CAA विरोध से मोदी की किस अहम नीति को झटका

इमेज स्रोत, PTI
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिन्दी के लिए
बांग्लादेश सरकार के वाणिज्य मंत्री टीपू मुंशी ने तीन महीने पहले 23 अक्तूबर को गुवाहाटी में आयोजित भारत-बांग्लादेश स्टेकहोल्डर्स की बैठक में कहा था कि असम और बांग्लादेश गारमेंट, स्वास्थ्य पर्यटन, आईटी और शिक्षा के क्षेत्र में अब साथ काम करेंगे.
लेकिन इस बात के महज कुछ दिन बाद ही असम तथा पूर्वोत्तर के राज्यों में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन को देखते हुए बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज्जमां ख़ान को अपनी भारत यात्रा रद्द करनी पड़ी.
इससे पहले बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन ने भी अपना भारत दौरा रद्द कर दिया. असम में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों और असम की चिंताजनक स्थिति को ध्यान में रखते हुए जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे को भी भारत दौरा रद्द करना पड़ गया.
शिंज़ो आबे का दौरा पिछले 15 दिसंबर से 17 दिसंबर तक के लिए प्रस्तावित था और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात पूर्वोत्तर राज्य असम के गुवाहाटी में होनी थी.
नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ असम तथा पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे विरोध प्रदर्शन को देखते हुए फ्रांस, अमरीका, ब्रिटेन, इसराइल, कनाडा और सिंगापुर समेत कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है और असम न जाने की सलाह दी है.

इमेज स्रोत, AFP
'पूरब की ओर देखो नीति' क्या है?
दरअसल, असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में चरमपंथी संगठनों की गतिविधियों के कारण लंबे समय तक अशांति का माहौल रहा है.
ऐसे में भारत का ये ख़ूबसूरत इलाक़ा मुख्यधारा के राज्यों से कई स्तर पर पीछे रह गया.
इस क्षेत्र को विकसित करने और मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र में आई कई सरकारों ने अलग-अलग योजनाओं के ज़रिए प्रयास शुरू किए.
भारत की पूरब की ओर देखो नीति अर्थात लुक इस्ट पॉलिसी वर्ष 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने शुरू की थी.
इस नीति का मुख्य लक्ष्य भारत के व्यापार की दिशा को पश्चिमी देशों से हटाकर उभरते हुए दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों की ओर ले जाना था.
साथ ही भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और पड़ोसी देशों बीच मधुर संबंध विकसित करना था ताकि व्यापार-वाणिज्य के ज़रिए इस क्षेत्र का विकास किया जा सके.
वहीं पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान 2004 में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (डोनर) नाम से एक अलग मंत्रालय का गठन किया गया.
लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों के विकास पर क़रीब से नज़र रखने वाले लोगों का यह मानना है कि इस क्षेत्र में जिस प्रभावी तरीक़े से काम किया जाना था उतना किया नहीं गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा था कि वो पूर्वोत्तर भारत को एक द्वार की तरह विकसित कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ''नॉर्थ इस्ट इंडिया को हम साउथ इस्ट एशिया के गेटवे के तौर पर डेवेलप कर रहे हैं. भारत का ये हिस्सा हमारी एक्ट इस्ट पॉलिसी और थाइलैंड की एक्ट वेस्ट पॉलिसी, दोनों को ताक़त देगा.''
लेकिन नागरिकता संशोधन क़ानून और इनर लाइन परमिट को लेकर पिछले कुछ दिनों से असम तथा पूर्वोतर के कई राज्य में हो रहें विरोध से उत्पन्न अशांति के माहौल ने सरकार के प्रयासों को कमज़ोर किया है.
ऐसे में सवाल उठते है कि पूर्वोत्तर भारत में शांति स्थापित किए बिना इस इलाक़े को साउथ इस्ट एशिया के गेटवे के तौर विकसित करना कहां तक संभव होगा?

