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रजनीकांत और कमल हासन साथ आ गए तो क्या होगा
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
रजनीकांत और कमल हासन जैसी जानी-मानी दो हस्तियों की ओर से आए बयानों ने तमिलनाडु के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से मुख्यमंत्री के पद पर एक अभिनेता का चेहरा होने की संभावनाओं के बारे में हलचल पैदा कर दी है.
दो पूर्व मुख्यमंत्रियों को देखें तो अभिनेत्री से नेता बनीं जयललिता और लेखक से नेता बने एम करुणानिधि के निधन से इस राज्य की राजनीति में एक ख़ालीपन ज़रूर बना हुआ है.
तमिलनाडु के राजनीतिक हलकों में यह बात अच्छी तरह से पता है कि जयललिता और करुणानिधि की अनुपस्थिति की वजह से ही कमल हासन और रजनीकांत की राजनीतिक पार्टी के लिए जगह बन पाई है.
चूंकि दोनों जाना-माने अभिनेताओं ने अब 2021 में होने वाले तमिलनाडु विधानसभा के चुनावों के लिए एक साथ आने की ओर इशारा किया हैं तो उनकी सफलता या असफलता के बारे में सिनेमा और राजनीतिक गलियारों में काफ़ी अटकलें लगाई जा रहीं हैं.
इस बहस के पीछे की कहानी क्या है ?
असल में इसकी शुरूआत हासन की ओर से यह कहते हुए की गई कि वो अपने 44 साल पुराने दोस्त रजनीकांत से इस बात पर सहमत हैं कि पलानीस्वामी का मुख्यमंत्री बनना एक आश्चर्य की बात है. उन्होंने यह कहकर रजनीकांत का बचाव किया कि ये कोई आलोचना नहीं बल्कि वास्तविकता थी.
हासन ने कहा कि उनके और रजनीकांत के बीच इस बात को लेकर सहमति बनी है कि अगर ज़रूरत पड़ी तो वे तमिलनाडु के लोगों की भलाई के लिए एक साथ आकर काम करेंगे.
हालांकि इसमें तीन बातें ध्यान देने वाली हैं, पहली ये कि वे यह नहीं कह सकते थे कि ऐसा कब होगा, दूसरी इसका मक़सद तमिलनाडु के लोगों की भलाई के लिए है और तीसरी बात ये कि अगर ज़रूरी हुआ तो ही ऐसी संभावना है.
रजनीकांत ने इसपर यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि अगर ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसमें उन्हें और हासन को लोगों की भलाई के लिए हाथ मिलाना पड़ा, तो वो निश्चित रूप से ऐसा करेंगे.
तमिलनाडु की राजनीति में यह गठबंधन कितना सफल हो सकता है?
द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने रजनीकांत और हासन की इन योजनाओं पर संदेह जताया है.
डीएमके के प्रवक्ता टीकेएस इलांगोवन ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "वे लोगों पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं छोड़ पाएंगें. उन्हें राजनीतिक पार्टी को तैयार करने और चलाने के लिए किसी विचारधारा की ज़रूरत है. साथ ही उन्हें भाषा, क्षेत्र, समाज, अर्थ्यव्यवस्था जैसे विषयों पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए."
उन्होंने इस बात को समझाते हुए कहा, "तमिलनाडु ने हमेशा से अपने नेताओं को भाषा, संस्कृति और राजनीति के आधार पर चुना है. इन लोगों ने इन मुद्दों पर अभी तक कुछ ख़ास नहीं कहा है. और जब भी कोई पार्टी बिना किसी किसी नीति के शुरू की जाती है तो वह विफल ही रही है. शिवाजी गणेशन की पार्टी का न सफल हो पाना इस बात का एक उदाहरण है. "
उनका कहना है कि करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन या जयललिता जैसे नेताओं की सफलता के पीछे का बड़ा कारण उनकी विचारधारा ही थी.
दिलचस्प बात यह है कि एआईएडीएमके के आईटी सेल के संयोजक सिंघई रामचंद्रन भी इलांगोवन की बात से सहमत हैं. वे कहते हैं, "आपको ज़मीनी सच्चाई जानने की ज़रूरत है. लोग यह सोच कर वोट देते हैं कि अगर वो स्थानीय स्तर पर किसी मुसीबत में हो तो उन्हें कौन मदद करेगा, कौन साथ खड़ा होगा. हासन और रजनीकांत के पास कैडर और इस तरह का समर्थन नहीं है.''
