संजय राउत: शिवसेना चीफ़ उद्धव ठाकरे को सीएम पद के क़रीब पहुँचाने वाले

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था,

उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था...

ये शेर पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब ने लिखा था.

जालिब अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी कलम के दम पर महकूमों की आवाज़ बनकर पाकिस्तान के हुक्मरानों पर तंज कसते रहे.

जब से भाजपा और शिवसेना के रिश्तों में तल्ख़ी आई है, संजय राउत का अंदाज़ शायराना हो गया.

पिछले दिनों जब देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो सबसे ज़्यादा संजय राउत को निशाना बनाया जाने लगा.

लेकिन फिर सियासी उठापटक का ऐसा दौर चला कि गेंद फिर शिवसेना के पाले में आ गई.

संजय राउत ने ट्विटर पर कई शेर शेयर किए हैं. हालांकि कुछ समय पहले तक उनकी पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में हिस्सेदार थे.

बीजेपी और शिवसेना दोनों ही पार्टियों ने महाराष्ट्र चुनाव साथ मिलकर लड़ा था.

यही नहीं, संजय राउत बीजेपी के नेताओं की तर्ज पर ही कांग्रेस और विपक्षी दलों पर निशाना साधते रहे हैं.

चाहें पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम की गिरफ़्तारी हो या ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ बयानबाजी, संजय राउत अपने ट्विटर अकाउंट से एनडीए विरोधियों को निशाना बनाते रहे हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर शिवसेना और ख़ास तौर पर संजय राउत ने बीजेपी से दूरी बनाने का फ़ैसला क्यों किया.

महाराष्ट्र की राजनीति को बेहद क़रीब से देखने वालीं वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन मानती हैं कि संजय राउत और उद्धव ठाकरे ने ये क़दम अपनी पार्टी का भविष्य सुरक्षित करने के मक़सद से उठाया है.

आनंदन बताती हैं, "दोनों पार्टियों ने साथ में चुनाव लड़ा था लेकिन चुनावी नतीजे आने के बाद सबसे पहले संजय राउत ने खुलकर कहा कि उनकी पार्टी को ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद मिलना चाहिए. इसके बाद से दोनों खेमों में बात बिगड़ना शुरू हो गई."

"लेकिन इस क़दम के पीछे शिवसेना और बीजेपी के बीच महाराष्ट्र में उभरते हिंदुत्व वोटबैंक को लेकर जारी तनातनी है. शिवसेना पहले मराठी मानुष की बात करने वाली पार्टी थी लेकिन पिछले कुछ समय से शिवसेना ने हिंदुत्व के मुद्दों पर भी बात करना शुरू कर दिया है. और बीजेपी ये नहीं चाहती है कि महाराष्ट्र में उभरता हिंदुत्व वोटबैंक शिवसेना के हाथ में जाए. ऐसे में बीजेपी का मकसद अगले पाँच सालों में शिवसेना को पूरी तरह ख़त्म करना है. और शिवसेना ने ये क़दम इसे ध्यान में रखते ही उठाए हैं."

उद्धव ठाकरे बनेंगे महाराष्ट्र के सीएम

उद्धव ठाकरे एक ज़माने से कहते रहे हैं कि वे कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे.

लेकिन इसके बावजूद संजय राउत ने बार-बार मुख्यमंत्री पद के लिए उनका नाम सुझाया.

सुजाता आनंदन मानती हैं कि इन तीन दलों के गठबंधन की सरकार को सिर्फ़ उद्धव ठाकरे ही ठीक तरह से नेतृत्व दे सकते हैं

तीन दलों के गठबंधन में राउत की भूमिका

पिछले दिनों जब शरद पवार से पूछा गया कि शिवसेना उनके साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती है तो शरद पवार ने कहा - "अच्छा?"

इसके बाद ये अटकलबाजियां लगाई जाने लगीं कि एनसीपी अपनी ओर से शिवसेना के सरकार बनाने के प्रति उत्साह नहीं दिखा रही है.

लेकिन जब संजय राउत से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि आपको पवार और उनके गठबंधन के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है और मीडिया इस मुद्दे पर भ्रम पैदा कर रही है और उन्हें पवार की बात समझने के लिए 100 जन्म चाहिए होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलेकर बताते हैं कि संजय राउत वो शख़्स हैं जिनकी वजह से शिवसेना और एनसीपी के बीच मेलजोल हुआ है.

अकोलेकर कहते हैं, "जब से चुनाव के नतीजे सामने आए हैं, इसके बाद से संजय राउत शरद पवार के संपर्क में थे. क्योंकि संजय राउत वो नेता हैं जिनके शरद पवार से बेहद गहरे संबंध हैं. और ये संबंध आज के जमाने से नहीं हैं. बल्कि बाला साहेब ठाकरे के जमाने से हैं. ऐसे में इस समय जब दोनों पार्टियां सरकार बनाने के लिए सुर से सुर मिलाती हुई दिख रही हैं तो संजय राउत ही दोनों खेमों के बीच संपर्क सूत्र बने हुए हैं."

वहीं, सुजाता आनंदन कहती हैं कि शिवसेना के साथ शरद पवार और कांग्रेस के रिश्ते उन दिनों से हैं जब बाला साहेब ठाकरे हुआ करते थे.

वह कहती हैं, "साल 2007 में प्रतिभा पाटिल और 2012 में प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाने के लिए कांग्रेस ने शिवसेना से ही सहायता माँगी थी. और इसमें भी कांग्रेस की मदद के लिए संजय राउत ने ही शिवसेना नेतृत्व से बात की थी."

इतना तय है कि इस पूरी रस्साकसी में संजय राउत ने अपने राजनीतिक क़द को नई ऊंचाइयां दी हैं.

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