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CAA: विपक्षी दलों की बैठक में क्या हुआ
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस के नेतृत्व में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ संसद परिसर में सोमवार को हुई विपक्षी दलों की बैठक में उन राज्यों में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर का काम रोकने का प्रस्ताव पारित हुआ जिनके मुख्यमंत्री सार्वजनिक तौर पर प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के ख़िलाफ़ बोल चुके हैं.
इस बैठक में बीस विपक्षी दल शामिल हुए. लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी इस बैठक में शामिल नहीं हुई. ये तीनों पार्टियां ही नागरिकता संसोधन क़ानून का विरोध कर रही हैं.
बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया, "सीएए, एनआरसी और एनपीआर एक असंवैधानिक पैकेज हैं, जो ख़ासतौर पर ग़रीबों, पिछड़ों, दलितों और भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है. एनपीआर ही एनआरसी का आधार है."
बीएसपी, एएपी और टीएमसी के अलावा डीएमके भी बैठक में शामिल नहीं हुई.
बैठक के बाद पारित प्रस्ताव में कहा गया कि, ''वो सभी मुख्यमंत्री जिन्होंने कहा कि वो अपने राज्यों में एनआरसी लागू नहीं करेंगे वो एनपीआर की प्रक्रिया निलंबित करें क्योंकि यही एनआरसी का आधार होगा.''
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पहले ही कह चुके हैं कि वो अपने राज्यों में एनपीआर का काम नहीं करेंगे. हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि ग़ैर भाजपा शासित राज्यों में ज़मीन पर एनपीआर का काम कैसे रोका जाएगा. कांग्रेस शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि वो एनआरसी और सीएए को अपने राज्यों में लागू नहीं करेंगे.
विपक्ष की बैठक के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को विश्वविद्यालयों में जाकर अर्थव्यवस्था पर बात करनी चाहिए. राहुल गांधी ने कहा, "बेरोज़गारी की वजह से युवाओं में ग़ुस्सा है, डर है क्योंकि उनको अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है. सरकार का काम देश को रास्ता दिखाने का होता है और इस काम में सरकार बिलकुल फेल हो गई है. और इसी वजह से विश्वविद्यालयों में. युवाओं में और किसानों में ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है. प्रधानमंत्री देश को बांटने की कोशिश कर रहे हैं."
राहुल गांधी ने कहा, "युवाओं की आवाज़ को दबाया नहीं जाना चाहिए, सरकार को उस आवाज़ को सुनना चाहिए. प्रधानमंत्री को जवाब देना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था कैसे पटरी पर लाई जाएगी."
वहीं तीन घंटे चली बैठक के बाद कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा, "सरकार देश को धर्म के आधार पर बांट रही है, विवादिक क़ानून और विधेयक ला रही है जिससे लोग आपस में ही झगड़ते रहें और उनका ध्यान असली मुद्दों पर ना जाए."
आज़ाद ने कहा, "कई हफ़्तों से पूरा देश सड़कों पर खड़ा है. समाज का हर वर्ग सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर है क्योंकि हिंदुस्तान का संविधान ख़तरे में हैं. संविधान को बचाने के लिए राजनीतिक दल नहीं बल्कि देश की जनता सड़कों पर है लेकिन उनकी केंद्रीय सरकार उनकी आवाज़ दबा रही है. जिन जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है सबसे ज़्यादा मौतें वहीं हुई है. पुलिस फ़ायरिंग में 21 लोग उत्तर प्रदेश में ही मार दिए गए हैं."
वहीं विपक्ष पर हमला करते हुए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि विपक्ष के प्रस्ताव से पाकिस्तान बहुत ख़ुश होगा क्योंकि नागरिकता संशोधन क़ानून पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के प्रति बर्बर रवैये का पर्दाफ़ाश करता है.
रविशंकर प्रसाद ने ये भी कहा कि विपक्ष की एकता का भी पता चल गया है क्योंकि बीएसपी, टीएमसी और आप जैसे प्रमुख दल इस बैठक से दूर रहे हैं. रविशंकर प्रसाद ने कहा कि विपक्ष का प्रस्ताव ना ही राष्ट्रीय हित में हैं और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में है.
क्यों दूर रहे बीएसपी, टीएमसी और आप
बीबीसी से बात करते हुए बीएसपी के प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया ने कहा कि उनकी पार्टी सीएए और एनआरसी का तो खुलकर विरोध कर रही है लेकिन वो कांग्रेस की बुलाई बैठक में शामिल नहीं हुई है क्योंकि कांग्रेस बसपा को राजनीतिक नुक़सान पहुंचा रही है.
उन्होंने कहा, "राजस्थान में हम कांग्रेस का समर्थन कर रहे थे लेकिन उसने हमारे सभी विधायक तोड़ लिए. हम कांग्रेस के इस रवैये से नाख़ुश हैं. कांग्रेस दलितों की पार्टी को तोड़ रही है. कांग्रेस अपनी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर नहीं उठना चाहती है. सिर्फ़ कांग्रेस ही विपक्ष का एकमात्र चेहरा नहीं है. हमारा विरोध है और अपनी जगह है. हम बस कांग्रेस के साथ नहीं है."
