You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सेक्स के मामले में विश्वगुरु था प्राचीन भारत
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'कामसूत्र' के रचयिता वात्स्यायन से कई सौ साल पहले यूनानी साहित्य में काम की अवधारणा पर व्यापक चर्चा हुई थी. प्लेटो का मानना था कि 'काम किसी पर अधिकार जमाने की आकांक्षा है'.
'सिम्पोज़ियम' में यूनानी नाटककार अरिस्टोफ़ैंस ने भी एक ऐसे समय का ज़िक्र किया था जब मानव अपने आप में परिपूर्ण हुआ करता था और उसे किसी दूसरे की ज़रूरत नहीं पड़ती थी.
नतीजा ये हुआ कि वो बहुत शक्तिशाली हो गया और देवताओं तक को चुनौती देने लगा. लेकिन देवताओं के राजा ज़ायस ने इससे निपटने का एक तरीक़ा निकाला और मानव को पुरुष और स्त्री दो भागों में बाँट दिया.
जिसका नतीजा ये हुआ कि मानव सीधा खड़ा होने लगा, दो पैरों पर चलने लगा और ऐसा लगने लगा कि उसके सामने के अंग विभाजित हो गए.
बकौल प्लेटो हमारी अपूर्णता ने हमें दूसरे भाग की चाहत के लिए मजबूर किया. प्लेटो सेक्स की पूर्णता की माँग के तौर पर व्याख्या करते हैं. हम हर उस चीज़ से प्यार करते हैं जो हमारी अपनी नहीं है. लेकिन फिर एक ऐसा समय भी आया जब सेक्स के बारे में कहा जाने लगा कि ये बेकार की चीज़ है. सेक्स गंदा है और इसे करना पाप है.
325 ईस्वी में कैथलिक चर्च ने जब अपने क़ायदे क़ानून बनाए तो उसमें साफ़ कहा गया कि 'शरीर एक ख़राब चीज़ है. शारीरिक सुख फ़िज़ूल है और इसको पाने की इच्छा रखना पाप है.'
उनका मानना था कि सेक्स का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ़ संतान को जन्म देना है. लेकिन लगभग उसी समय वात्स्यायन गंगा के तट पर बैठ कर कामसूत्र लिख रहे थे और बता रहे थे कि वास्तव में यौनिक आनंद बहुत अच्छी चीज़ है और इसे किस तरह और बढ़ाया जा सकता है.
सेक्स में खुलापन
प्राचीन भारतीय वास्तुकला में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो बताते हैं कि प्राचीन समय में सेक्स के बारे में लोगों की सोच कितनी खुली हुई थी. ओडीशा के कोणार्क के सूर्य मंदिर को ही लें जहाँ तराशी हुई नग्न मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं.
इसी तरह बौद्ध धर्म से जुड़ी अजंता और एलोरा की गुफ़ाओं में भी युवतियों की नग्न मूर्तियां दिखाई देती हैं. अजंता के गुफ़ा चित्र ईसा से दो सदी पहले बनाए गए थे. वहीं एलोरा की कलाकृतियां पांचवीं से दसवीं सदी के बीच की बताई जाती हैं.
भारत में सेक्स का खुला चित्रण मध्य प्रदेश के खजुराहो के मंदिरों में भी देखने को मिलता है. ये मंदिर क़रीब एक हज़ार साल पुराने हैं. इन्हें चंदेल राजाओं ने 950 से 1050 ईस्वी के बीच बनवाया था. उस दौरान कुल 85 मंदिर बनाए गए थे. लेकिन आज इनमें से सिर्फ़ 22 ही बचे हैं.
यूनेस्को ने इन्हें 1986 में विश्व की धरोहर घोषित किया था. इन मंदिरों में यौन संबंधों का हर रूप देखने को मिलता है. दीवारों पर हर सेक्स आसन को चित्रित किया गया है. यहां पर तीन लोग एक साथ यौन संबंध बनाते हुए देखे जा सकते हैं.
एक अनोखी बात यह है कि भारत में जहां समलैंगिकता अभी तक क़ानूनन अपराध था उसी देश के प्राचीन मंदिर में समलैंगिकता को मूर्तियों के द्वारा समझाया गया है.
13 वीं सदी में माउंट आबू के पास बनवाए गए दिलवाड़ा मंदिरों में भी अंतरंग दृश्यों को संगमरमर में उकेरा गया है.
