नरेंद्र मोदी के दबदबे को रोक पाएंगी क्षेत्रीय पार्टियां?

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- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महज 11 महीने पहले बनी दुष्यंत चौटाला की अगुवाई वाली जननायक जनता पार्टी ने उम्दा प्रदर्शन किया.
लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को जैसा प्रचंड बहुमत मिला था, उन्हें वैसी ही अपेक्षाएं इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी थीं.
लेकिन इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों के प्रदर्शन से एक बार फिर इन अटकलों को बल मिला है कि क्या आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दल नरेंद्र मोदी के प्रभुत्व को चुनौती दे पाएंगे?

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वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषण कहती हैं, "ऐसा कहना अभी सही नहीं होगा क्योंकि कई राज्यों में अभी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं हैं. दिसंबर 2018 में तीन राज्यों में जो चुनाव हुए थे उस समय बीजेपी के ख़िलाफ़ कांग्रेस ही उभर कर आई थी."
हालांकि, राधिका यह भी कहती हैं कि जहां जहां बीजेपी की ज़मीन कमज़ोर है, वहां क्षेत्रीय पार्टियां ही उसका फायदा उठाकर चुनौती पेश करती हैं.
उन्होंने कहा, "ऐसे में यह कह सकते हैं कि जहां कांग्रेस कमज़ोर पड़ गई है या न के बराबर है, वहां बीजेपी को टक्कर देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियां ही उभर कर सामने आती हैं क्योंकि राजनीति में बहुत दिनों तक वैक्यूम नहीं रहता है."
महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम में क्षेत्रीय दलों के बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी वरिष्ठ पत्रकार आदिति फडणीस को नहीं लगता कि आगामी दिनों में क्षेत्रीय दल मोदी के प्रभुत्व को रोकने में सफल हो सकते हैं.
वह कहती हैं, "दरअसल क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व राज्यों के चुनाव तक ही सीमित रहा है. मोदी राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं. ऐसे में हो सकता है कि राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से आपको समझौता करना पड़े लेकिन केन्द्र की राजनीति में उनका (क्षेत्रीय पार्टियों का) प्रभाव गौण ही रहेगा."

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क्या फिर उठेगी तीसरे मोर्चे की बात?
मौजूदा राजनीतिक माहौल में क्या मोदी से मुक़ाबला करने के लिए क्षेत्रीय दलों के एकजुट होने के आसार हैं?
इस पर राधिका कहती हैं, "यह कहना जल्दबाज़ी होगी. दिल्ली और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसके बाद अगले साल बिहार में चुनाव होंगे. नज़रें बिहार की ओर लगी है. इस बात पर मेरी नज़र है कि वहां किस तरह के समीकरण उभर कर सामने आते हैं क्योंकि नीतीश कुमार की जेडीयू भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पार्टी है."

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दलों के एकजुट होने पर ही सवाल
हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार आदिति फडणीस का मानना है कि बीजेपी को चुनौती देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को कहीं ना कहीं कांग्रेस के साथ आना होगा और यह संभव नहीं लगता.
हालांकि एक समय क्षेत्रीय दल कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी को चुनौती देने के लिए साथ आए थे तो क्या वो मोदी से मुक़ाबले के लिए एकजुट नहीं होंगे?
आदिति कहती हैं, "उस समय क्षेत्रीय पार्टियां इंदिरा को चुनौती दे रही थीं. और आज कांग्रेस यह कोशिश कर रही है कि क्षेत्रीय पार्टियां उसके साथ आ जाएं. हालांकि, यह संभव नहीं है क्योंकि कई जगहों पर कांग्रेस ही क्षेत्रीय पार्टियों की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी है."
राधिका रामाशेषण तीसरे मोर्चे के राह में आने वाली दूसरी रुकावटों का भी ज़िक्र करती हैं.
वो कहती हैं, "समस्या यह है कि जो क्षेत्रीय दल अपने अपने क्षेत्र में महत्व और प्रभाव रखते हैं, जहां उनका जनाधार होता है, उनके पास नेतृत्व भी होता है, ऐसे में जब वह बीजेपी से गठबंधन करती हैं तो फिर तीसरे मोर्चे का विकल्प बहुत कम बच जाता है. फिर कुछ दल साथ में आकर तीसरा मोर्चा बना लेते हैं लेकिन उससे वो बात नहीं बन पाती है."
"समस्या यह है कि साथ आने और एक दो चुनाव साथ लड़ने के बाद वो फिर अलग अलग हो जाते हैं और बीजेपी या कांग्रेस के साथ समझौता कर लेते हैं."

