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असम: नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन का अगुआ कौन?
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
चर्चित असम आंदोलन के बाद गुवाहाटी की सड़कों पर ऐसा जनसैलाब पहली बार दिखा है. उस दौरान युवा रहे लोग अब बुज़ुर्ग हो चुके हैं.
उन्हें वे पुरानी कहानियाँ याद हैं, जब असमिया अस्मिता की लड़ाई में सैकड़ों लोगों को अपनी जानें गँवानी पड़ी थीं. अब वे उसकी पुनरावृत्ति नहीं चाहते.
तब के बच्चे अब जवान हैं. वे 'जय अखम' का नारा लगाते हुए सड़कों पर उतर चुके हैं. 'कैब' ने उन्हें एकजुट कर दिया है.
ऐसे में बड़ा सवाल यह कि इतने बड़े आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है. क्या यह स्वत:स्फूर्त जन आंदोलन है, या फिर इसकी कमान किसी व्यक्ति या संगठन के हाथों में है.
'जन-आंदोलन'
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के प्रमुख समुजज्ल भट्टाचार्य कहते हैं कि यह दरअसल जनांदोलन है.
समुज्जल भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा, "असम प्राइड और असमिया पहचान के लिए चल रहे इस आंदोलन को सबका समर्थन हासिल है. हमने कैब को संसद में लाए जाने के ख़िलाफ़ 10 दिसंबर को पूर्वोत्तर राज्यों में बंद बुलाया था. नॉर्थ इस्ट स्टूडेंट यूनियन (नेसो) के बैनर तले हुए उस अभूतपूर्व बंद के अगले दिन 11 दिसंबर को लोग स्वत: स्फूर्त सड़कों पर निकले."
"इस दौरान हिंसा हुई. तब हमें लगा कि बग़ैर नेतृत्व के आंदोलन दिशाहीन हो जाएगा. इसलिए 12 तारीख़ को लताशील मैदान में हुई सभा के बाद तय किया गया कि हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण और प्रजातांत्रिक तरीक़े से होगा."
उन्होंने यह भी कहा, "अब हम योजनाबद्ध तरीक़े से आंदोलन कर रहे हैं. ऐसे में अगर कोई हिंसक रास्ता अख़्तियार करता है, तो वह हमारे आंदोलन का दुश्मन है, न कि दोस्त."
क्या आसू कर रहा है आंदोलन का नेतृत्व?
गुवाहाटी से छपने वाले 'दैनिक पूर्वोदय' के संपादक रविशंकर रवि मानते हैं कि समुज्जल भट्टाचार्य इस आंदोलन के सबसे बड़े नेता हैं. ज़ाहिर है कि आंदोलन का नेतृत्व आसू के ज़िम्मे है.
रविशंकर रवि ने कहा, "शुरुआती तौर पर छात्रों और युवाओं द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है. अब यह जनता का आंदोलन बन चुका है. इसमें असमिया समाज के हर तबके के लोग शामिल हैं."
असमिया फ़िल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री ज़रीफ़ा वाहिद ने कहा कि यह हमारी अस्मिता की लड़ाई है. इसमें शामिल हर शख़्स आंदोलन का अगुवा है.
ज़रीफ़ा वाहिद ने बीबीसी से कहा, "असमिया पैरेंट्स ने बच्चों को कह दिया है कि वे कैब का विरोध करें. आंदोलन के लिए अगर वे रात में घर नहीं आते हैं, तब भी कोई बात नहीं. हम उनके साथ हैं. हमें अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा करनी है. इसलिए यह आंदोलन नागरिकता संशोधन क़ानून के वापस होने तक चलने वाला है."
सरकार क्या मानती है?
मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी मानते हैं कि यह असम प्राइड की लड़ाई है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हर आदमी का अपने राज्य और भूमि को लेकर आत्म स्वाभिमान होता है. असम के लोग भी इसी समाज के हिस्सा हैं. उनको भी अपने राज्य-देश पर गौरव है."
"लेकिन, उन्हें यह समझना होगा कि कैब दरअसल असम के लोगों को उनका अधिकार दिलाने के लिए है. अभी कुछ नेगेटिव लोग ग़लत सूचनाएं फैलाकर हिंसा भड़का रहे हैं."
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