मोदी सरकार NSO का डेटा क्यों रोकना चाहती है?

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

केंद्र सरकार ने नेशनल स्टैस्टिकल ऑफिस यानी एनएसओ के 2017-18 के उपभोक्ता खर्च सर्वे डेटा को जारी नहीं करने का फ़ैसला किया है. सरकार ने कहा है कि डेटा की 'गुणवत्ता' में कमी के कारण इसे जारी नहीं किया जाएगा.

सांख्यिकी और योजना कार्यान्वयन मंत्रालय ने बताया कि 'गुणवत्ता' को देखते हुए मंत्रालय ने 2017-18 के कंज्यूमर एक्सपेंडेचर सर्वे का डेटा नहीं जारी करने का फ़ैसला किया है.

मंत्रालय कहा है, ''मंत्रालय 2020-21 और 2021-22 में उपभोक्ता खर्च सर्वे कराने की संभावनाओं पर विचार कर रही है.''

अगर ये डेटा जारी नहीं होता है तो भारत में दस सालों की ग़रीबी का अनुमान मुश्किल होगा. इससे पहले यह सर्वे 2011-12 में हुआ था. इस डेटा के ज़रिए सरकार देश में ग़रीबी और विषमता का आकलन करती है.

बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार ने उपभोक्ता खर्च सर्वे की अहम बाते शुक्रवार को प्रकाशित करने का दावा किया था. इसमें बताया गया है कि पिछले 40 सालों में लोगों के खर्च करने क्षमता कम हुई है. हालांकि सरकार का कहना है कि रिपोर्ट अभी ड्राफ़्ट है और इसका कोई डेटा सामने नहीं आया है.

एनएसओ 1950 में बना था और ये पहली बार है जब डेटा जारी नहीं किया जा रहा है.

सरकारी प्रसारक प्रसार भारती न्यूज़ सर्विस के ट्वीट को मंत्रालय ने रीट्वीट किया है. इस ट्वीट में लिखा है, ''कुछ मीडिया घरानों में सर्वे के जो डेटा दिखाए जा रहे हैं वो ठीक नहीं हैं. मंत्रालय के पास सर्वे है और यह अभी ड्राफ्ट है जिसे फ़ाइनल रिपोर्ट की तरह पेश नहीं किया जा सकता. मीडिया रिपोर्ट्स में 2017-18 के सर्वे की बात कही जा रही है जबकि नेशनल अकाउंट्स स्टैस्टिक्स की अडवाइज़री कमिटी ने पहले ही कह दिया था कि 2017-18 नए आधार वर्ष के लिए उपयुक्त साल नहीं है.''

उपभोक्ता खर्च सर्वे सामान्य रूप से पाँच सालों के अंतराल पर होता है. लेकिन 2011-12 में सर्वे दो साल बाद ही किया गया था. इससे पहले 2009-10 में सर्वे आया था और तब सूखा पड़ा था.

2009-10 और 2011-12 की सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक हैं. आधार वर्ष बदलने के तर्क पर पटना के एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं कि आधार वर्ष बदलने से किसने रोका है लेकिन जो सर्वे हो चुका है उसका डेटा जारी करने में क्या दिक़्क़त है?

डीएम दिवाकर कहते हैं, ''आपको नया आधार वर्ष बनाना है बनाइए. किसने रोका है. लेकिन पुराना डेटा जारी करने में क्या समस्या है. जो सर्वे हो चुका है उसका डेटा क्यों रोकना चाहते हैं? बात सीधी सी है कि इन्हें अपने पंसद का डेटा चाहिए. जो डेटा इनकी पसंद का नहीं होता उसे ये जारी नहीं करने देते. रोज़गार के डेटा के साथ भी यही हुआ. उसे भी इन्होंने जारी नहीं करने दिया था.''

डीएम दिवाकर कहते हैं कि यह लोकतांत्रिक भारत के इतिहास की पहली सरकार है जो अपने ही संस्थानों के डेटा को ख़ारिज कर रही है. बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी रिपोर्ट में दावा किया गया है एक भारतीय के हर महीने खर्च करने की औसत क्षमता में 3.7 फ़ीसदी की गिरावट आई है. वहीं ग्रामीण भारत में ये गिरावट 8.8 फ़ीसदी है.

पूरे विवाद पर पूर्व प्रमुख सांख्यिकीविद् प्रणब सेन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा है, ''2017-18 'असामान्य वर्ष' होने के बावजूद सरकार को डेटा जारी करना चाहिए. जब मैं प्रमुख सांख्यिकीविद् था तो मेरे समय में 2009-10 में सर्वे हुआ था और तब पिछले 40 सालों बाद भयानक सूखा पड़ा और वैश्विक आर्थिक संकट का दौर था तब भी हमने डेटा नहीं रोका था. हमने 2011-12 को नया आधार वर्ष बनाया था लेकिन 2009-10 की रिपोर्ट को रोका नहीं था. हमने डेटा को दबाया नहीं था.''

प्रमुख बिज़नेस अख़बार लाइव मिंट ने लिखा है कि एनएसओ का सर्वे नोटबंदी के बाद शुरू हुआ था. तब नोटबंदी के कारण नक़दी की भयावह समस्या थी. इसके साथ ही नोटबंदी से नक़दी व्यापार को भी ख़ासा नुक़सान पहुंचा था. जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी प्रभाव में आया. इसका असर भी कारोबार पर सीधा पड़ा.

डीएम दिवाकर कहते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचा है और इसका असर लोगों के जीवन पर भी पड़ा. दिवाकर कहते हैं, ''सरकार को पता है कि एनएसओ के डेटा से नोटबंदी और जीएसटी पर सवाल खड़े होंगे इसलिए डेटा जारी नहीं करना चाहती है.''

पिछले महीने पर्यावरण और वन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने रोज़गार पर नेशनल सैंपल सर्वे का डेटा ख़ारिज कर दिया था. जावडेकर ने कहा था कि एनएसएसओ के डेटा संग्रह की प्रक्रिया सही नहीं है और यह प्रक्रिया पुरानी पड़ गई थी. जावडेकर ने कहा था कि एनएसएसओ की प्रक्रिया 70 साल पुरानी थी और आज की पूरी तस्वीर पेश करने में सक्षम नहीं है.

विपक्ष पार्टियों ने डेटा ख़ारिज करने को लेकर सरकार पर निशाना साधा है. कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया है, ''सरकार एनएसओ का डेटा छुपा रही है. 40 सालों में पहली बार लोगों की खर्च क्षमता कम हुई है. विशेषज्ञों का कहना है कि ग़रीबी बढ़ रही है और खर्च क्षमता में कमी आने से कुपोषण भी बढ़ रहा है.''

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