झारखंड में चुनाव से पहले क्या सोच रहे हैं आदिवासी?

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए.
"जो आदिवासी राज्य है, इसमें गैर आदिवासी मुख्यमंत्री को बइठा दिया. जिस तरह का स्थानीय नीति होना चाहिए, उसका उल्टा बनाया.
भूमि अधिग्रहण बिल यहां के आदिवासियों के लिए एकदम ख़तरा है, उसको लाया.
जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए जो सीएनटी कानून है, उसमें संशोधन करने का प्रयास किया. वनाधिकार कानून को ख़त्म करने का खेल किया.
इसलिए, हमलोग भाजपा सरकार से नाराज हैं. इस सरकार में हमारा भला नहीं हुआ."
सोमा मुंडा एक सांस में इतनी बातें कह देते हैं. मानो ये उन्हें मुंहज़बानी याद हो.
सोमा खूंटी ज़िले के डाड़ागामा गांव में रहते है. यह इलाका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार में आदिवासी कल्याण विभाग के मंत्री अर्जुन मुंडा के संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है.
इसके बावजूद वो भाजपा की मौजूदा सरकार से नाख़ुश हैं. बकौल सोमा मुंडा, रघुवर दास की सरकार आदिवासियों के ख़िलाफ़ काम करती रही है और अगर फिर से सत्ता में आई, तो हमारा विनाश करके दम लेगी.

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सोमा मुंडा ने बीबीसी से कहा, "हमारी आबादी 27 प्रतिशत है. फिर भी राजनीति में हमारा कोई स्थान नहीं है. हम आज भी विस्थापन, जल-जंगल-ज़मीन पर कब्ज़ा, फ़र्जी मुक़दमेबाज़ी, मुठभेड़ और भूखमरी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं."
"कोई भी पार्टी ग्राम सभाओं के स्वशासन, पांचवी अनुसूची के प्रावधानों, पेसा कानून, वनाधिकार कानून और सांस्कृतिक हक़ की लड़ाई में हमारे साथ नहीं है. हमारे इलाक़े में बाहरी लोगों का प्रवेश हो रहा है. यह हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है."
क्या होगा वोटिंग पैटर्न?
खूंटी में काम कर रही सोशल एक्टिविस्ट लक्ष्मी बाखला कहती हैं कि आदिवासियों को डर है कि कोई उनकी ज़मीन न छीन ले.
वो कहती हैं, "लोगों में ये डर है कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट के प्रावधान न कमज़ोर कर दिए जाएं. ग्राम सभाओं के अधिकारों में कटौती न कर दी जाए. इस चुनाव में आदिवासियों का वोटिंग पैटर्न इन्हीं बातों पर निर्भर करेगा."
"इसके साथ ही राजनीति में आदिवासियों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण मुद्दा है. जो इन मुद्दों पर आदिवासी समाज के साथ खड़ा होगा, लोग उसके समर्थन में आगे आएंगे."

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क्यों नाराज़ हैं आदिवासी?
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सिमडेगा के चर्चित कवि अनुज लुगुन मानते हैं कि सोमा मुंडा की बातें दरअसल आदिवासी समाज का ही प्रतिनिधि बयान है. इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए.
वो कहते हैं, "मेरी अपील है कि इन मुद्दों पर सभी आदिवासी सांसदों और विधायकों की एक राय होनी चाहिए, भले ही वे किसी भी राजनीतिक पार्टी से ताल्लुक क्यों न रखते हों."
अनुज लुगुन कहते हैं, "मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था आदिवासियों की सामाजिक संरचना से मेल नहीं खाती. झारखंड मुक्ति मोर्चा, भाजपा या दूसरी राजनीतिक पार्टियां आती तो हैं आदिवासियों के मुद्दों पर, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसे भूल जाती हैं."
"आदिवासी सामाजिक संरचना को लागू करने का कोई अवसर वहां शेष नहीं रह जाता है. तब लगता है कि बिरसा मुंडा ने जिन्हें दिकू (बाहरी) कहा था, वह मेनस्ट्रीम पालिटिक्स में इनहेरेंट (आनुवांशिक) है. इस कारण आदिवासी इलाक़ों में स्टेट (सरकार) के संरक्षण में कारपोरेट की एंट्री होती है. इसका आदिवासियों को कोई फायदा नहीं होता. "
उन्होंने यह भी कहा, "कोई यह बात नहीं करता कि पांचवी अनुसूची के प्रावधानों को किस तरह हूबहू लागू कराया जाए. आदिवासियों को मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाए. इस कारण लोगों में असंतोष पनपता है और वे नोटा, वोट बहिष्कार जैसे विकल्प अपनाने लगते हैं."
"शिबू सोरेन जैसे नेताओं ने जो संघर्ष राज्य गठन से पहले किया, अब वैसी बातें नहीं दिखतीं. बची बात भाजपा की, तो वर्तमान सरकार ने कई मौकों पर आदिवासियों के अधिकारों पर चोट किया है और उन्हें खत्म करने की कोशिशें की हैं."

