निर्भया कांड: फांसी, फांसी के नारे पीड़ितों के हक़ में क्यों नहीं हैं?

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हैदराबाद की पशु चिकित्सक के बलात्कार और हत्या से शुरू हुआ बीता पखवाड़ा, निर्भया कांड के दोषियों को मृत्यु दंड दिए जाने की तैयारियों पर आकर ख़त्म हो रहा है.

इस बीच उन्नाव बलात्कार पीड़िता को जलाकर मार डाला गया है. मुज़फ़्फ़रनगर से लेकर नागपुर तक - अख़बार पूरे देश से आ रही बलात्कार की ख़बरों से भरे रहे. साथ ही, बलात्कार के दोषियों के लिए मृत्यु दंड की मांग एक बार फिर सोशल मीडिया पर ज़ोर पकड़ने लगी.

सांसद जया बच्चन ने मृत्यु दंड से भी आगे जाते हुए बलात्कार के दोषियों को 'स्ट्रीट स्टाइल जस्टिस' के लिए जनता के हवाले' किए जाने की मांग कर सबको चौंका दिया. वहीं निर्भया के माता-पिता ने भी हैदराबाद कांड के आरोपियों की पुलिस एनकाउंटर में हत्या को सही ठहराते हुए इस विवादस्पद हत्याकांड को 'न्याय' बताया.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल भी बीते 10 दिनों से 'बलात्कार के मामलों में 6 महीने में कड़ी-से-कड़ी सज़ा दिए जाने' की मांग करते हुए अनशन पर बैठी हैं.

बलात्कारी को फांसी हो'-सोशल मीडिया तैरते ऐसे चीख़ते नारों के बीच निर्भया कांड के अपराधी पवन कुमार गुप्ता को मंडोली जेल से दिल्ली की तिहाड़ जेल में स्थानांतरित किया गया.

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अब पवन कुमार समेत मुकेश सिंह, विनय शर्मा और अक्षय नाम के निर्भया कांड के सभी अपराधी तिहाड़ जेल में मौजूद हैं. जेल में उन पर सीसीटीवी कैमरे से नज़र रखी जा रही है.

साथ ही आने वाले दिनों में उन्हें फांसी पर चढ़ाए की अटकलें तेज़ हो गयी हैं. बलात्कार के दोषियों के लिए फांसी की यह सतत मांग ने दोबारा 'मृत्यु दंड' के सवाल को हमारे बीच एक अनसुलझी पहेली के रूप में लाकर खड़ा कर दिया है.

नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी (दिल्ली) के शोध के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2018 तक भारत की अलग-अलग जेलों में बंद 426 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई है. 2017 में यह संख्या 371 थी.

मृत्यु दंड की प्रक्रिया

एक बार निचली अदालत से सज़ा सुनाए जाने के बाद भी फांसी की सज़ा तब तक कन्फ़र्म नहीं होती जब तक कोई उच्च अदालत उस पर मुहर न लगा दे.

इसके बाद अपराधी के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का, वहां से भी मायूस होने पर आर्टिकल 137 के तहत सप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन लगाने का विकल्प होता है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में ही क्यूरेटिव पिटिशन लगाना और फिर राष्ट्रपति के पास दया की फ़रियाद करना आख़िरी विकल्प है. बचाव के सारे रास्ते आज़माने और क़ानूनी रियायत न मिलने की स्थिति में अपराधी को फांसी पर चढ़ाया जाता है.

बलात्कार और मृत्यु दंड

क्रिमिनल लॉ अमेडमेंट ऐक्ट (2018) के ज़रिए मृत्यु दंड के दायरे को बढ़ाया गया. इसके बाद 12 साल से छोटी बच्चियों के साथ यौन हिंसा के मामलों में भी मृत्यु दंड देने का नया क़ानून लागू हुआ. इसके बाद 'प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट' या पोक्सो में भी बदलाव करके मृत्यु दंड की सज़ा को शामिल लिया गया. बलात्कार के साथ हत्या से जुड़े जघन्य मामलों में भी मृत्यु दंड का प्रावधान है.

क्या फांसी से वाक़ई कम हो सकते हैं बलात्कार?

निर्भया कांड के दोषियों को फांसी दिए जाने की सम्भावित ख़बरों के बीच यह सवाल कि - क्या फांसी बलात्कारियों में डर पैदा कर सकता है?- तूल पकड़ने लगा है.

