सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश: सुनवाई बड़ी बेंच करेगी

सबरीमला

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सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दाख़िल की गई पुनर्विचार याचिका को पाँच जजों की बेंच ने बड़ी बेंच के पास भेज दी है.

पाँच जजों की बेंच में से तीन ने कहा कि यह मामला बड़ी बेंच के पास भेजा जाए.

अदालत ने फ़ैसले के पुराने फ़ैसले पर कोई स्टे नहीं लगाया है, इसका मतलब ये हुआ कि पुराना फ़ैसला बरकरार रहेगी.

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस आरएफ़ नरीमन, एएन खनविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदू मल्होत्रा की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया.

इसी साल फ़रवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी हटा दी थी. केरल सरकार ने पुनर्विचार याचिका का विरोध करते हुए कोर्ट में कहा कि महिलाओं को रोकना हिन्दू धर्म में अनिवार्य नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में दो महिलाएं किसी तरह पहुंच पाई थीं. हालांकि इनके प्रवेश से केरल में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था. बीजेपी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध कर रही थी.

तब केरल सरकार की तरफ़ से वक़ील जयदीप गुप्ता ने कोर्ट में कहा था, ''धर्म में ज़रूरी अनुष्ठानों के प्रचलन और एक मंदिर में ज़रूरी अनुष्ठानों के प्रचलन का हम घालमेल नहीं कर सकते. कोर्ट ने इस बात को महसूस किया कि किसी एक मंदिर की परंपरा हिन्दू धर्म की अनिवार्य पंरपरा नहीं हो सकती. इसमें कुछ भी समीक्षा लायक नहीं है.''

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद जिन दो महिलाओं ने सबरीमाला में जाने की हिम्मत जुटाई थी उन पर हमले भी हुए थे.

जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस फ़ैसले पर विस्तृत असहमति ज़ाहिर की है.

जस्टिस नरीमन और चंद्रचूड़ ने क्या कहा

  • किसी फ़ैसले की नेकनियती के साथ की गई आलोचना की तो इजाजत है लेकिन इसे नाकाम बनाने या लोगों को इसके लिए उकसाने की हमारी संविधानिक व्यवस्था में गुंजाइश नहीं है. हमने संविधान के मुताबिक़ क़ानून का शासन अपनाया है. लोग ये याद रखें कि संविधान वो पवित्र किताब है जिसे लेकर भारत के लोग एक राष्ट्र के तौर पर आगे बढ़ते हैं.
  • इस अदालत के फ़ैसलों की तामील सरकार के सभी महकमों की जिम्मेदारी है. संविधान इसके लिए रत्ती भर भी छूट नहीं देता है. इस कर्तव्य का निर्वाह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि क़ानून के शासन का संरक्षण ज़रूरी है. अदालत के फ़ैसलों को लागू करना जिन लोगों की जिम्मेदारी है, अगर ये उनके विवेक पर छोड़ दिया जाए कि वे खुद तय करें कि वे कोर्ट के आदेश से बंधे हुए हैं या नहीं तो क़ानून का शासन बेमानी हो जाएगा.
  • फ़ैसला आने के पहले और यहां तक कि इसके बाद भी अदालत की शरण में जाने का हक सभी पार्टियों को है. विधि का शासन किसी फ़ैसले से प्रभावित होने वाले पक्षों को क़ानून का रास्ता हमेशा मुहैया कराता है लेकिन जब ये प्रक्रिया पूरी हो जाती है और फ़ैसले की घोषणा कर दी जाती है तो ये सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला होता है और सभी इससे बाध्य हैं. इसे लागू करना किसी विकल्प की बात नहीं है. अगर ऐसा हुआ तो अदालत का इक़बाल कमज़ोर पड़ जाएगा.
  • केरल की सरकार को ये निर्देश दिया जाता है कि वो अख़बारों, टेलीविजन और दूसरे माध्यमों से इस फ़ैसला का व्यापक प्रचार-प्रसार करें. सरकार को समाज का भरोसा बहाल करने के लिए कदम उठाने चाहिए ताकि संविधानिक मूल्यों को निर्वाह हो सके. हम उम्मीद करते हैं कि राज्य सरकार क़ानून के शासन का संरक्षण करेगी.

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