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शिबू सोरेन फैक्टर
झारखंड मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा कि शिबू सोरेन के संघर्ष की बदौलत झारखंड अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया.
वो कहते हैं, "वह आंदोलन आदिवासियों-मूलवासियों के सवालों पर चला था. तब हमारी डेमोग्राफी और हेरिटेज को ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही थीं. तब गुरुजी (शिबू सोरेन) ने उनके विरोध में बड़ा आंदोलन किया. उन्हें जनता का अपार समर्थन मिला और आदिवासी समाज आज भी हमें अपना स्वभाविक प्रतिनिधि मानता है."
"हम उसी विचारधारा की पार्टी हैं. हम जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की आदिवासियों की लड़ाई में उनके साथ खड़े हैं. हम विकास के साथ सांस्कृतिक और सामाजिक संरक्षण और उनके अधिकारों की रक्षा के पक्षधर हैं."

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भाजपा सरकार पर आरोप
पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के एन त्रिपाठी ने भी आरोप लगाया कि भाजपा की मौजूदा सरकार की नीतियां आदिवासियों को कमज़ोर करने वाली रही हैं.
वो कहते हैं, "इस सरकार ने गरीबों को धोती-साड़ी देने की हमारी सरकार की योजना बंद कर उस पैसे को दूसरे काम में लगा दिया. मजदूरों को मुफ्त औजार देने की योजना बंद कर दी."
"आदिवासियों के आरक्षण पर चोट किया. जंगल में रहने वाले आदिवासियों की ज़मीनें छीनकर भूमि बैंक बना दिया ताकि उसे उद्योगपतियों को दे सकें. इस कारण आदिवासी नाराज़ हैं."

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भाजपा सरकार के काम के दावे
हालांकि, भाजपा इन आरोपों से इत्तेफाक नहीं रखती. बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता दीनदयाल वर्णवाल कहते हैं कि विपक्षी पार्टियां आदिवासियों को बरगलाने में लगी हैं. इसके बावजूद हमें आदिवासियों का समर्थन हासिल है, क्योंकि उन्हें पता है कि हमारी सरकार ने आदिवासियों के उत्थान के लिए काम किया है.
दीनदयाल वर्णवाल कहते हैं, "रघुवर दास की सरकार ने आदिवासी विकास समितियों का गठन कर उन्हें पांच लाख रुपये तक के खर्च का अधिकार दिया. सिविल सेवा की तैयारी के लिए एसटी बच्चों को एक लाख रुपये तक की मदद की."
"521 आदिवासी सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना की. 424 करोड़ रुपये की लागत से 11 हज़ार से भी अधिक टोलों में पाइपलाइन से पानी पहुंचाने का काम किया. आदिवासी धार्मिक स्थलों को राजकीय धर्म स्थल घोषित किया गया. टाना भगतों को मुफ्त में गायें दीं. यह सब सिर्फ इसलिए किया गया, ताकि आदिवासियों का उत्थान हो."
सीएनटी एक्ट में संशोधन क्यों?
दीनदयाल वर्णवाल कहते हैं, "सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव आदिवासियों के कल्याण के लिए लाया गया था लेकिन इसका विरोध उन लोगों ने किया, जिन्होंने इसका सबसे अधिक उल्लंघन किया है."
"ऐसे में यह बातें दुष्प्रचार हैं कि आदिवासी हमसे नाराज़ हैं."
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