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जेएनयू हमला: लेफ़्ट और राइट दोनों हैं हिंसा के ज़िम्मेदार?
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाँच जनवरी को कुछ नकाबपोशों ने जेएनयू की छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष पर हमला किया और विश्वविद्यालय के साबरमती होस्टल में घुसकर तोड़फोड़ की थी.
आइशी और लेफ्ट संगठनों ने दावा किया कि ये नकाबपोश बीजेपी के स्टूडेंट विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के थे.
लेकिन वीडियो और तस्वीरों के ज़रिए ऐसा ही दावा यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले एबीवीपी के छात्रों ने भी किया है.
उनके मुताबिक़ कुछ नकाबपोश उन पर भी हमला करने के लिए पेरियार होस्टल आए थे, जिनका नेतृत्व ख़ुद आइशी घोष कर रही थीं.
एबीवीपी ने एक और वीडियो जारी किया है, जिसमें एक लड़का तेज़ी से भाग रहा है और उसके पीछे कई लोग भागते हुए आ रहे हैं.
एबीवीपी का दावा है कि बचकर भागता हुआ लड़का, जेएनयू छात्र और एबीवीपी कार्यकर्ता शिवम चौरसिया है और लेफ्ट संगठनों से जुड़े छात्र उसका पीछा कर रहे हैं.
इसी वीडियो के बाद एबीवीपी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर स्कूल ऑफ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे शिवम चौरसिया की कुछ तस्वीरें भी शेयर की हैं. जिसमें उनके शरीर पर कुछ चोटें नज़र आ रही हैं.
एबीवीपी का दावा है कि वामपंथी छात्रों के हिंसक हमले में शिवम को सर पर और गर्दन पर गंभीर चोटें आई हैं.
ये पूरी घटना क्या थी, जानने के लिए बीबीसी ने एबीवीपी के घायल छात्रों और आइशी घोष दोनों पक्षों से बात की.
एबीवीपी का पक्ष
एबीवीपी से जुड़े छात्र शिवम चौरसिया ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये घटना पांच जनवरी की ही है.
उनके मुताबिक, "एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक पर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया चल रही थी. लंच के बाद हम लोग वहां खड़े थे. वहां कुछ लोगों ने हमसे कहा कि उन्हें रेजिस्ट्रेशन प्रोसेस में दिक्कत हो रही है, तो हम (शिवम और उनके साथी छात्र) उनकी मदद कर रहे थे. वो जगह सेफ ज़ोन हैं, क्योंकि 100 मीटर के दायरे में बिना इजाज़त वहां कोई प्रदर्शन नहीं हो सकता."
"उसी वक्त एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक के दोनों तरफ से एक भीड़ आती है. ये साढ़े तीन-चार बजे का वक्त था. अचानक आती भीड़ को देखकर हमें लगा कि कोई गड़बड़ है. खतरा महसूस होने पर हम लोग वहां से भागे."
"भागते हुए वो वीडियो बनाया गया. जो लोग पीछे आ रहे हैं, उनमें से कुछ लोग यहां के वामपंथी हैं और कुछ का चेहरा नहीं दिख रहा है, कुछ ऐसे भी हैं जो यहां के नहीं लग रहे हैं."
"मैं पेरियार हॉस्टल के पास आकर छिप गया. वो भीड़ भी यहां आ गई और बहुत हंगामा हुआ. जब मुझे लगा कि सबकुछ सामान्य हो गया है तो मैं बाहर निकला और हॉस्टल के बाहर वाली जूस की दुकान पर गया."
"मैं कुछ ऑर्डर कर ही रहा था कि देखा कि वही भीड़ फिर से आ रही है. खतरे को देखकर मैं ढाबे में छिपने लगा. उन्होंने मुझे देख लिया और वामपंथी संगठन आइसा और एसएफआई के दो-तीन कार्यकर्ताओं ने मुझे खींचा. मेरी शर्ट फट गई थी. मुझे बाहर ले आए और मुझे लाठी-डंडों से मारना शुरू कर दिया. मेरा सर फट गया, जिसमें पांच टांके आए हैं. गर्दन पर भी काफी चोट आई है. मेरा खून निकलने लगा और मैं गिर गया, वो लोग मुझे तब भी मारते रहे. वहां खड़े कुछ चश्मदीदों ने मेरी मदद की और मैं वहां से भागा. मैं पेरियार हॉस्टल में चला गया, लेकिन इन लोगों ने हॉस्टल में घुस कर भी मारना शुरू कर दिया. ये घटना साढ़े चार से पांच बजे के बीच हुई."
