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CAA: क्या यूपी में मुसलमानों को जानबूझकर निशाना बनाया गया?
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला संवाददाता
देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों की एक संयुक्त फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर ग़रीब मुसलनमानों की सोच समझकर हत्या करने का आरोप लगाया है.
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, आईआईटी इंदौर, भारतीय जन संचार संस्थान समेत लगभग 30 शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों वाली यह कमेटी ने बीते हफ़्ते उत्तर प्रदेश के 15 जगहों का दौरा करके यह रिपोर्ट पेश किया है.
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ भारत भर में जितने भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं, उसमें सबसे ज़्यादा 23 लोगों की जानें उत्तर प्रदेश में ही गई हैं.
इस रिपोर्ट को जारी करते हुए छात्रों की फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश में जानबूझकर ग़रीब मुसलमानों को निशाना बनाया है और मरने वाले लोगों में से कई नाबालिग थे. रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां चल रही हैं और लोग डरे हुए हैं.
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 19 दिसंबर 2019 को कहा था कि उपद्रवियों से बदला लिया जाएगा.
फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी से जुड़े छात्रों का यह दावा है कि इसके अगले दिन से उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुस्लिम प्रदर्शनकारियों को चुन-चुन कर निशाना बनाना शुरू कर दिया था.
बीबीसी ने फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी की इस रिपोर्ट पर उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों से प्रतिक्रिया जानने की कई कोशिशें की लेकिन इन अधिकारियों ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
क्या है फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम का दावा?
मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर और अलीगढ़ गई छात्रों की टीम में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा थृति दास भी शामिल थीं.
थृति ने बीबीसी को बताया, "फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी की चार टीमें उत्तर प्रदेश में 15 जगहों पर गईं. सभी टीमें जिस नतीज़े पर पहुंचे, उसमें इन हमलों में एक तरह का पैटर्न देखा गया. तकरीबन सभी हमले 20 दिसंबर को हुए थे. वो जुमे का दिन था. इससे ठीक एक दिन पहले मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को चेताया था. ये हमले शाम तीन से चार बजे के बीच हुए थे. लोग उस वक़्त दोपहर की नमाज पढ़कर मस्जिद से बाहर निकल रहे थे. कुछ जगहों पर रैली या फिर शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन की तैयारी चल रही थी."
"पुलिस ने उस वक़्त उन्हें रोका और बैठने के लिए कहा. इसके बाद ही बिना किसी उकसावे के लाठी चार्ज शुरू कर दिया गया. पुलिस का दावा है कि उन्होंने कोई फ़ायरिंग नहीं की लेकिन हमारे पास जो वीडियो हैं, उसमें वे साफ़-साफ़ गोली चलाते हुए दिख रहे हैं. हम ये भरोसे से कह सकते हैं कि पुलिस ने मुसलमानों को निशाना बनाकर गोली चलाई. मारे गए और घायल हुए लोग ग़रीब मुस्लिम मोहल्लों के रहने वाले थे और ये रोज़ की मजदूरी करने वाले लोग थे."
'आनन फ़ानन में लाशें दफ़्न कराई गईं'
बिजनौर, कानपुर और लखनऊ जाने वाली टीम में भारतीय जनसंचार संस्थान के छात्र आकाश भी थे.
आकाश ने बीबीसी को बताया, "पुलिस ने जहां भी फ़ायरिंग की थी, वहां कहीं भी कमर के नीचे गोलियां नहीं चलाई गई थी. लोगों के पेट, सिर और सीने को निशाना बनाया गया था. हर जगह बीजेपी के स्थानीय नेता पुलिस के साथ थे. पुलिस ने जिस तरह से लोगों को डराया कि घायल लोग सरकारी अस्पताल इलाज के लिए जाने से डर रहे थे. उन्हें डर था कि कहीं कुर्की का नोटिस न आ जाए."
पुलिस ने बहुत सारी जगहों पर मारे गए लोगों के परिवार वालों को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अभी तक मुहैया नहीं कराया है.
