नागरिकता संशोधन क़ानून: छात्र बनाम शासन

    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तीन देशों के ग़ैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने वाले नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हाल के दिनों में देशभर के हज़ारों स्टूडेंट्स सड़कों पर उतर आए.

वे इसलिए विरोध कर रहे हैं ​क्योंकि उन्हें लगता है कि नाग​रिकता संशोधन क़ानून भेदभावपूर्ण है और भारत के 20 करोड़ मुस्लिम अल्पसंख्यकों को हाशिए पर रखने के लिए एक हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे का हिस्सा है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि नया क़ानून उन लोगों के लिए है, जिन्होंने पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश में कई सालों से उत्पीड़न का सामना किया और उनके पास भारत के अलावा दूसरी कोई जगह नहीं है.

आरोप है कि दिल्ली के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में हुए प्रदर्शनों पर पुलिस ने क्रूरता की है. पुलिस परिसरों में घुस आई और कथित तौर पर पुस्तकालय, रीडिंग हॉल और शौचालय के अंदर छात्रों पर कथित तौर पर हमला किया.

घटना के वीडियो वायरल हुए हैं और पूरे देश में ग़ुस्सा फूट पड़ा है.

भारत के सबसे बड़े निजी शिक्षण संस्थान अशोका विश्वविद्यालय ने एक बयान जारी कर इसे "राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा" क़रार दिया है. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंडिया ने सरकार से कहा है कि "छात्रों को विरोध करने का अधिकार है."

एक वीडियो में क़ानून के एक परेशान छात्र ने सवाल किया है कि "क्या हम लोकतंत्र में रह भी रहे हैं?"

लेकिन छात्रों के चल रहे आंदोलन से हमें देश में जनता के मिजाज़ के बारे में कुछ चीज़ों के बारे में पता चला, जहां आधे से अधिक आबादी 25 साल से कम उम्र की है.

मुस्लिम छात्रों के साथ अन्य समुदाय के वे साथी भी जुड़ गए हैं जो सीधे क़ानून से प्रभावित नहीं हैं.

विश्लेषक एजाज़ अशरफ़ कहते हैं, ''प्रदर्शन ने उन पोषि​त आदर्श को फिर से पुनर्जीवित किया है कि सभी भारतीय, अपने धार्मिक पहचान पर ध्यान दिए बिना क़ानून के समक्ष समान हैं और उन्हें समान नागरिकता अधिकार हासिल हैं.''

दूसरा- समुदाय को एक के बाद लगे झटकों से मुसलमान अपनी उपस्थिति का एहसास कराने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं.

इन झटकों में कश्मीर से विशेष दर्जा वापस लिया जाना, ना​गरिकता क़ानून पर चिंता, निशाना बनाए जाने और कम होती राजनीतिक मौजूदगी शामिल है.

कई लोगों का कहना है कि मोदी सरकार के तहत समुदाय एक तरीक़े से लगभग ग़ायब हो गया है. अशरफ़ कहते हैं कि छात्रों का प्रदर्शन "मुसलमानों के राजनीतिक जीवन में एक वाटरशेड का प्रतीक है."

उदाहरण के लिए क्या यह भी स्ट्राइकिंग है जो प्रदर्शनकारी बिज़नेस और इंजीनियरिंग स्कूलों के परिसरों में फैल गए हैं जो पारंपरिक रूप से विरोध और आंदोलन की राजनीति से दूर रहे हैं.

इससे पता चलता है कि इस क़ानून को लेकर निराशाजनक अर्थव्यवस्था पर मोहभंग और नौकरियों की कमी के कारण बढ़ सकती है. युवा भारतीय महत्वाकांक्षा और हताशा से भर रहे हैं. उनका मानना है कि सरकार को और अधिक ध्रुवीकृत करने वाली विभाजनकारी क़ानून के माध्यम से आगे बढ़ने के बजाय धीमी होती अर्थव्यवस्था को ठीक करना चाहिए.

दिलचस्प बात यह है कि सरकार के कई सहयोगी भी इसी तरह की भावना की अगुवाई करते नज़र आ रहे हैं.

मोदी के कट्टर समर्थक उपन्यासकार चेतन भगत ने एक के बाद एक कई ट्वीट में पुलिस की कार्रवाई पर सरकार को आलोचना की.

उन्होंने कहा, "सभी विश्वविद्यालयों को सुरक्षित किया जाना चाहिए."

उन्होंने कहा, "जो लोग भारत के बारे में एक हिन्दू राजा और उसकी प्रजा का सपना देखते हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि अगर मैं आपकी धार्मिक कट्टरता को स्वीकार भी करता हूं (हालांकि मैं इसे स्वीकार नहीं करता हूं)... फिर भी आप 20 करोड़ मुसलमानों को यहां से नहीं भगा सकते. यह कोशिश करिए और आप देखेंगे कि भारत जल जाएगा, जीडीपी ध्वस्त हो जाएगी और आपके बच्चे असुरक्षित और बेरोज़गार हो जाएंगे. इसलिए ऐसे सपने देखना बंद कीजिए.''

इतिहास उन उदाहरणों से भरा पड़ा है कि ऐसे कई आंदोलन हुए हैं लेकिन व्यापक राजनीतिक और सामाजिक समर्थन की कमी के कारण वो फुस्स हो गए हैं. इस आंदोलन भी ऐसा हाल हो सकता है.

आज नहीं तो कल आंदोलनकारी छात्रों को अपनी कक्षाओं में लौटना होगा, परीक्षा देना होगा और अपने भवि​ष्य के बारे में सोचना होगा. इसलिए कई लोगों का कहना है कि भारत के विपक्षी दलों को इस मौक़े का फ़ायदा उठाने के लिए आगे आना होगा और चुनौती का सामना करना होगा.

लेकिन विपक्षी पार्टियां बँटी हुईं हैं और थकी हुई हैं.

फायरब्रांड क्षेत्रीय नेता थके हुए लग रहे हैं और लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता पहले जैसी नहीं रह गई है.

कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी ख़ुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. कई लोगों का मानना है कि विपक्ष भी बदलाव के लिए तैयार नहीं है वो वही पुराना सिस्टम ही बनाए रखना चाहता है.

फ़िलहाल बीजेपी भी वैसी ही ग़लतियां करती दिख रही है जैसी 2012 में दिल्ली के निर्भया गैंगरेप के बाद हुए विरोध प्रर्दशनों के वक़्त कांग्रेस ने की थी.

उस समय कांग्रेस ने युवा प्रदर्शनकारियों से बात करने से इनकार कर दिया था.

अभी बीजेपी किसी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री को कैंपस और सड़कों पर शांति बहाली के वास्ते बातचीत के लिए भेज सकती थी. लेकिन इसके बजाय मोदी ने इशारों में कहा कि हिंसा के लिए मुस्लिम और "पाकिस्तानी मूल के लोग" ज़िम्मेदार हैं.

एक अख़बार ने मंगलवार से मोदी सरकार "लिसन टू देम" यानी 'उनकी आवाज़ सुनो' की अपील की.

अख़बार ने लिखा है, "सरकार को असहमत लोगों से संवाद करना नहीं आता है. ख़ासकर छात्रों से. उनको बुरा-भला कहने से लोकतंत्र कमज़ोर होता है.'' इससे इनकार करना मुश्किल है.

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