रामचंद्रन ने कहा, "एमजीआर, जयललिता और करुणानिधि जैसे नेताओं ने हमेशा राजनीति को अपनी फिल्मों के आगे जगह दी है. मैं उन्हें (हासन और रजनीकांत) खारिज नहीं कर रहा हूं. लेकिन सच यह है कि इसे समझने के लिए आपको ज़मीनी सच्चाई जानने की ज़रूरत है न कि सोशल मीडिया के समर्थन पर निर्भर होने की. ''
वहीं ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए एक आंदोलन, सत्त पंचायत के महासचिव सेंथिल ,षणमुगम का इस मुद्दे पर एक अलग रुख़ है.
उन्होंने कहा, "उनकी योजनाएं उन लोगों को आकर्षित करती हैं जो द्रमुक और अन्नाद्रमुक का विकल्प खोज रहें हैं. और कोई भी एक पार्टी इसे चुनौती नहीं दे सकती इसलिए इस विकल्प पर विचार किया जा सकता है. जैसा कि मैं इसे समझता हूं उनका सार्वजनिक बयान एक सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम के लिए तैयारियां शुरू करने का एक प्रयास हैं.''
क्या राजनीति करना आसान है?
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इसे एक अलग नज़रिए से देखते हैं. मई 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ हुए 18 विधानसभा क्षेत्रों के उप-चुनावों के परिणाम काफी अलग थे. द्रमुक ने लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी. लेकिन, उप-चुनावों में दोनों पार्टियों ने बराबर सीटें जीतीं.
राजनीतिक विश्लेषक, एस मुरारी कहते हैं, ''इन परिणामों से पता चला कि एमजीएआर और जयललिता के साथ अन्नाद्रमुक का वोट बरकरार रहा. इसके अलावा ज़ाहिर है कि धनबल ने भी भूमिका निभाई है. चुनाव ऐसा था कि मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने खुद कहा कि राज्य में मोदी विरोधी लहर थी और इसीलिए लोकसभा का परिणाम ऐसा आया.''
उन्होंने आगे कहा, ''हासन की मक्कल निधि माईम (एमएनएम) को महज पांच फीसदी वोट मिले थे. वे (हासन और रजनीकांत) कोई फर्क नहीं ला पाएंगें. करुणानिधि और जयललिता ने राज्य के हर नुक्कड़, प्रत्येक गाँव का दौरा किया था. वे लोगों से जुड़े रहे थे. ये कलाकार राजनीति को पार्ट टाइम जॉब समझते हैं. जो यह नहीं है. उनका अब तक का रिकॉर्ड क्या है? राज्य में बाढ़ या सुनामी के दौरान उनका क्या योगदान रहा. ''
उन्होंने आगे कहा, ''हासन भाजपा विरोधी हैं और रजनीकांत भाजपा समर्थक हैं. इनमें इतने सारे अंतर हैं. क्या दोनों में से कोई एक बदल जाएगा.''
राजनीतिक विश्लेषक बीआरपी भास्कर ने कहा, ''राजनैतिक विश्लेषकों ने हासन और रजनीकांत में जो सबसे बड़ी समस्या देखी है वो है उनके सही समय को परखने की क्षमता. उन दोनों को अब तक एक प्रभाव, एक छवि बना लेनी चाहिए थी. जब उपचुनाव हुए तो वे वहां नहीं थे. करुणानिधि एक लेखक थे. अभिनेता तो स्क्रिप्ट के अनुसार चलते हैं. एमजीआर ने एक अभिनेता के रूप में अपनी भूमिका पूरी निभाई लेकिन उनके पास आरएम वीरप्पन नाम के एक निर्माता थे. एक अभिनेता तब तक प्रभावी नहीं होता जब उसके पास स्क्रिप्ट राइटर ,निर्माता और निर्देशक नहीं होते. ''
इस पर षणमुगम कहते हैं- 'राजनीति में एक सप्ताह एक लंबा समय होता है. लेकिन अब से दो साल बाद स्थिति काफी अलग हो सकती है.
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