कई जगहों पर ऐसा भी हुआ है कि लोगों को घरवालों की लाश दफ़्न करने के लिए पुलिस ने निर्देश दिए. उन्हें जगह बताई गई और इसके लिए सिर्फ़ एक घंटे का समय दिया गया.
पुलिस की तरफ़ से ये कार्रवाई अभी भी चल रही है और रात को पुलिस मुसलमान मोहल्ले में दबिश दे रही है.
फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी की एक अन्य सदस्य अनन्या ने बताया, "जब लोगों के घरों पर हमने खटखटाया तो वे दरवाज़ा खोलने से भी डर रहे थे. पुलिस आज भी आधी रात को छत से आ कर या जोर जोर से दरवाज़ा खटखटा कर मुसलमानों के घरों में दबिश दे रही है. चैन से सोने तक नहीं दे रहे."
पुलिस क्या कहती रही है?
इस हिंसा में सिर्फ़ मेरठ के ही पाँच लोगों की सीधे गोली लगने से मौत हुई थी.
बीबीसी ने इसके बाद अपनी फ़ैक्ट चेक टीम को मेरठ भेजा. वहां उसे पता चला कि मौत के 18 दिनों के बाद भी न तो इन परिवारों को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मिली है और न ही कोई एफ़आईआर ही दर्ज हुई थी.
बीबीसी की फ़ैक्ट चेक टीम ने जब इसकी पड़ताल की तो मेरठ के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार ने बीबीसी से कहा, "पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट लेने की एक प्रक्रिया होती है. एक साधारण फ़ीस भरकर लोग पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पा सकते हैं. रोका नहीं जा रहा. रह गई बात एफ़आईआर की तो अगर कोई एफ़आईआर दर्ज कराएगा तो ज़रूर एफ़आईआर दर्ज कराई जाएगी."
पुलिस ने गोली नहीं चलाई?
मेरठ के एडीजी ने हमें बताया कि इस हिंसा में पुलिस ने गोली ही नहीं चलाई. जो भी मौतें हुईं वो प्रदर्शनकारियों की गोलियों से ही हुईं.
उन्होंने कहा, ''जहां भी मौतें हुई हैं, वहां पुलिस ने बंदूक़ का इस्तेमाल ही नहीं किया. पुलिस का अब तक कोई ऐसा वीडियो नहीं है, जिसमें वो बंदूक़ चलाती नज़र आ रही है. पुलिस ने आंसू गैस, रबर बुलेट और लाठी चार्ज किया, लेकिन फ़ायरिंग नहीं की. पुलिस ज़रूरत पड़ने पर बल का इस्तेमाल कर सकती है तो अगर हम ऐसा कुछ करेंगे तो उसे मानेंगे भी लेकिन ऐसा पुलिस की ओर से ऐसा नहीं किया गया."
वे कहते हैं कि, "पश्चिमी यूपी में जब भी कोई तनाव होता है तो वह महीनों तक चलता है और संप्रदायिक हिंसा होते देर नहीं लगती. पुलिस ने तो इस पूरे मामले को तीन घंटे में कंट्रोल कर लिया.''
वहीं मेरठ के एसपी सिटी अखिलेश नारायण सिंह ने बीबीसी के कैमरे पर क़बूला कि 20 दिसंबर को हुई हिंसा में पुलिस ने गोलियां चलाई लेकिन सिर्फ़ हवाई फ़ायरिंग की गई.
फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम जब इस रिपोर्ट को जारी कर रही थी तो वहां जानी मानी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पामेला फ़िलिपोस मौजूद थीं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुख्यधारा की मीडिया इस मसले पर पूरी तरह खामोश है, फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी से जुड़े इन छात्रों ने देश के हित में काम किया है."
"इन्होंने यह दिखाया कि किस तरह उत्तर प्रदेश को कसाईख़ाना बनाया जा रहा है. वहां मुस्लिम आबादी निशाने पर है और विरोध प्रदर्शन कुचले जा रहे हैं."
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