"वहां से भी भागकर मैं पास के किसी रूम में जाकर छिप गया. लगभग एक घंटा छिपा रहा. ये लोग एक-एक कमरे में जाकर छात्रों को बाहर निकलवा रहे थे."
"फिर एक घंटे बाद पुलिस आई, पुलिस भी ठीक तरह से सहयोग नहीं कर रही थी. उसके बाद कुछ लोगों ने एम्बुलेंस बुलाई और छह बजे तक हम सब लोग एम्स अस्पताल चले गए."
आइशी घोष का पक्ष
पांच तारीख को सुबह से ही हमने रेजिस्ट्रेशन बायकॉट करने की अपील की हुई थी. जेएनयूएसयू के हम सभी ऑफिस बियरर स्कूल में थे.
दोपहर के वक्त कुछ छात्र हमारे पास दौड़ते हुए आए और बताया कि एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक पर खड़े कुछ एबीवीपी और कुछ अनजान लोगों ने एक-दो छात्रों का फोन छीन लिया, एक मुस्लिम छात्र को निशाना बनाया, कई छात्रों को परेशान किया जा रहा है और एक को थपड़ मारा गया.
एबीवीपी ने आपसे बातचीत में ये बात मानी है कि वो एडमिन ब्लॉक में थे. एडमिन ब्लॉक में रेजिस्ट्रेशन हो ही नहीं रहा था. वो कहीं और हो रहा था. वो झूठ बोल रहे हैं.
कुछ छात्रों ने हमें आकर कहा कि यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधि के तौर पर आप कुछ क्यों नहीं करते. उसी वक्त मैंने पुलिस को इस सब की जानकारी दी और हस्तक्षेप की मांग की.
3.45 बजे मैंने खुद पुलिस से बात की. तब मुझे भरोसा दिलाया गया कि कैंपस में सब ठीक है और वो लोग चले गए हैं.
उस दिन जेएनयू स्टूडेंट यूनियन ने एक सॉलिडेरटी मार्च बुलाया हुआ था. टीचर्स एसोसिएशन ने पहले ही प्रोटेस्ट के लिए इकट्ठा होने का कॉल दिया हुआ था. हम लोग वहीं जा रहे थे.
उस वक्त मैं काफी पीछे थी. अचानक भाग-दौड़ मची और मुझे पता चला की आगे भाग-दौड़ मच गई है.
मैं दौड़कर वहां पहुंची. मुझे छात्रों ने बताया कि एबीवीपी ने पत्थरबाज़ी की है और उसमें दो छात्र घायल हो गए हैं.
तब मैंने छात्रों से बात की और उन्हें कहा कि यहां से हटना है और इन सब चीज़ों में नहीं पड़ना है. मैंने छात्रों को डांटा भी.
मैं एक यूनियन रिप्रेजेंटेटिव के तौर पर वहां हालात देखने गई थी. उस वक्त मेरे साथ जो छात्र थे, उन्हें मैंने कहा कि यहां से चलो. मैं सिक्यूरिटी पर भी चिल्लाई कि इस सब को रोका जाए.
इसके बाद मैं टीचर एसोसिएशन के साथ साबरमती प्वाइंट पर गई. वहां सॉलडिरटी दिखाई. हमने वहां भी यही बात रखी कि वाइस चांसलर यही चाहते हैं कि कैंपस के अंदर ये सब हो ताकि फीस बढ़ोतरी के खिलाफ 70 दिन से हो रहे आंदोलन से ध्यान हटकर जेएनयू पर आ जाए और ये जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश है. जैसा पहले भी हो चुका है.
हमें इसी चीज़ का डर था और इसके डेढ घंटे बाद करीब पोने सात बजे कुछ छात्र फिर से दौड़ने लगे. उस वक्त भी मैंने अपने साथ के छात्रों को डांटा भी. कुछ नकाबपोश भी वहां आ गए. उन्होंने ही मुझ पर हमला किया.
इससे एक दिन पहले भी यानी चार तारीख की दोपहर को कैंपस में एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने हमारे कार्यकर्ताओं को पीटा था.
हमारी यूनियन की जनरल सेकेट्री को भी पीटा गया था. काउंसलर अपेक्षा प्रियदर्शिनी का हाथ टूट गया. कितने तोड़ा? शिवम चौरसिया और मनीष जांगिड ने.
वहीं एबीवीपी का कहना है कि उन्होंने किसी पर कोई हमला नहीं किया. उनका आरोप है कि हमला करने वाले आइसा, एसएफआई, बापसा से जुड़े लेफ्ट पार्टियों से जुड़े छात्र थे, जिन्होंने पहले उनपर हमला किया और बाद में आपस में ही भीड़ गए और आपस में ही मारपीट करने लगे.
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