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शाहीन बाग़ धरने से किन लोगों को हो रही है परेशानी
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को शाहीन बाग़ में सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ़ जारी विरोध की वजह से बंद कालिंदी-कुंज रोड को खुलवाने के लिए दायर जनहित याचिका की सुनवाई की है.
अदालत ने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया है कि वह क़ानून के दायरे में रहते हुए जनहित में कार्रवाई करे.
दिल्ली पुलिस ने शाहीन बाग़ इलाके में बीते एक महीने से जारी विरोध प्रदर्शन की वजह से इस रोड को बंद किया हुआ है.
विरोध शुरू होने के बाद से यहां बाज़ार बंद हैं.
कौन लोग हैं परेशान?
रोड बंद होने की वजह से नौकरी करने वाले लोगों और बच्चों को जाम समेत तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.
बीबीसी ने इसे समझने के लिए दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों से नोएडा पहुंचने वाले लोगों से बात की है.
इस दौरान हमारी मुलाक़ात शारदा यूनिवर्सिटी में काम करने वाले लैब टेक्नीशियन जितेंद्र से हुई.
जितेंद्र गोविंदपुरी में रहते हैं और हर रोज़ शाहीन बाग़ होते हुए कालिंदी कुंज के रास्ते से ग्रेटर नोएडा पहुंचते थे.
गोविंदपुरी से शारदा यूनिवर्सिटी के बीच सिर्फ़ 30 किलोमीटर का फ़ासला है.
लेकिन कालिंदी कुंज का रास्ता बंद होने की वजह से ये फ़ासला बढ़कर पचास किलोमीटर हो जाता है.
जितेंद्र कहते हैं, "जब से शाहीन बाग़ का प्रोटेस्ट शुरू हुआ है, तब से हाल बहुत ख़राब है. सुबह छह बजे घर से निकलकर शाम 9 बजे तक की छुट्टी हो जाती है. पहले तो लगा कि कुछ दिन की बात है, लेकिन अब तो एक महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है."
जितेंद्र बताते हैं, "पहले ऑफिस पहुंचने में सिर्फ़ 50 मिनट लगते थे. आजकल हर रोज़ सुबह छह बजे घर से निकलता हूं, डेढ़ किलोमीटर पैदल चलता हूं, फिर सब करम हो जाते हैं. ऑटो, रिक्शॉ, बस, मेट्रो और आख़िर में बस लेकर किसी तरह सवा नौ बजे तक अपने ऑफ़िस पहुंचता हूं. इतनी जल्दी निकलने के बाद भी 45 मिनट लेट से ऑफ़िस पहुंचता हूं. और हाफ़ डे लग जाती है."
गोविंदपुरी की तरह सरिता विहार, लाजपतनगर, और ओखला जैसे इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए ये प्रोटेस्ट एक समस्या खड़ी करता हुआ दिख रहा है.
जितेंद्र जैसे कई अन्य लोगों ने सोशल मीडिया पर इस मसले पर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया है.
ट्विटर यूज़र मंशुल लिखते हैं, "डेढ़ महीने बीत चुके हैं. और सीएए डिबेट को लेकर सरकार की ओर से कोई क़दम नहीं उठाया गया है. नोएडा जाने वाली जामिया मिलिया रोड अभी भी बंद है. गुड़गांव/दिल्ली से नोएडा आने वाले लोगों को डीएनडी से आना पड़ रहा है. पुलिस की ओर से किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है. और लोगों को डीएनडी पर घंटों गुज़ारने पड़ रहे हैं."
फिक्की के पूर्व सहनिदेशक भाष्कर कानूनगो ट्विटर पर लिखते है, "बीते तीस मिनट में गाड़ियां तीन मीटर भी आगे नहीं बढ़ी हैं. डीजीपी यूपी कृपया एसएसपी नोएडा को डीएनडी फ़्लाइओवर के नोएडा गेट पर तैनात करें. बीस दिन से ज़्यादा हो चुके हैं. एसएसपी ऑफ़िस टोल बूथ पर भी ट्रैफ़िक संभालने में सक्षम नहीं है."
