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CAA के विरोध में महिलाओं की बुलंद होती आवाज़
नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग़ की महिलाएं जिस तरह अपनी आवाज़ हर बीतते दिन के साथ बुलंद कर रही हैं, उसी तरह अन्य राज्यों में भी महिलाओं ने आगे बढ़ कर विरोध का परचम लहराया है.
उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में महिलाएं सड़क पर निकलकर सीएए का विरोध कर रही हैं. हालांकि, इसके समर्थन में भी कई महिलाएं ही सामने आ रही हैं.
नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में एक ओर जहां प्रयागराज में रविवार को तिरंगा यात्रा निकाली गई, वहीं रविवार को ही सैकड़ों मुसलमान महिलाएं इसके विरोध में धरने पर बैठ गईं.
शहर के ख़ुल्दाबाद इलाक़े के मंसूर पार्क में इन महिलाओं ने धरना प्रदर्शन शुरू किया है जो अभी तक जारी है. इसमें महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है.
रविवार रात से लेकर सोमवार तक पुलिस प्रदर्शनकारी महिलाओं को धरना ख़त्म करने के लिए मनाती रही लेकिन महिलाओं ने एक न सुनी. रविवार शाम होते होते अटाला, रोशनबाग, शाहगंज, करैली समेत कई दूसरे मोहल्लों की औरतों और राजनीतिक दलों से जुड़ी महिलाएं भी उनके समर्थन में धरने पर बैठ गईं.
प्रदर्शनकारी महिलाएं अपने हाथों में बैनर और पोस्टर लिए हुए थे जिन पर सीएए के विरोध में नारे लिखे थे.
क्या कहती हैं महिलाएं?
धरने में शामिल एक महिला सबीना ख़ातून का कहना था, "सीएए से सिर्फ़ देश में नफ़रत फैलेगी और कुछ नहीं होगा. इसलिए सरकार को इस क़ानून को तुरंत वापस लेना चाहिए. केंद्र की बीजेपी सरकार एनआरसी के माध्यम से मुसलमानों का उत्पीड़न कर रही है."
महिलाओं के धरने पर बैठने की सूचना के बाद कई पुरुष प्रदर्शनकारियों का भी सोमवार को वहां जमावड़ा लग गया. महिलाओं के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी प्रदर्शन में शामिल थे. दस-बारह साल के कई बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर नारे लगाते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं.
वहीं, धरना और प्रदर्शन की जानकारी होने पर पुलिस भी सतर्क हो गई और कई बड़े अधिकारी वहां पहुंच गए. महिला थाने की पुलिस को भी बुलवाया गया लेकिन महिलाएं टस से मस न हुईं.
प्रयागराज के एसपी सिटी ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव ने सोमवार को धरना स्थल पर पहुंचकर शहर में धारा 144 का हवाला देते हुए धरना समाप्त करने की अपील की लेकिन उन्हें भी क़ामयाबी नहीं मिली. बाद में वहां पीएसी भी बुला ली गई.
कोलकाता में विरोध प्रदर्शन
कोलकाता में रहने वाली मुसलमान महिलाएं भी अपने हक़ के लिए आवाज बुलंद करने में पीछे नहीं हैं.
इस महानगर के अल्पसंख्यक-बहुल पार्क सर्कस इलाके में बीती सात जनवरी से ही कड़कड़ाती सर्दी की परवाह किए बिना सैकड़ों महिलाएं नागरिकता क़ानून और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) के ख़िलाफ़ धरने पर हैं.
इनका एक ही सवाल है- "क्या हम देश के नागरिक नहीं हैं."
इसे कोलकाता का शाहीन बाग़ भी कहा जा रहा है. इस मैदान में बीते 10-12 दिनों से बिस्मिल की "सरफरोशी की तमन्ना हमारे दिल में हैं..." के बोल हवा में गूंज रहे हैं.
शाहीन बाग़ की महिलाओं से प्रेरित होकर यहां जुटने वाली महिलाओं में से ज्यादातर गृहिणी हैं.
इससे पहले यह महिलाएं कभी किसी रैली में शामिल होने के लिए अपने घर की चौखट से भी बाहर नहीं निकली थीं. लेकिन अब भीड़ में कहीं से इक़बाल के गीत "सारे जहां से अच्छा... " तो कहीं से फैज़ की "हम देखेंगे.." की आवाजें आ रही हैं. इसके बीच ही रह-रह कर "इन्कलाब जिंदाबाद" के नारे भी गूंजने लगते हैं.
इन महिलाओं को भारतीय झंडे तले विरोध प्रदर्शन के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले स्थानीय संगठन अजुमार की संस्थापक अस्मत जमील कहती हैं, "हम सरकार को संविधान नहीं बदलने देंगे. सरकारें आती-जाती हैं. लेकिन संविधान जस का तस रहता है."
वह कहती हैं कि यह हमारे अधिकारों की लड़ाई है और हम पीछे नहीं हटेंगे. यहां जुटी महिलाओं में कॉलेज की छात्राओं से लेकर 70 पार की दादी अम्मा तक शामिल हैं. इन महिलाओं ने 22 जनवरी तक धरना जारी रखने का फैसला किया है. इस दिन सुप्रीम कोर्ट नागरिकता क़ानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करने वाला है.
'नया इतिहास रचने की तैयारी'
इन धरनों में अब मुसलमान ही नहीं बल्कि हिंदू परिवारों की महिलाएं भी पहुंचने लगी हैं.
धरने में हिस्सा लेने पहुंची 12वीं की छात्रा श्रेया घोषाल कहती है, "यहां महिलाएं देश को बचाने के लिए जनवरी की सर्दी में भी धरना दे रही हैं. हम लोग एक नया इतिहास रचने की तैयारी में हैं. मेरी परीक्षाएं सिर पर हैं. लेकिन यह विरोध प्रदर्शन भी अहम है. आख़िर यह हमारे भविष्य का सवाल है."
दो बच्चों की मां सुदिप्ता पाल कहती हैं, "मुस्लिम बहनों के धरने के प्रति समर्थन जताना हमारी ड्यूटी है. यहां सवाल हिंदू या मुस्लिम नहीं, बल्कि देश के भविष्य का है."
धरने पर बैठी नीलोफ़र खातून बताती हैं, "हमें अपने पतियों और पड़ोसियों से काफ़ी समर्थन मिल रहा है. वो लोग ही धरने पर बैठी महिलाओं के लिए खाने-पीने की चीजें पहुंचा रहे हैं. पहले यहां 30 महिलाओं ने धरना शुरू किया था. अब इनकी तादाद हमेशा 200 से 300 के बीच रहती है."
धरने में शामिल सबीना कहती हैं, "यह हमारे बच्चों के भविष्य की लड़ाई है. हमारा धरना ग़ैर-राजनीतिक है. क्या हम इस देश के नागरिक नहीं हैं ?"
बीते शनिवार को दो दिनों के कोलकाता दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन मुद्दों के कारण विभिन्न राजनीतिक संगठनों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था.
हैदराबाद में भी सामने आईं महिलाएं
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में भी महिलाओं ने दो दिनों का विरोध प्रदर्शन किया था. ये प्रदर्शन रविवार को ख़त्म हुआ.
इसमें महिलाओं की मांग थी कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव सीएए के मसले पर अपना पक्ष रखें.
चंद्रशेखर राव ने अभी तक इस सीएए और एनआरसी पर स्पष्ट रूप से अपनी राय ज़ाहिर नहीं की है.
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