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यूपी सरकार ने 3 दिन में की 32,000 शरणार्थियों की पहचान
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
नागरिकता क़ानून लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है जिसने नागरिकता देने के लिए पड़ोसी देशों से आए ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों की पहचान का काम शुरू कर दिया.
महज़ तीन दिन के भीतर उत्तर प्रदेश सरकार ने बत्तीस हज़ार से ज़्यादा ऐसे शरणार्थियों की पहचान भी कर ली गई है.
उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जिसने पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए वहां के अल्पसंख्यक प्रवासियों की जानकारी गृह मंत्रालय को भेजी है.
राज्य सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा ने बीबीसी को बताया, "सरकार की ओर से अख़बारों में विज्ञापन भी दिए जा रहे हैं ताकि इस बारे में जानकारी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे. अभी 21 ज़िलों की रिपोर्ट मिली है और ऐसे लोगों की संख्या क़रीब 32 हज़ार है. लेकिन ये संख्या इससे कहीं ज़्यादा है."
बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून के लागू होने से पहले ही इस दिशा में जानकारी लेनी शुरू कर दी थी. यही वजह है कि तीन दिन के भीतर इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों की जानकारी जुटा ली गई है.
अब तक 21 ज़िलों के शरणार्थियों की सूची जुटाई गई है जिसमें सबसे ज़्यादा शरणार्थी पीलीभीत ज़िले से हैं. हालांकि पीलीभीत के ज़िलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव का कहना है कि अकेले उनके ज़िले में ही यह संख्या पैंतीस हज़ार से ज़्यादा है.
इसके अलावा आगरा, रायबरेली, सहारनपुर, गोरखपुर, अलीगढ़, रामपुर समेत राज्य के 21 ज़िलों से यह सूची तैयार की गई है.
कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा ने बताया कि सीएए लागू होने के बाद ज़िला प्रशासन ने राज्य के गृह विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय को सूची भेजी, ताकि इन्हें भारतीय नागरिकता दिलाई जा सके.
राज्य सरकार एक ओर जहां नागरिकता क़ानून को लेकर पूरे प्रदेश में जागरूकता अभियान चला रही है वहीं उन इलाकों में विशेष तौर पर इस क़ानून के बारे में जानकारी देने वाले पर्चे भी सरकार की ओर से बंटवाए जा रहे हैं, ताकि इस बारे में लोगों के भ्रम को दूर किया जा सके.
वहीं, नागरिक अधिकार मंच नामक एक संस्था ने कई शहरों से शरणार्थियों की एक सूची उनकी पृष्ठभूमि के साथ प्रकाशित की है.
संस्था ने इन शरणार्थियों की कहानियों और उनकी आपबीती को एक किताब की शक्ल दी गई है.
इस किताब का शीर्षक है- 'यूपी में आए पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के शरणार्थियों की आपबीती की कहानी'.
इस रिपोर्ट में हर शरणार्थी परिवार के साथ पड़ोसी देशों में हुए कथित दुर्व्यवहार और वहां की जिंदगी का ब्यौरा दर्ज है.
बताया जा रहा है कि राज्य सरकार भी इस पुस्तिका में छपे लोगों की कहानी जानने के बाद उसी के आधार पर उन्हें नागरिकता देने की पहल कर रही है.
हालांकि सरकारी स्तर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है लेकिन बताया यही जा रहा है कि सरकार ने भी इस मामले में तेज़ी दिखानी शुरू कर दी है और जल्द से जल्द सभी ज़िलों से रिपोर्ट मंगा ली जाएगी.
जानकारों के मुताबिक, सीएए लागू करने के बाद उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने सभी ज़िलाधिकारियों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थियों की पहचान करने के लिए कहा था. सरकार को अलग-अलग जिलों से सूची मिलने का सिलसिला जारी है. ऐसे में इन शरणार्थियों की संख्या में इजाफा संभव है.
शरणार्थियों की सबसे ज़्यादा संख्या पीलीभीत ज़िले में बताई जा रही है जहां बांग्लादेश से आए बड़ी संख्या में शरणार्थी रह रहे हैं और उन्हें कई साल से नागरिकता की तलाश है.
पीलीभीत के ज़िलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव के मुताबिक, यह संख्या 37 हज़ार से भी ज़्यादा है. वैभव श्रीवास्तव ने स्थानीय मीडिया को बताया, "शुरुआती जांच से पता चला है कि ये लोग अपने देश में अत्याचार का शिकार होने की वजह से पीलीभीत आकर बसे थे."
हालांकि इस बात को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं कि महज़ तीन दिन के भीतर इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों को कैसे पहचान लिया गया और आंकड़ों में इतना फ़र्क कैसे आ गया.
लेकिन इस बात का जवाब मंत्री ने ये कहकर दिया कि ये आंकड़े अंतिम नहीं हैं, बल्कि इनकी संख्या बढ़ सकती है.
वहीं, जो लोग लंबे समय से शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं उनके भीतर इस क़ानून की बदौलत नागरिकता पाने की उम्मीद भी जगी है.
बांग्लादेश से आए ऐसे ही एक व्यक्ति बताते हैं कि उनका परिवार साठ के दशक से पूर्वी पाकिस्तान से आया था जो अब बांग्लादेश बन गया है.
यह परिवार महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में कुछ समय तक भटकने के बाद अस्सी के दशक में पीलीभीत आकर बस गए थे. पीलीभीत के अलावा मुज़फ़्फ़रनगर में भी ऐसे शरणार्थियों की तादाद काफ़ी ज़्यादा है.
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ पिछले दिनों सबसे ज़्यादा हिंसक प्रदर्शन उत्तर प्रदेश में ही हुए थे जिनमें कम से कम 21 लोगों की मौत हुई थी.
हालांकि पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने साफ़ तौर पर कहा था कि यह क़ानून वापस नहीं लिया जाएगा.
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