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भविष्य में तीसरे मोर्चे के कितने आसार?
मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी से मुक़ाबले के लिए क्या भविष्य में क्षेत्रीय दल साथ आ सकते हैं.
राधिका रामाशेषण कहती हैं, "अगर झारखंड में झामुमो या झाविमो जैसी क्षेत्रीय पार्टियां मिल कर बीजेपी को चुनाव हरा देती हैं तो मैं कहूंगी कि तीसरे मोर्चा का विकल्प ज़्यादा मजबूत हो जाएगा."
हालांकि वह वह जोर देकर कहती हैं जब हम तीसरे मोर्चे की बात करते हैं तो उसमें सपा और बसपा दोनों का रहना बहुत ज़रूरी है. लेकिन इस साल लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने गठबंधन किया और बाद में तोड़ लिया. ऐसे में अगली बार उनका साथ आना नामुमकिन लगता है. जब बसपा तीसरे मोर्चे से बाहर रहेगी तब सपा की संभावना कमज़ोर हो जाती है और बीजेपी को इसका लाभ मिलता है.

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आर्थिक सुस्ती रहा राष्ट्रवाद पर हावी
लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को महाराष्ट्र और हरियाणा में अच्छी सफलता हासिल हुई थी. लिहाजा इन विधानसभा चुनावों में ऐसा लगा रहा था कि मोदी का जादू एक बार फिर चलेगा और बीजेपी दोनों राज्यों में प्रचंड जीत हासिल करेगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
आदिति कहती हैं, "हम लोगों ने पाया कि हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर आर्थिक सुस्ती का असर हुआ है. महाराष्ट्र में पारले कंपनी से हज़ारों लोगों को निकाल दिया गया है. कई छोटे-छोटे उद्योग बंद हुए हैं. सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगने से असंगठित रिटेलर और इसके उत्पादन में लगे लोगों को लग रहा है कि हमारे खाने के लाले पड़ जाएंगे. महाराष्ट्र और गुजरात में इस तरह के काम ज़्यादा होते हैं."
वो कहती हैं, "इस तरह से आर्थिक सुस्ती की मार के असर की वजह से राष्ट्रवाद का मुद्दा थोड़ा पीछे चला गया. इस चुनाव में दोनों जगहें यही बीजेपी की विजय पथ में रोड़े अटकाती दिखी. इसमें वैश्विक मंदी का असर और देश में आर्थिक कुप्रंधबन दोनों का असर दिख रहा है."

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क्षेत्रीय दलों की भूमिका
महाराष्ट्र और हरियाणा में हुए चुनाव में राधिका रामाशेषण क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण मानती हैं.
उनका मानना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में जब चुनाव हो रहा था तो ऐसा कहा जा रहा था कि ये दिलचस्प चुनाव नहीं हैं क्योंकि भाजपा एकतरफा जीत जाएगी. हालांकि जब परिणाम सामने आया तब चुनावी जानकार भी चौंक गए. वह कहती हैं, " बीजेपी के लिए कहीं ना कहीं से चुनौती तो आ ही गई है."

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क्या बीजेपी अपनी रणनीति बदलेगी?
इन दोनों राज्यों के चुनाव में बीजेपी भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनी हो लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. ऐसे में लगता है कि बीजेपी की रणनीति में कुछ चूक रही. तो क्या बीजेपी भविष्य में अपनी रणनीति बदलेगी.
आदिति कहती हैं, "मेरे ख्याल से आने वाले समय में राज्य के चुनाव में राज्यों का मुद्दा और बढ़ चढ़ कर सामने आएगा. इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीजेपी समयानुकूल अपनी रणनीति बदलती रही है."
वे कहती हैं, "बीजेपी ने इस बात का यूपी में बहुत ढिंढोरा पीटा कि वह जाति के आधार पर काम नहीं करती है. हालांकि, हमने हरियाणा में इसका ठीक उल्टा प्रयोग होते देखा जहां केवल जाति की वजह से खट्टर मुख्यमंत्री बन गए."
उन्होंने कहा, "मेरे ख्याल से यह ढकोसला है कि हम जाति को नहीं मानते हैं और हम जाति में विश्वास नहीं करते हैं. जहां ज़रूरत पड़ती है, वहां बीजेपी को भी जाति की वैशाखी थामनी पड़ती है."
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