हालांकि आंकड़े बताते हैं कि फांसी की सज़ा के साथ-साथ बलात्कारों का आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है. नेशनल क्राइम रेकॉर्डस ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताज़ा आंकड़ो के अनुसार भारत में इस वक़्त हर 15 मिनट में बलात्कार की एक घटना दर्ज की जाती है.

ऐसा कोई सरकारी या ग़ैर सरकारी शोध नहीं है जिसके आधार पर यह पुख़्ता तौर पर कहा जा सके कि मृत्यु दंड से बलात्कार की घटनाएं कम होती हैं. उल्टे, यौन हिंसा के बढ़ते आंकड़े यह बताते हैं कि देश में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का ग्राफ़ लगतार ऊपर जा रहा है.

डेथ पेन्लटी के मुद्दे पर लंबे समय से काम कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वक़ील युग चौधरी कहते हैं की मृत्युदंड से अपराध कभी नहीं रुके हैं. "अपराधों को रोकने में मृत्यु दंड का आजीवन कारावास से ज़्यादा प्रभाव कभी नहीं रहा. यौन हिंसा के आँकड़े तो हमारे सामने हैं. यहां तक कि हैदराबाद मामले में हुए एनकाउंटर के बाद भी अगली ही दिन त्रिपुरा में बलात्कार की एक बर्बर घटना हुई. और फिर इन दिनों जिस तरीक़े से पूरे देश में बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं उससे यह साफ़ है कि न तो फांसी की सज़ा, और न ही पुलिस एनकाउंटर में हुई मौतों से अपराध दर पर फ़र्क़ पड़ता है."

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मौत की सज़ा की मांग को महिला सुरक्षा के मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने और जनआक्रोश को शांत करने का एक आसान तरीका बताते हुए युग कहते हैं, "वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में साफ़-साफ़ बताया गया है कि महिला हिंसा से जुड़े मुद्दे क्या हैं. बेहतर पुलिसिंग और महिलाओं के पक्ष में एक सिस्टम तैयार करने की ज़रूरत है. लेकिन वर्मा कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए सरकार ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए. यहां तक कि निर्भया फ़ंड का भी ठीक इस्तेमाल नहीं हो पाया है. लेकिन अपराधियों को फांसी देना एक आसान रास्ता है जिसके ज़रिए सरकार बिना मूलभूत सुधार किए जनता को ये संदेश दे देती है कि वह महिला सुरक्षा को लेकर सजग है."

फांसी की सज़ा के साथ क्या है समस्याएं

मृत्यु दंड के साथ कई सैद्धांतिक और व्यवहारिक समस्याएं हैं जो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा से जुड़ी बहस में इसे जनमत का ध्रुवीकरण करने वाला मुद्दा बनाती हैं. एक पक्ष जहाँ बलात्कार के दोषियों के लिए तुरंत फांसी की मांग कर रहा है, वहीं मृत्यु दंड के विरोध में भी मज़बूत तर्क हैं.

मृत्यु दंड से साथ जुड़ी सैद्धांतिक समस्याएँ बताते हुए युग कहते हैं, "सबसे बड़ा वैचारिक मतभेद यह है कि राज्य के पास नागरिक की जान लेने का अधिकार नहीं है. फांसी का अधिकार राज्य और नागरिक के सोशल कांट्रैक्ट की परिधि के बाहर आता है. धार्मिक तर्क यह है कि ईश्वर की दी हुई ज़िंदगी लेने का अधिकार मनुष्य के पास नहीं है".

ग़लतियों से परे नहीं है मृत्यु दंड की प्रक्रिया

इन वैचारिक तर्कों से इतर मृत्यु दंड की प्रक्रिया कई गलितियों की आशंकाओं से भरी हुई है.

"मृत्यु दंड देने की प्रक्रिया आर्बिट्रेरी या मनमानी और ग़लतियों से भरी है. सुप्रीम कोर्ट यह बात कई बार स्वीकार कर चुकी है कि मृत्यु दंड देने की प्रक्रिया क़ानून की बजाय जजों और उनके विवेक के अधीन हो चुकी है. यानी आपको फांसी इस आधार पर नहीं दी जाएगी कि आपका गुनाह क्या है और क़ानून क्या कहता है...बल्कि इस आधार पर दी जाएगी कि जज क्या सोचते और महसूस करते हैं. साथ ही ऐसे कई मामले हैं जिसमें मृत्यु दंड देने के दशकों बाद अदालत ने अपराधियों को छोड़ा है".

