तृणमूल और बीजेपी इस बार भी गणतंत्र दिवस परेड झांकी पर आमने-सामने

    • Author, प्रभाकर एम.
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर आयोजित होने वाली परेड में इस साल भी पश्चिम बंगाल की झांकी नज़र नहीं आएगी.

रक्षा मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने पहले दो दौर की बैठकों के बाद राज्य के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है.

हालांकि वर्ष 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले भी दो बार बंगाल के प्रस्ताव को ख़ारिज किया जा चुका है.

लेकिन इस साल उक्त फ़ैसले को नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (एनआरसी) और नागरिकता (संशोधन) क़ानून के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुहिम के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है.

हालांकि बीजेपी और केंद्र सरकार की दलील है कि झांकियों से संबंधित प्रस्तावों पर रक्षा मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति फ़ैसला करती है.

लेकिन सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस इसे बदले की राजनीति मान रही है.

बंगाल का प्रस्ताव

इस साल रक्षा मंत्रालय को विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से कुल 56 प्रस्ताव मिले थे.

लेकिन इनमें से 22 को ही हरी झंडी दिखाई गई है. इनमें से 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हैं. वैसे, बिहार के प्रस्ताव को भी मंजूरी नहीं मिली है.

लेकिन बंगाल के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दिए जाने की बात को ममता बनर्जी राज्य और इसके लोगों का अपमान मान रही हैं.

इससे पहले वर्ष 2015, 2017 और 2018 में भी बंगाल का प्रस्ताव ख़ारिज हो गया था.

रक्षा मंत्रालय का पक्ष

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि विशेषज्ञ समिति ने दो दौर की बैठकों में विचार-विमर्श के बाद बंगाल के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था.

इसमें कहा गया कि वर्ष 2019 में इसी प्रक्रिया से गुजरने के बाद बंगाल की झांकी को मंजूरी दी गई थी.

गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने वाली झांकियों के चयन के लिए एक ठोस प्रक्रिया है.

राज्य सरकार ने इस साल कन्याश्री, जल धरो जल भरो और सबूज साथी शीर्षक तीन थीम पेश किए थे. लेकिन विशेषज्ञ समिति ने इसे ख़ारिज कर दिया था.

क्या है झांकियों की चयन प्रक्रिया?

गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने वाली झांकियों के चयन के लिए पहले से स्थापित एक ठोस प्रक्रिया है.

हर साल इस परेड से लगभग छह महीने पहले रक्षा मंत्रालय तमाम राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों से प्रस्ताव आमंत्रित करता है.

ये तमाम प्रस्ताव एक विशेषज्ञ समिति के समक्ष रखे जाते हैं.

इस समिति में कला, संस्कृति, पेंटिंग, मूर्तिकला, संगीत, वास्तुकला और नृत्यकला जैसे क्षेत्रों के जाने-माने लोग शामिल होते हैं.

समिति की बैठकों में थीम, कॉन्सेप्ट, डिजाइन और इसके असर के आधार पर इन प्रस्तावों पर फ़ैसला किया जाता है.

रक्षा मंत्रालय की दलील है कि समय कम होने की वजह से सीमित तादाद में ही झांकियों का चयन किया जाता है. इसका मक़सद परेड में सर्वश्रेष्ठ झांकियों को शामिल करना है.

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

लेकिन तृणमूल कांग्रेस की दलील है कि एक खास पार्टी धर्म के आधार पर लोगों को बांटने का प्रयास कर रही है. अब गणतंत्र दिवस की झांकियों को भी बदले का हथियार बनाया जा रहा है.

उधर, बीजेपी ने कहा कि झांकियों के चयन में पार्टी या केंद्र की कोई भूमिका नहीं है. इनका चयन विशेषज्ञ समिति करती है.

तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "वर्ष 2014 और 2016 में राज्य की झांकी को अवॉर्ड मिला था. बावजूद इसके वर्ष 2015 और 2017 में बंगाल की झांकी को अनुमति नहीं दी गई. इससे साफ़ है कि एनआरसी और सीएए के विरोध के चलते ही अबकी बंगाल के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया गया है."

दूसरी ओर, प्रदेश बीजेपी नेता सायंतन बसु कहते हैं, "हर साल कई राज्यों के प्रस्ताव ख़ारिज हो जाते हैं. लेकिन तृणमूल कांग्रेस के अलावा किसी को इसमें राजनीति नज़र नहीं आती. झांकियों के चयन में बीजेपी या केंद्र की कोई भूमिका नहीं है."

केंद्र-राज्य के बीच टकराव

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वाममोर्चा के 34 साल लंबे शासन के दौरान भी बंगाल की झांकियों के कई प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया गया था. लेकिन ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य में से किसी ने इसे कभी मुद्दा नहीं बनाया.

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर सुनील दासगुप्ता कहते हैं, "विभिन्न मुद्दों पर केंद्र और राज्य के बीच जारी तनातनी को ध्यान में रखते हुए अब इस मुद्दे पर भी राजनीति होने लगी है. हो सकता है तृणमूल के दावों में कुछ सच्चाई हो. लेकिन इस मुद्दे पर केंद्र को सीधे कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता. पहले भी बंगाल समेत कई राज्यों के प्रस्ताव ख़ारिज होते रहे हैं."

वह कहते हैं कि इस साल भी महज 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रस्तावों को हरी झंडी मिली है. लेकिन खासकर नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने और उसके बाद केंद्र-राज्य संबंधों में लगातार बढ़ती कड़वाहट को ध्यान में रखते हुए बीते छह में से चार बार बंगाल का प्रस्ताव खारिज होने से राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के मन में संदेह स्वाभाविक है.

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