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क्या पहले से 'सख़्त' हो गए हैं भारत के राष्ट्रपति?
- Author, अरविंद छाबड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आधिकारिक आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि मृत्युदंड को चुनौती देने वाली दया याचिकाओं से निपटने में भारत के राष्ट्रपति पहले की तुलना में ज़्यादा सख़्ती बरतने लगे हैं.
पिछले हफ़्ते ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने साल 2012 के बहुचर्चित गैंगरेप केस के मुख्य अभियुक्तों में से एक मुकेश सिंह की दया याचिका को ख़ारिज कर दिया था.
इसके मद्देनज़र हमने यह जानने की कोशिश की है कि पिछले कुछ वर्षों में दया याचिकाओं पर किस तरह से निर्णय लिए गए हैं.
सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है कि वर्ष 2013 के बाद से, भारत के राष्ट्रपति ने सिर्फ़ तीन मामलों में ही मृत्युदंड पर रोक लगाई है, जबकि 32 याचिकाओं को ठुकरा दिया.
इसके ठीक विपरीत, वर्ष 2000 से 2012 के बीच भारत के राष्ट्रपतियों ने 44 लोगों की (26 मामलों में) दया याचिकाओं पर निर्णय लिया और इनमें से महज़ चार को ही ख़ारिज किया गया.
यानी 40 व्यक्तियों की मौत की सज़ा को आजीवन कारावास की सज़ा में बदल दिया गया था.
सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि भारत के राष्ट्रपति वर्ष 2009 से 2012 के बीच सबसे अधिक 'दयालु' रहे.
इस दौरान देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भारत की राष्ट्रपति थीं. वे जुलाई 2007 से जुलाई 2012 तक राष्ट्रपति पद पर रहीं.
जुलाई 2012 में प्रणब मुखर्जी और जुलाई 2017 में मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पदभार संभाला था.
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, "भारत के राष्ट्रपति ने जिन 60 दया याचिकाओं पर निर्णय लिए हैं, उनमें से 24 की सज़ा को आजीवन कारावास की सज़ा में बदल दिया गया."
राष्ट्रपति की ताक़त
संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार भारत के राष्ट्रपति किसी की दया याचिका पर विचार करने के बाद उसे क्षमादान दे सकते हैं, मौत की सज़ा को निलंबित कर सकते हैं और उसे रोक सकते हैं.
क़ानून के मुताबिक़ एक बार जब किसी व्यक्ति को उच्चतम न्यायालय दोषी ठहराते हुए उसे मौत की सज़ा सुना देता है, तो दोषी से संबंधित कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति कार्यालय या गृह मंत्रालय में दया याचिका दायर कर सकता है.
दया याचिका संबंधित राज्य के राज्यपाल को भी भेजी जा सकती है जो आगे की कार्रवाई के लिए इसे गृह मंत्रालय को भेजते हैं.
जेल में क़ैद दोषी भी जेल के अधिकारियों, अपने वकील या परिवार के माध्यम से दया याचिका दायर कर सकता है.
क़ानून के हिसाब से इन मामलों में गृह मंत्रालय के विचार बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि जब कोई दया याचिका राष्ट्रपति के पास पहुँचती है तो उस पर गृह मंत्रालय का दृष्टिकोण लिखित रूप में रहता है और उसी के अनुसार दया याचिका पर राष्ट्रपति निर्णय लेते हैं.
गृह मंत्रालय के दृष्टिकोण को ही मंत्रिमंडल का नज़रिया माना जाता है और राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्री परिषद की सलाह पर कार्य करते हैं.
सबसे तेज़ फ़ैसला
मुकेश सिंह की दया याचिका पर राष्ट्रपति का फ़ैसला, अब तक का सबसे जल्दी लिया गया फ़ैसला है. राष्ट्रपति कोविंद ने एक ही दिन में अपना निर्णय लिया.
राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय से दलीलें मिलने के कुछ ही घंटों में राष्ट्रपति कोविंद ने मुकेश सिंह की याचिका खारिज कर दी थी.
ऐसा कोई पुराना उदाहरण भारत में नहीं मिलता क्योंकि पूर्व में राष्ट्रपति को निर्णय लेने में कई-कई साल लग जाते थे और ऐसे मामलों में एक लंबा इंतज़ार, अख़बारों की सुर्खियाँ बटोरा करता था.
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले को ही लें, तो उनके हत्यारों ने क़रीब एक दशक तक दया याचिका पर राष्ट्रपति के फ़ैसले का इंतज़ार किया.
जब राष्ट्रपति ने कोई फ़ैसला नहीं सुनाया तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में यह गुहार लगानी पड़ी कि उनकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में ज़रूरत से ज़्यादा देर की जा रही है.
कोर्ट ने आख़िरकार साल 2012 में वी श्रीहरन उर्फ़ मुरुगन, टी सुतेन्द्र राज उर्फ़ संथान और एजी पेरारिवलन उर्फ़ अरिवू को मौत की सज़ा सुनाई.
तब कोर्ट ने यह भी कहा था कि "हम केंद्र सरकार को यह सलाह देते हैं कि वो राष्ट्रपति को उचित समय सीमा में अपना नज़रिया सौंपे ताकि वे दया याचिकाओं पर निर्णय ले सकें. हमें विश्वास है कि अब जो हो रहा है, उसकी तुलना में तब दया याचिकाओं पर बहुत तेजी से निर्णय लिए जा सकेंगे."
मुकेश सिंह की दया याचिका से पहले वर्ष 2018 में राष्ट्रपति कोविंद ने जगत राय की दया याचिका को ख़ारिज कर दिया था.
जगत राय को बिहार के एक गाँव में सोते समय एक महिला और पाँच बच्चों को आग लगाकर मारने का दोषी पाया गया था. यह घटना साल 2006 में हुई थी.
उनकी मौत की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में बरक़रार रखा था. राय ने जुलाई 2016 में दया याचिका दायर की थी जिस पर साल 2018 में राष्ट्रपति कोविंद ने फ़ैसला किया था.
वहीं साल 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चार लोगों की दया याचिका पर फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदला था.
ये बिहार में 1992 में अगड़ी जाति के 34 लोगों की हत्या के मामले में दोषी थे. राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने कृष्णा मोची, नन्हे लाल मोची, वीर कुँवर पासवान और धर्मेन्द्र सिंह उर्फ़ धारू सिंह की फांसी की सजा को आजीवन कारावास की सजा में तब्दील कर दिया था.
गृह मंत्रालय के अनुसार, यह आख़िरी मौक़ा था जब मृत्युदंड पर रोक लगाई गई थी.
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