You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
शिवसेना के हिन्दुत्व और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता का क्या होगा
नरेंद्र मोदी ने 20 अक्तूबर 2013 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में अहमदाबाद में कहा था कि अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो भारत की तस्वीर कुछ और होती.
इसी साल सितंबर महीने के दूसरे हफ़्ते में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था कि अगर वीर सावरकर देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान अस्तित्व में नहीं आता.
उद्धव ने सावरकर को भारत रत्न देने की भी मांग की थी. बीजेपी ने भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वो सत्ता में आएगी तो सावरकर को भारत रत्न देगी. तब दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और जनता से इस गठबंधन को जिताने की अपील कर रहे थे.
अपने दूसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी की सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया तो शिवसेना ने खुलकर समर्थन किया. इसे हटाए जाने के बाद पार्टी के मुखपत्र सामना में लिखा गया था कि कश्मीर मुसलमानों को तोहफ़े में नहीं दिया जा सकता.
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बाल ठाकरे ने इसका समर्थन किया था और उन्होंने दावा किया था कि इसमें शिव सैनिक भी शामिल थे. बाबरी मस्जिद के ख़िलाफ़ लोगों को गोलबंद करने में बीजेपी के भी कई नेता शामिल रहे हैं.
इसी साल सितंबर में उद्धव ने ये भी कहा था कि कांग्रेस नेता मणिशकंर अय्यर को सावरकर का अपमान करने के लिए जूते से मारना चाहिए. मणिशंकर अय्यर ने 2018 में कहा था कि सावरकर ने टू नेशन थ्योरी का प्रस्ताव रखा था.
उद्धव ने ये बात सावरकर पर एक किताब के लोकार्पण के दौरान कही थी. उद्धव ने कहा था, ''अगर सावरकर इस देश के प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ होता. हमारी सरकार हिन्दुत्व की है और हम उन्हें भारत रत्न देने की मांग करते हैं.''
सावरकर गांधी की हत्या में सहअभियुक्त रहे थे. अदालत ने नाथूराम विनायक गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे को फाँसी की सज़ा सुनाई थी. विष्णु आर करकरे, मदनलाल के पाहवा, शंकर किस्टया, गोपाल गोडसे और डॉक्टर दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी. वहीं विनायक दामोदर सावरकर को सबूतों के अभाव में जज ने बेगुनाह माना था. सावरकर हिन्दुत्व के पुरज़ोर समर्थक थे.
हालांकि सावरकर के बरी होने पर कई लोग सवाल उठा रहे थे. तुषार गांधी ने अपनी किताब 'लेट्स किल गांधी' में लिखा है, ''गांधी की हत्या में विनायक दामोदर सावरकर के रिहा हो जाने पर कई तरह के सवाल उठ रहे थे. सावरकर के ख़िलाफ़ मुकम्मल जाँच नहीं की गई. पटेल ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि अगर सावरकर दोषी पाए जाते तो मुसलमानों के लिए परेशानी होती और हिन्दुओं के ग़ुस्से को नहीं संभाल पाते.''
अब वही शिव सेना कांग्रेस के साथ सरकार बनाने जा रही है. उद्धव मुख्यमंत्री बनेंगे और ऐसा कांग्रेस के कारण होगा. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस को अब वैसे लोग भी स्वीकार्य हैं जो सावरकर को भारत रत्न देने की मांग करते हैं, बाबरी मस्जिद विध्वंस का समर्थन करते हैं और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के भी साथ खड़े हैं.
इन मुद्दों पर कांग्रेस की सोच बिल्कुल अलग है. संभव है कि अब भी अलग हो क्योंकि उसने अपनी सोच बदलने की कोई घोषणा नहीं की है. दूसरी तरफ़ शिव सेना से भी पूछा जा रहा है कि क्या उसने कांग्रेस के साथ आने के बाद हिन्दुत्व की राजनीति को अलविदा कह दिया है?
शिव सेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन ने मंगलावर की रात घोषणा की है कि उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे और शपथ ग्रहण समारोह शिवाजी पार्क में 28 नवंबर को होगा.
संयुक्त बैठक में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा, ''यह नए युग की शुरुआत है. महाराष्ट्र देश का अहम प्रदेश है. महाराष्ट्र परिवर्तन का इंतजार कर रहा है. यह सूबा एक बार फिर से नंबर वन होगा.''
इस बैठक में उद्धव ठाकरे ने कहा कि सरकार बनाने के बाद वो दिल्ली अपने बड़े भाई से मिलने जाएंगे. ठाकरे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी कैंपेन के दौरान उन्हें छोटा भाई कहा था. उद्धव ने कहा, ''यह सरकार बदले की भावना से काम नहीं करेगी लेकिन किसी ने बाधा पैदा करने की कोशिश की तो हमारी टीम माफ़ नहीं करेगी.''