क्या पूर्वोत्तर की छवि और बिगड़ रही है?
फेडरेशन ऑफ़ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स ऑफ़ नार्थ इस्टर्न रीजन (फाइनर) के पूर्व चेयरमैन आरएस जोशी ने बीबीसी से कहा, "पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी को मज़बूत करने के लिए मौजूदा सरकार ने कई अच्छे प्रयास किए हैं. लेकिन जबतक स्थानीय मुद्दों को सुलझाया नहीं जाएगा, यहां निवेशकों को लाना काफ़ी कठिन काम होगा. स्थानीय समस्याओं का निपटारा किए बग़ैर सीमा के उस पार व्यापार करने की बात सोची नहीं जा सकती. व्यापार करने वाले लोग सबसे पहले सुरक्षित माहौल देखेंगे. सरकार को स्थानीय मुद्दों को लटकाने की वजाए उनपर साहसिक फ़ैसले लेने की आवश्कता है."
फाइनर के पूर्व चेयरमैन ने कहा, "नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन से असम में जिस तरह का माहौल पैदा हो गया, निश्चित तौर पर ऐसे माहौल में कोई निवेशक आना नहीं चाहेगा. सरकार को किसी भी तरह के विकास को आगे बढ़ाने के लिए लोकल सेंटीमेंट को ध्यान में रखना होगा. नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ जो विरोधभरी आवाज़ सुनाई दे रहीं है वो किसी छोट-मोटे कोने से नहीं आ रही है. ये समूचे पूर्वोत्तर के लोगों की आवाज़ है. इससे लोगों को परेशानी हो रही है. सरकार को इस मद्दे को सुलझाने में देर नहीं करनी चाहिए वरना बाहर पूर्वोत्तर इलाक़े की एक बुरी छवि बनेगी."
असम के उद्योग और एक्ट इस्ट पॉलिसी मामलों के मंत्री चंद्र मोहन पटवारी का कहना है, "एक्ट इस्ट पॉलिसी के तहत कई काम किए जा रहें है और पूर्वोत्तर भारत इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. हालांकि, हमें यह स्वीकार करना होगा कि अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है और इसलिए हमने अपने निकटवर्ती बांग्लादेश और म्यांमार पर विशेष ध्यान दिया है. पिछले एक साल के दौरान भारत और बांग्लादेश में कई तरह विकास कार्य किए गए हैं."
हालांकि कोलकाता में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक नागरिकता क़ानून को लेकर भारत की तरफ़ से बांग्लादेश पर की गई प्रतिक्रियाओं को सही क़दम नहीं मानते.
वो कहते हैं, "बांग्लादेश ने ख़ासकर प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत की बहुत मदद की है. भारत सरकार असम के प्रमुख चरमपंथी संगठन उल्फा के शीर्ष नेताओं को शांति वार्ता की मेज पर इसलिए ला सकी क्योंकि शेख़ हसीना ने इन नेताओं को पकड़ने में भारत की मदद की. इसके अलावा बांग्लादेश के साथ तटीय निगरानी समझौता हो गया. भारत माल की आवाजाही के लिए बांग्लादेश के चटोग्राम और मोंगला पोर्ट का उपयोग करेगा. बांग्लादेश सही मायने में भारत का एक अच्छा पड़ोसी है उसे दुश्मन बनाना ठीक नहीं है."

इमेज स्रोत, Dilip Sharma/BBC
सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन सरकार के लिए झटका?
सुबीर भौमिक कहते हैं, "उत्तरपूर्व के हालात सरकार की एक्ट इस्ट पॉलिसी के लिए करारा झटका है. केंद्र सरकार ने अभी तक नगा समस्या का समाधान नहीं निकाला है. मणिपुर में आज भी चरमपंथी संगठन सक्रिय है. अब असम और मेघालय जैसे राज्यों में नागरिकता क़ानून को लेकर हल्ला मचा है. ऐसी स्थिति में कौन यहां उद्योग लगाने आएगा. मोदी सरकार को यह बात समझनी होगी कि देश में आर्थिक विकास को ठीक करने के लिए सामाजिक शांति का होना बेहद ज़रूरी है."
वरिष्ठ पत्रकार भौमिक ने कहा, "सीएए के ख़िलाफ विरोध से जो हालात पैदा हुए है ऐसे में इकोनॉमिक कॉरिडोर कैसे बनेगा? भारत के कौन व्यापारी ऐसे अशांत इलाक़े से अपना सामान दक्षिणपूर्व एशिया में अपना भेजेना चाहेगा, जहां हिंसा हो रही है. आपको सामान भेजना हुआ तो आप उसे समंदर के रास्ते भेजेंगे क्योंकि वहां कई गड़बड़ नहीं है. लुक इस्ट-एक्ट इस्ट कामयाब होने के लिए पहली शर्त ये है कि उत्तरपूर्व में जो हालात हैं उन्हें सामान्य रखा जाए और कोई नई गड़बड़ी पैदा न की जाए, जो अब हो चुकी है. ये इलाक़ा अगर डिस्टर्ब हो गया तो लुक इस्ट-एक्ट इस्ट केवल भाषण के तौर पर रह जाएगा."
गुवाहाटी में दो साल पहले एक सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि लुक इस्ट पॉलिसी की बजाय उनकी सरकार एक्ट इस्ट नीति में विश्वास रखती हैं और इसके लिए पूर्वोत्तर के राज्य बेहद अहम हैं. सरकार का इरादा पूर्वोत्तर के रास्तों के ज़रिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ कारोबार बढ़ाने का था. लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी के नेता ख़ुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध ने इस इलाक़े के विकास के लिए हो रहे प्रयासों पर पानी फेर दिया है.
असम वित्तीय निगम के अध्यक्ष तथा प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेता विजय कुमार गुप्ता मानते हैं कि नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध से पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया के द्वार के तौर पर विकसित करने के प्रयास को झटका लगा है.
वो कहते हैं, "हमारी सरकार ने मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में रेल-सड़क और एयर कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बहुत काम किया है. दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कनेक्टिविटी को विकसित करने की दिशा में हम काफ़ी आगे बढ़ रहे थे लेकिन सीएए के विरोध से हमें काफ़ी नुक़सान हुआ है. हमारी सरकार ने निवेशकों के लिए जो समिट का आयोजन किया था उस समय काफ़ी लोगों ने यहां उद्योग लगाने और निवेश करने की इच्छा जाहिर की थी. लेकिन अब जो हालात है, इसमें कौन अपने पैसे यहां निवेश करना चाहेगा. आंदोलन होते है और ख़त्म भी हो जाते है लेकिन इन आंदोलन के कारण प्रदेश काफ़ी पीछे रह जाता है."
यह भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