युग चौधरी एक मिसाल देते हैं, "मेरे एक हालिया केस में तो मृत्यु दंड सुनाने के 16 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ़ आरोपियों को छोड़ा बल्कि 16 साल बंद रहने के एवज़ में उनको मुआवज़ा भी घोषित किया. कहने का मतलब है कि जज भी इंसान है और इंसान ग़लतियों से परे नहीं. इसलिए मृत्यु दंड देने की यह प्रक्रिया भी गलितियों से परे नहीं".

मौत एक ऐसी सज़ा है जो अगर दे दी गई और बाद में पता चला कि न्याय प्रक्रिया में गलती हुई थी और व्यक्ति कसूरवार नहीं था, ऐसी हालत में किसी सुधार, संशोधन या बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती.

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महिलाओं के नाम पर मृत्यु दंड

लंबे समय से महिला और बाल अधिकारों पर काम कर रही संस्था 'हक़' से जुड़ी भारती अली कहती हैं कि मृत्युदंड के आसपास जारी इस बहस का सबसे दुखद पक्ष यह है कि इसे 'महिलाओं के हित में बता कर उनके लिए न्याय सुनिश्चित करने के नाम पर जायज़ ठहराया जा रहा है'. "जैसे कि सिर्फ़ फांसी देने से पितृसत्ता ख़त्म हो जाएगी!"

वे पूछती हैं, "पुलिस की तफ़्तीश का ख़राब स्तर और पूरी न्यायिक व्यवस्था में भरी 'विक्टम शेमिंग' या पीड़िता को दोषी ठहराने वाली सोच को बदले बिना क्या बड़े बदलाव आ सकते हैं? हमें ज़रूरत है शहरों और गांवों के आधारभूत ढाँचों को स्त्रियों के पक्ष में मोड़ने की ताकि वो रोज़मर्रा का जीवन किसी आम इंसान की तरह जी सकें".

मीडिया प्रेशर और जनमत की वजह से फांसी?

फांसी के निर्णयों में मीडिया प्रेशर और जनमत की भूमिका पर बात करते हुए युग चौधरी जोड़ते हैं, "आदर्श स्थिति में मीडिया प्रेशर और जनमत का कोई भी असर अदालती सुनवाई, निर्णय, या फांसी की स्थिति में दया याचिका पर नहीं पड़ना चाहिए. लेकिन सच यही है कि जज भी इंसान है और वो भी जनमत के दबाव में आ जाते हैं. मीडिया किस तरह से मामले में पब्लिक ओपिनीयन को गढ़ रही है- इसका भी अंतिम नतीजे पर बहुत असर पड़ता है".

वे कहते हैं, "सरकारें भी अपने लिए सुविधाजनक स्टैंड ले लेती हैं. ऐसे में कई बार जजों को जनता को आक्रोश को शांत करने के लिए फांसी की सज़ा देनी पड़ती है लेकिन मैं इसको मृत्यु दंड नहीं, 'ह्यूमन सक्रिफ़ाइस' या 'नर-बलि' कहूँगा".

'प्रतिशोधी' न्याय व्यवस्था बनाम 'पुनर्वासी' न्याय व्यवस्था

भारतीय न्याय व्यवस्था में पारंपारिक तौर पर पीड़िता के पुनर्वास को ज़्यादा महत्व देने के बजाय अपराधी को कड़ी-से-कड़ी सज़ा देकर न्याय करने की तरफ़ झुकी हुई वयवस्था है.

रतन सिंह वर्सेस स्टेट ऑफ़ पंजाब के एक मामले में निर्णय सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस कृष्णा अय्यर ने यह बात मानते हुए कहा था, "यह हमारी क़ानून प्रक्रिया की कमज़ोरी है कि हम अपराधी को सज़ा देने के आग्रह में पीड़ित और क़ैदी के परिजनों - दोनों के ही हितों को अनदेखा कर देते हैं. व्यवस्था की इस कमी को नए क़ानून बनाकर ही ठीक किया जा सकता है".

हालांकि 'विक्टमॉलोजी' पर हुए सभी आधुनिक शोध बलात्कार पीड़िताओं के सम्पूर्ण पुनर्वास की ज़रूरत को स्वीकार करते हैं. लेकिन भारत में अभी भी ज़्यादा ज़ोर अपराधी को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवाने पर है. प्रतिशोधी न्याय व्ययस्था की इस आँधी में पीड़ित के पुनर्वास का सवाल कहीं खो जाता है".

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