उद्धव ठाकरे से पहले देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को इस्तीफ़े की घोषणा करते हुए कहा था, ''शिव सेना ने झूठ बोला है और गठबंधन को धोखा दिया है. यह वैचारिक रूप से बेमेल गठबंधन है.''
इसके जवाब में मंगलवार की रात उद्धव ठाकरे ने कहा, ''हां, ये सही बात है कि मैंने अपने पिता से अलग लाइन ली है. मैंने ऐसा क्यों किया इसे बताऊंगा. यह भी सही है कि मैं सोनिया गांधी की कांग्रेस और लंबे समय तक विरोधी रहे शरद पवार के साथ सरकार बना रहा हूं. मैंने ऐसा क्यों किया इस तर्क की भी व्याख्या करूंगा. लेकिन इससे पहले मुझे वो बताएं जिन्होंने मातोश्री आकर झूठ बोला. यह अपमान नहीं है तो क्या है? मेरा हिन्दुत्व कभी झूठ नहीं बोलता. अगर मैंने कोई वचन दिया है तो उसे पूरा करता हूं. बाला साहेब का यही सिद्धांत था.''
इस बैठक में शरद पवार, उद्धव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बालासाहेब थोराट ने अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं से कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत साथ मिलकर काम करने की अपील की. इसी बैठक में उद्धव ने कहा, ''आज मैं इस बात को लेकर निराश हूं कि मेरे पुराने सहयोगी ने मुझ पर भरोसा नहीं किया लेकिन जिनसे 30 सालों तक लड़ता रहा उन्होंने मेरे ऊपर भरोसा किया.''
इसी बैठक में शरद पवार ने कहा, ''जॉर्ज फर्नांडीस, मैं और बालासाहेब कभी भी सार्वजनिक रैलियों में नहीं उलझे. हम तीनों अच्छे दोस्त थे. कई बार मैंने दिवंगत मीनाताई ठाकरे के हाथों बने लज़ीज पकवान खाए हैं.''
शिव सेना और कांग्रेस की दुविधा और क़रीबी
शिव सेना और कांग्रेस सत्ता में कभी साथ नहीं रहे लेकिन कई मुद्दों पर दोनों पार्टियां एक साथ कई रही हैं.
शिव सेना उन पार्टियों में से एक है जिसने 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थन किया था. तब बाल ठाकरे ने कहा था कि आपातकाल देशहित में है.
आपातकाल ख़त्म होने के बाद मुंबई नगर निगम का चुनाव हुआ तो दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला. इसके बाद बाल ठाकरे ने मुरली देवड़ा को मेयर बनने में समर्थन देने का फ़ैसला किया था.
1980 में कांग्रेस को फिर एक बार शिव सेना का समर्थन मिला. बाल ठाकरे और सीनियर कांग्रेस नेता अब्दुल रहमान अंतुले के बीच अच्छे संबंध थे और ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में मदद की.
1980 के दशक में बीजेपी और शिव सेना दोनों साथ आए तो बाल ठाकरे खुलकर कम ही कांग्रेस के समर्थन में आए लेकिन 2007 में एक बार फिर से राष्ट्रपति की कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को समर्थन दिया ना कि बीजेपी के उम्मीदवार को.
शिव सेना ने प्रतिभा पाटिल के मराठी होने के तर्क पर बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया था. पाँच साल बाद एक बार फिर से शिव सेना ने कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को समर्थन दिया. बाल ठाकरे शरद पवार को पीएम बनाने पर भी समर्थन देने की घोषणा कर चुके थे.
अछूत वाली स्थिति नहीं
कांग्रेस और शिव सेना के संबंध में अछूत वाली स्थिति नहीं रही है. मुसलमानों पर शिव सेना की सोच को लेकर कांग्रेस पर भले समर्थन देने के बाद सवाल उठेंगे लेकिन कांग्रेस शिव सेना से समर्थन लेती रही है. हालांकि कांग्रेस ये भी तर्क दे रही है कि धर्मनिरपेक्षता के लिए बीजेपी को सत्ता से बाहर रखना ज़्यादा ज़रूरी न कि शिव सेना की सरकार नहीं बनने देना.
हालांकि एक बात ये भी पूछी जा रही है कि क्या कांग्रेस आगामी चुनावों में महाराष्ट्र में शिव सेना के साथ चुनाव लड़ेगी? फिर शिव सेना की हिन्दुत्व वादी पार्टी की पहचान का क्या होगा? क्या शिव सेना कांग्रेस के साथ रहकर आक्रामक हिन्दूवादी पार्टी बनी रह सकती है या कांग्रेस शिव सेना के साथ रहकर धर्मनिरपेक्ष होने का दावा कर सकती है?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)