सोनिया गांधी की बुलाई इस बैठक से ममता बनर्जी ने भी अलग रहने का ऐलान कर दिया था. ममता ने कहा था कि वो कांग्रेस और वामपंथी दलों के दोहरे रवैये के साथ नहीं हैं.
वहीं दिल्ली में चुनाव हैं, आम आदमी पार्टी राजनीतिक कारणों से कांग्रेस की इस बैठक से दूर रही है. हालांकि पार्टी नेता संजय सिंह ने ये ज़रूर कहा है कि उनकी पार्टी को इस बैठक में बुलाया ही नहीं गया था. दक्षिण में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी डीएमके भी इस बैठक से दूर रही है. इन पार्टियों के बैठक से दूर रहने को विपक्ष की एकता में दरार के तौर पर भी देखा जा रहा है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर विपक्षी दल बिखरे नज़र आए हैं.
वहीं राजनीतिक विश्लेषक रशीद क़िदवई विपक्षी दलों में बिखराव की वजह बताते हुए कहते हैं, "हमारे देश में दो बड़े राजनीतिक धड़े हैं, एक भाजपा के नेतृत्व वाला सत्ताधारी एनडीए है जो अपने राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर स्पष्ट है और एकमत है. दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला धड़ा जिसमें वामदल और क्षेत्रीय पार्टियां भी हैं, बिखरा हुआ नज़र आता है. इन पार्टियों में एक-दूसरे से ऊपर आने की उत्सुकता भी नज़र आती है."
किदवई कहते हैं, "कांग्रेस पहले देश की राजनीति में एक स्तंभ के रूप में थी, बड़ी पार्टी थी और उसका टकराव क्षेत्रीय दलों से होता था. उदाहरण के तौर पर यूपी में प्रियंका गांधी की सक्रियता बहुजन समाज पार्टी के लिए ख़तरा है, वहीं दिल्ली में जहां इन दिनों चुनाव हैं, आम आदमी पार्टी को लगता है कि मज़बूत कांग्रेस उसके लिए ख़तरा है और भाजपा के लिए सहायक सिद्ध हो सकती है. ठीक इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भाजपा से लड़ने में अपनी पार्टी को ही सक्षम मानती है और उन्हें लगता है कि कांग्रेस के मज़बूती से मैदान में आने से उनके वोटर खिसक सकते हैं. क्षेत्रीय दलों का अपना राजनीतिक आंकलन और महत्वकांक्षाएं हैं और यही नरेंद्र मोदी और भाजपा के सामने एकजुट होकर खड़े होने के सामने आता है."
क्या सीएए के ख़िलाफ़ जनाक्रोश विपक्षी दलों के लिए अपने आप को मज़बूत करने का मौका है? रशीद क़िदवई कहते हैं, "नागरिकता क़ानून को लेकर जो जनाक्रोश है उसे लेकर ग़ैर भाजपा राजनीतिक दल भी अचंभित हैं. राजनीतिक दल में ये प्रश्न उठा है कि बिना राजनीतिक दलों के आह्वान के इतना बड़ा आंदोलन कैसे खड़ा हुआ है. ये दल अब इसमें अपने राजनीतिक हित देखने लगे हैं."
नज़र अल्पसंख्यक मतदाताओं पर?
क़िदवई कहते हैं, "अब विपक्षी दलों की रणनीति इस जनाक्रोश को अपने लिए भुनाने में ज़्यादा है. सभी पार्टियां अपने हितों को ध्यान में रखकर ही क़दम उठा रहे हैं. एक बात ये भी है कि सीएए का विरोध कर रहे लोगों में भाजपा के अलावा कांग्रेस और विपक्ष के अन्य दलों के ख़िलाफ़ भी ग़ुस्सा है. इन दलों को वोट देते रहे लोग अपने आप को ठगा हुआ भी महसूस कर रहे हैं."
कांग्रेस की बुलाई बैठक में कई दलों के ना आने की एक और वजह बताते हुए क़िदवई कहते हैं, "प्रियंका गांधी राजीव गांधी के नक़्श-ए-क़दम पर चलने की कोशिश कर रही हैं. राजीव ने असम अकॉर्ड किया था, मिज़ोरम में अकॉर्ड किया था, इसके अलावा व्यापक राष्ट्रीय हित में उन्होंने कश्मीर और पंजाब में भी क़दम उठाए थे. इन चारों ही राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता गंवा दी थी. राजीव गांधी ने ऐसे फ़ैसले लिए थे जिनसे कांग्रेस को वक़्ती तौर पर नुक़सान हुआ था. यही सोच प्रियंका में है जो सिद्धांतों के लिए राजनीतिक नुक़सान उठाने को भी तैयार हैं."
क़िदवई कहते हैं, "नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ आए कई दलों में कांग्रेस के विरोध की एक वजह ये भी है कि उन्हें लगता है कि अगर प्रियंका की सक्रियता से कांग्रेस मज़बूत होती है तो दिल्ली, यूपी या पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रभाव रखने वाले अल्पसंख्यक मतदाता कहीं कांग्रेस के ही साथ न चले जाएं. शायद इसी वजह से टीएमसी, बसपा और आप कांग्रेस के साथ आने से कतरा रही हैं."
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