समलैंगिकता की स्वीकार्यता
वैसे समलैंगिकता दुनिया के दूसरे देशों में अपनी पहचान के लिए लड़ती रही लेकिन प्राचीन भारत में इसे सामाजिक मान्यता प्रदान की गई.
अमर दास विल्हेम की किताब 'तृतिया- प्रकृति : पीपुल ऑफ़ द थर्ड सेक्स: अंडरस्टैंडिंग होमोसेक्शुएलिटी, ट्रांसजेंडर आइडेंटिटी थ्रू हिंदुइज़्म' में मध्यकालीन और संस्कृत ग्रंथों के शोध के बाद साबित किया गया है कि समलैंगिकता और 'तीसरा लिंग' भारतीय समाज में हमेशा मौजूद था.
इस पुस्तक में कामसूत्र को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि एक ज़माने में महिला समलैंगिकों को 'स्वारानी' कहा जाता था. ये महिलाएं दूसरी महिलाओं से शादी करती थीं. उन्हें 'थर्ड जेंडर' और सामान्य समाज के बीच आसानी से स्वीकार किया गया था.
इसी किताब में समलैंगिक पुरुषों को 'क्लीव' का नाम दिया गया है. उन्हें नपुंसक पुरुष कहा गया है जो अपनी समलैंगिक प्रवृत्ति के कारण महिलाओं में रुचि नहीं रखते थे.
विवाहेत्तर संबंधों की बात
प्राचीन भारत में स्त्री या पुरुष का किसी अन्य स्त्री या पुरुष से विवाहेत्तर संबंध बनाना भी अपराध नहीं होता था और इसको सामाजिक मान्यता मिली हुई थी.
राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन इस बात की मिसाल है कि समाज में बहुत खुलापन था, और प्रेम को शर्म से नहीं जोड़ा जाता था. सूरदास के शब्दों में -
"अपनी भुजा स्याम भुज ऊपरि स्याम भुजा अपने उर धरिया।
यों लपटाइ रहे उर-उर ज्यों, मरकत मणि कंचन में जरिया"।
विद्यापति ने भी राधा के सौन्दर्य का वर्णन करते समय अपना हृदय उड़ेल दिया है, वे राधा को एक सामान्य नायिका की तरह चित्रित करते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि राधा-कृष्ण पूज्य हैं, आराध्य हैं. उनके काव्य में राधा कहती हैं--
"हँसि हँसि पहु आलिंगन देल
मनमथ अंकुर कुसुमित भेल
जब निवि बन्ध खसाओल कान
तोहर सपथ हम किछु जदि जान."
कृष्ण के साथ कहीं भी उनकी पत्नियों की तस्वीर या मूर्ति नहीं मिलती. हर जगह कृष्ण के साथ राधा ही नज़र आती हैं, यह समाज में प्रेम की स्वीकृति का उदाहरण है.
ज़मीन-आसमान का अंतर
वैसे तो प्राचीन भारत में सेक्स पर कई ग्रंथ लिखे गए लेकिन कामसूत्र ने पहली बार इस मिथक को तोड़ा कि सेक्स में नारी का आनंद उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना पुरुष का.
पहले ये धारणा थी कि महिला को अपने चरम सुख यानी 'ऑर्गाज़्म' के लिए पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है. वात्स्यायन ने पहली बार कामसूत्र में बताया कि महिलाओं के चरम सुख के लिए पुरुषों का होना तक ज़रूरी नहीं है.
एक प्रेमी के रूप में भी मर्द और औरत में बहुत फ़र्क होता है और उनकी यौनिकता यानि 'सेक्शुएलिटी' के स्रोत में भी ज़मीन आसमान का अंतर होता है.
वात्स्यानन कहते हैं, 'पुरुष की सेक्स इच्छाएं आग की तरह हैं जो उसके जननाँगों से उठ कर उसके मस्तिष्क की तरफ़ जाती है. आग की तरह वो बहुत आसानी से भड़क उठते हैं और उतनी ही आसानी से बुझ भी जाते हैं. इसके विपरीत औरत की सेक्स इच्छाएं पानी की तरह हैं जो उसके सिर से शुरू हो कर नीचे की तरफ़ जाती हैं. उनको जगाने में पुरुषों की अपेक्षा अधिक समय लगता है.'
(इलेस्ट्रेशन - पुनीत बरनाला, प्रोड्यूसर सुशीला सिंह)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)