ट्विटर यूज़र अमन गोस्वामी लिखते हैं, "दिल्ली पुलिस आप लोग कर क्या रहे हैं? मुझे फ़रीदाबाद ऑफ़िस जाना होता है. रोज़ चार घंटे बर्बाद होते हैं. ऐसे ही मेक इन इंडिया बनेगा. अमित शाह जी आप हाथ पर हाथ रखकर बैठे हो. कुछ करो सर जी, आम लोग परेशान हो रहे हैं."
दिल्ली और गुड़गांव से नोएडा जाने वालों के साथ-साथ इस समस्या का असर ऑटो और रिक्शा चलाने वालों पर भी पड़ता दिख रहा है.
शाहीन बाग़ रोड पर सवारियों का इंतज़ार कर रहे ऑटो चलाने लोकनाथ बताते हैं, "सब परेशान हैं. जिसको नोएडा जाना होता है, वो डीएनडी या बदरपुर होकर जा रहा है. इतना लंबा रूट है कि पब्लिक परेशान हो रही है. जब से ये रोड बंद हुआ है तब से काम बिलकुल ख़त्म हो गया है. पहले तो ये होता था कि एक दिन में हज़ार-बारह सौ का काम हो जाता था. लेकिन अब हालत ये है कि दो - चार सौ का काम हो जाए तो बड़ी बात है."
व्यापार पर बुरा असर?
इस विरोध प्रदर्शन की वजह से इस क्षेत्र के व्यापार पर भी नकारात्मक असर पड़ा है.
विरोध प्रदर्शन की जगह के नज़दीक दुकान चलाने वाले तैयब बताते हैं, "आम दिनों में हर रोज़ एक शो रूम में तीस से चालीस हज़ार रुपये प्रतिदिन की बिक्री है. और यहां ऐसे सौ शोरूम हैं. ऐसे में अगर इस बाज़ार का कुल नुक़सान देखें तो प्रतिदिन का नुक़सान 35 से 40 लाख रुपये का है."
इस क्षेत्र में दुकान चलाने वाले और काम करने वाले इस पहलू पर खुलकर बात करने से बचते नज़र आए.
क्या कहते हैं प्रदर्शनकारी?
शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध करने के लिए एकजुट हुए लोग जाम की समस्या के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
शाहनी बाग़ में ही मौजूद एक सामाजिक कार्यकर्ता अनवर अली कहते हैं, "ये सही है कि लोगों को दिक्क़तें हो रही हैं. लेकिन हम आने वाले कल के लिए ये सब कर रहे हैं ताकि कल हमें ये न कह दिया जाए कि हम यहां के नहीं हैं."
एक अन्य शख़्स शाहनवाज़ बताते हैं, "यहां कुछ पुलिसकर्मी आए थे जिन्होंने आम लोगों को हो रही समस्याओं का हवाला देकर बगल वाला रास्ता खोलने की बात कही थी. लेकिन हम दिल्ली पुलिस से पहले भी मांग कर चुके हैं कि वे लिखित में ये ज़िम्मेदारी लें कि बगल वाली रोड खोलने पर किसी तरह की हिंसक घटना होने की ज़िम्मेदारी दिल्ली पुलिस लेगी. और अब तक ये लिखित नोट हमें अब तक नहीं मिला है."
क्या कर रही है दिल्ली पुलिस?
हाई कोर्ट के आदेश के बाद बीबीसी ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से बात करके ये समझने की कोशिश की है कि आख़िर अब दिल्ली पुलिस क्या कदम उठाएगी.
दिल्ली पुलिस के एडीशनल डीसीपी कुमार ज्ञानेश बताते हैं, "हमें अब तक कोर्ट का ऑर्डर नहीं मिला है. और आगे की कार्रवाई कोर्ट ऑर्डर के आधार पर ही तय की जाएगी."
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