स ने अपनी बम गिराने की हवाई क्षमता को विकसित करने के उद्देश्य से कानपुर डिपो की देखभाल और रखरखाव इकाई में अमरीकी वायुसेना के जंग खा रहे क़रीब 100 बी-24 श्रेणी के 'लिबरेटर' लड़ाकू विमानों को नए सिरे से सुधारकर बनाने के लिए हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से संपर्क किया था.
अमरीकी और अंग्रेज़ सलाहकारों को बदलाव की इस योजना की व्यावहारिकता पर संदेह था.

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बुलडोज़र से विमान तोड़े गए
उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कानपुर के चकेरी हवाई पट्टी के स्क्रैप यार्ड में अच्छी-खासी संख्या में बी-24 लिबरेटर लावारिस खड़े थे.
पूर्व रॉयल एयर फ़ोर्स (आरएएफ़) को ये विमान अमरीकी वायु सेना से एक अनुबंध के आधार पर मिले थे. इस कारण आरएएफ़ इन विमानों को किसी दूसरे देश को नहीं दे सकती थी. ऐसे में, दूसरे विश्व युद्ध के बाद आरएएफ़ ने इन विमानों को नष्ट करने की नीति अपनाई.
इस नीति के तहत बुलडोज़र और ट्रकों से विमानों के ढांचों को टक्कर मारकर बेकार किया गया. विमान के उपकरणों को तोड़कर इंजनों में रेत डाल दी गई. लेकिन स्वदेश लौटने की जल्दी में आरएएफ़ के वायुसैनिक इन विमानों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाए. यही बात भारतीय वायु सेना के लिए वरदान साबित हुई.
भारतीय वायुसेना के अधिकारियों के लिए लावारिस छोड़े गए 'लिबरेटर' विमान बमवर्षक के रूप में बदलने की कसरत में मुफ़ीद साबित हुए. बस इसके लिए विशेषज्ञता की ज़रूरत थी.

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विमान सुधारने का ज़िम्मा एचएएल को
भारतीय वायु सेना के लिए इस विशेषज्ञता की ज़रूरत को पूरा किया, तब के एक बड़े विमान सेवा संगठन, हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड (एचएएल) ने. अब यह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नाम से एक विमान डिज़ाइन और निर्माण कंपनी है.
एचएएल ने तमाम संदेहों को परे रखते हुए इस योजना पर काम आरंभ किया. एचएएल की मेहनत का परिणाम नवंबर 1948 में छह नए सिरे से तैयार बी-24 विमानों के रूप में सामने आया.
17 नवंबर 1948 को इन भारी बमवर्षक विमानों के साथ भारतीय वायु सेना की पांचवीं स्क्वॉड्रन गठित हुई.
इसके बाद, 1950 के आरंभ में पुणे में छठी स्क्वॉड्रन को नए सिरे से बनाया गया, जिसमें बी-24 श्रेणी के विमान शामिल थे. जबकि इसी श्रेणी के विमानों का प्रशिक्षण देने के लिए 16 नंबर की स्क्वॉड्रन की स्थापना की गई.
देश की आज़ादी के समय भारतीय वायु सेना के बी-24 बमवर्षक विमानों की एक स्क्वॉड्रन पालम, दिल्ली में तैनात थी.
भारतीय वायु सेना के इतिहास को प्रदर्शित करने वाले दिल्ली के वायु सेना संग्रहालय में इस बमवर्षक बी-24 'लिबरेटर' को आज भी देखा जा सकता है.
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