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महाराष्ट्र: फडणनीस या शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस, अभी कई पेच क़ायम
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक समर पर सुप्रीम कोर्ट मंगलवार 10.30 सुबह अपना फ़ैसला सुनाएगी.
कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और शिवसेना गठबंधन की मांग है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस विधानसभा में बहुमत साबित करें.
उन्हें लगता है कि अगर भाजपा-अजित पवार गठबंधन को वक़्त दिया गया तो विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त होगी. चुनाव में कई निर्दलीय जीतकर आए हैं, और गठबंधन की कोशिश है कि उन्हें बांधकर रखा जाए.
इस मामले में कई संवैधानिक पेच हैं जिस पर बहस जारी है.
लेकिन वो बताने से पहले ये बता दें कि संविधान को पढ़ने वाले और उनकी जानकारी रखने वाले भी महाराष्ट्र में जारी सत्ता के खेल से कम निराश नहीं हैं.
इस मुद्दे पर बात करते हुए संविधान विशेषज्ञ सूरत सिंह जैसे फट पड़े.
वो कहते हैं, "ये सब हो क्या रहा है, तमाशा हो रहा है. शिवसेना, कांग्रेस, बीजेपी, एनसीपी का एजेंडा अलग है. चुनाव में वो कुछ बताकर आ रहे हैं. बाद में सत्ता के लिए जो बंदरबाट कर रहे हैं, ये लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है. चाहे इसके लिए कोई भी पार्टी ज़िम्मेदार हो, भारत की एक-एक संस्थाएं अगर ऐसे बरबाद हो रही हैं. ये सारे विधायक शपथ लेते हैं कि वो संविधान को निष्ठा के साथ बिना डर या पक्ष लिए लागू करेंगे. ये कैसे लागू करेंगे अगर इनका चरित्र इस प्रकार का है."
किस का व्हिप लागू
अजित पवार ने जब बीजेपी से हाथ मिलाया तब वो एनसीपी विधायक दल के नेता थे. भाजपा से हाथ मिलाने के बाद एनसीपी ने अजित पवार को हटाकर जयंत पाटिल को उस पद के लिए चुना है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं एनसीपी विधायकों को व्हिप जारी करने का अधिकार किसको है.
भाजपा नेता आशीष शेलार जयंत पाटिल को नया विधानमंडल नेता चुने जाने को 'अवैध' बताते हैं क्योंकि "जिस बैठक में ये निर्णय लिया गया उस वक्त पार्टी के सभी विधायक उपस्थित नहीं थे."
संवैधानिक मामलों के जानकार सूरत सिंह के मुताबिक, "व्हिप वर्तमान अध्यक्ष का ही लागू होगा क्योंकि जब उन्होंने (अजित पवार) ने राज्यपाल को पत्र लिखा था तब कोई व्हिप नहीं था, इसलिए ये नहीं कह सकते कि व्हिप का कोई उल्लंघन हुआ. ये किसी भी पार्टी का आंतरिक निर्णय होता है कि वो किसे अपना नेता मानते हैं."
संवैधानिक मामलों के जानकार फ़ैज़ान मुस्तफ़ा, कुमार मिहिर के अनुसार भी व्हिप जयंत पाटिल का लागू होगा.
प्रोटेम स्पीकर और फ़्लोर टेस्ट
सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र पर बहस के दौरान देवेंद्र फडणवीस का पक्ष रख रहे मुकुल रोहतगी ने फ़्लोर टेस्ट का तरीका बताया - पहले प्रोटेम स्पीकर को नियुक्त किया जाता है, विधायक शपथ लेते हैं और उसके बाद फ़्लोर टेस्ट होता है.
प्रोटेम स्पीकर का अर्थ है, 'फिलहाल अभी तक के लिए'. ये अस्थायी स्पीकर होते हैं जो चुनाव के बाद गठित विधानसभा या सदन की पहली बैठक को संचालित करते हैं जिसमें सदस्यों को शपथ दिलाई जाती है, फिर स्पीकर या डेप्युटी स्पीकर चुना जाता है जिसके बाद फ़्लोर टेस्ट होता है.
लेकिन जानकारों के मुताबिक़ स्पीकर को चुना जाना भी सरकार के लिए विश्वास मत जैसा ही होता है इसलिए प्रोटेम स्पीकर फ़्लोर टेस्ट का आदेश दे सकते हैं.
संवैधानिक मामलों के जानकार फ़ैजान मुस्तफ़ा कहते हैं, "फ़्लोर टेस्ट प्रोटेम स्पीकर भी करा सकते है. ऐसा करने की मनाही नहीं है. आमतौर पर इस तरह के झगड़े नहीं होते. पार्टियों के पास साफ़ बहुमत होता है, या साफ़ गठबंधन होता है. स्पीकर के चुनाव से ही पता चल जाता है कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं."
विशेषज्ञों के मुताबिक़ आमतौर पर सदन के सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर चुना जाता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता.
जैसे कर्नाटक में राज्यपाल ने वरिष्ठतम आरवी देशपांडे की बजाय भाजपा के केजी बोपैया को प्रोटेम स्पीकर चुना जिस पर विवाद हुआ.
राज्यपाल को विधानसभा सचिव की ओर से नाम भेजे जाते हैं जिनमें से राज्यपाल एक नाम चुनते हैं.
प्रोटेम स्पीकर पर कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, "कांग्रेस पार्टी, एनसीपी, शिवसेना इसका निर्णय नहीं कर सकती. इसका निर्णय कानून और संविधान के अनुरूप अदालत करेगी. हमने ये पक्ष रखा है कि अरुणाचल, गोवा, कर्नाटक और अन्य राज्यों के अंदर ये स्थिति पैदा हुई तो प्रोटेम स्पीकर के माध्यम से वोट ऑफ कॉन्फ़िडेंस करवाया गया था."
मतों के टाई होने पर भी प्रोटम स्पीकर के मत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है.
स्पीकर के फ़ैसलों की न्यायिक जांच
जानकार कहते हैं कि सरकार की तीनों शाखाए अपने अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र हैं लेकिन क्योंकि सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्याख्या करता है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को ये देखने का अधिकार है कि संविधान का पालन हो रहा है या नहीं.
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "वैसे तो स्पीकर के फ़ैसलों की न्यायिक जांच नहीं होनी चाहिए. होना चाहिए कि स्पीकर बन जाने के बाद व्यक्ति निष्पक्षता से व्यवहार करे. लेकिन ऐसा होता नहीं है. वे सत्ताधारी पार्टी से होते हैं और एकतरफ़ा फ़ैसले देते हैं. फ़ैसला करने में देरी करते हैं. ऐसे में अदालत ने कहा कि अगर स्पीकर का फ़ैसला दुर्भावनापूर्ण है तो वो उसकी न्यायिक परीक्षा करेगी कि क्या वो फ़ैसला सही था या नहीं."
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