भारत की डिजिटल दौड़, जिसमें लाखों पीछे छूट रहे हैं

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हर हाथ में फ़ोन और उस फ़ोन में इंटरनेट ने भारत को दुनिया से जोड़ दिया है. भारत में 630 मीलियन से ज़्यादा इंटरनेट सब्सक्राइबर हैं.
लेकिन भारत में अब भी कई ऐसे लोग हैं, जो इंटरनेट की पहुंच से दूर हैं. और ये लोग ज़्यादातर भारत के ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले हैं.
भारत में इंटरनेट तक पहुंच रखने वालों और ना रखने वालों के बीच ये जो दूरी है यानी देश में जो डिजिटल डिवाइड है, ये लगातार बढ़ता जा रहा है. इसी मामले पर टेक्लनोलॉजी पॉलिसी रिसर्चर स्मृति परशीरा ने बीबीसी के लिए ये लेख लिखा है.
भारत की डिजिटल स्टोरी को लेकर उत्साह का माहौल है.
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, जहां सबसे ज़्यादा इंटरनेट इस्तेमाल किया जाता है. यहां 630 मीलियन से ज़्यादा इंटरनेट सब्सक्राइबर हैं.
अगर अमरीका, ब्रिटेन, रूस और दक्षिण अफ्रीका की आबादी को जोड़ दिया जाए, तो ये संख्या उससे भी ज़्यादा है.
भारत में मोबाइल डेटा की क़ीमतें भी बहुत सस्ती हैं. जिसकी वजह से पिछले चार साल में यहां की बड़ी आबादी ने इंटरनेट इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.
इस वजह से डेटा की खपत भी बढ़ी है. एक औसत इंटरनेट यूज़र अब हर महीने 9जीबी या ज़्यादा डेटा इस्तेमाल करता है.
इसका मतलब ये हुआ कि एक महीने में एक व्यक्ति 16 घंटे वीडियो देखता है, जो 2015 में सिर्फ़ 15 मिनट देखता था.
इसके अलावा इंटरनेट की वजह से ई-कॉमर्स में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, वीडियो स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री में बूम आया है और मार्केट में कई सारे किफायती उपकरण के विकल्प आ गए हैं.

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भारत सरकार भी लोगों को दी जाने वाली सेवाओं का डिजिटलकरण करने की कोशिश कर रही है. जैसे वो स्वास्थ्य सेवाओं को मोबाइल के ज़रिए जोड़ने और बैंकिंग को भी डिजिटल करने का प्रयास कर रही है.
भारत में डिजिटल इंडिया की धारणा को लेकर उत्साह तो है, लेकिन इसकी एक सच्चाई ये भी है कि भारत में डिजिटल खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है.
ये खाई उन लोगों के बीच है, जिसके एक तरफ़ तो लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच है, लेकिन दूसरी तरफ़ लोग डिजिटल तकनीक और इंटरनेट से कोसो दूर हैं.
इस दूरी की एक वजह है कि अलग-अलग इलाक़ों में रहने वाले लोगों के पास इंटरनेट सर्विस की पहुंच अलग है. इसके अलावा भी कई और वजहे हैं, जिनपर इंटरनेट की पहुंच निर्भर करती है.
जैसे ये किसी व्यक्ति की लोकेशन, आय, लिंग, शिक्षा, भाषा और उम्र पर भी निर्भर करता है.
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर 100 में से क़रीब 49 (48.4) लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच (इंटरनेट डेंसिटी) है.
हालांकि देश की 66% आबादी गांवों में रहती है. जहां 100 में से 25.3 लोगों के पास इंटरनेट है. वहीं शहरी इलाक़ों में देखा जाए तो ये आकड़ा बढ़कर 97.9 हो जाता है.

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यानी कई लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच तो है, लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनके पास नहीं है और उनमें से अधिकतर ग्रामीण इलाकों में रहते हैं.
देश के 28 राज्यों और 9 केंद्र शासित प्रदेशों में इंटरनेट की पहुंच अलग-अलग है.
बिहार, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में मानव विकास के सूचक बहुत ही ख़राब हैं और इंटरनेट इस्तेमाल के मामले में भी ये राज्य पीछे हैं.
भौगोलिक स्थितियों की वजह से भी इंटरनेट की पहुंच प्रभावित होती है.
मिसाल के लिए, हिमाचर प्रदेश के दूर-दराज़ के पहाड़ी इलाक़े, राजस्थान के कम आबादी वाले रेगिस्तानी इलाक़े और मध्य प्रदेश के घने जंगलों वाले इलाक़े डिजिटल पहुंच से दूर हैं.
इनमें से कई दूर-दराज़ के इलाक़ों में भारत के आदिवासी और हाशिए पर मौजूद समुदाय रहते हैं.
ये समुदाय पहले ही कई तरह के लाभों से वंचित हैं और इंटरनेट की वजह से जो चीज़ें उनतक पहुंच सकती हैं, ख़राब कनेक्टिविटी की वजह वो भी नहीं पहुंच पाती.
लिंग एक और अहम कारक है, जिसपर डिजिटल पहुंच निर्भर करती है.

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मोबाइल ऑपरेटर्स के प्रतिनिधित्व वाली एक संस्था, जीएसएमए की 2019 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, सिर्फ़ 16 प्रतिशत भारतीय महिलाएं मोबाइल और इंटरनेट सर्विसेस का इस्तेमाल करती पाई गईं.
अगर महिला और पुरुषों की तुलना की जाए तो पुरुषों के मुक़ाबले 56 प्रतिशत कम महिलाएं मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करती हैं. इसके पीछे आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वजहें हैं, जिसकी जड़े पितृसत्ता में हैं.
अगर आर्थिक मोर्चे पर बात करें तो डेटा की क़ीमतें तो नाटकीय रूप से गिरी हैं. लेकिन कई लोग अब भी इंटरनेट वाले मोबाइल को ख़रीदने में असमर्थ हैं.
बहुत सी महिलाएं आर्थिक तौर पर किसी और पर निर्भर होती हैं, और घर में भी ज़रूरतों के लिए वो ख़ुद को सबसे आख़िर में रखती हैं, इसलिए अक्सर वो ऐसे उपकरण नहीं ख़रीदतीं.
ख़रीदने के अलावा भी दूसरी बात ये है कि वो इतनी पढ़ी लिखी नहीं होती और तकनीकी जागरुकता के मामले में उनकी सीमाएं भी एक वजह है.
कुछ ऐसे ही कारणों से बूढ़े लोगों में भी इंटरनेट की पहुंच कम है.

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कहा जाता है कि डिजिटल सशक्तिकरण होगा तो लोगों में जागरुकता बढ़ेगी और आत्मनिर्भरता आएगी, लेकिन कुछ लोग इसे सामाजिक ढांचे के लिए ख़तरे की तरह भी देखते हैं.
ख़बरें आती रहती हैं कि कई ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं के मोबाइल फोन और इंटरनेट इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं. ख़ासकर युवा लड़कियों पर ऐसे प्रतिबंध लगाए जाते हैं.
पढ़े लिखे तबक़े की बात आती है तो वहां भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम ही देखने को मिलता है. चाहे ऑनलाइन स्पेस की बात हो, रिसर्च लैब्स की बात हो या मीटिंग रूम्स की. हर जगह पुरुषों का ही दबदबा है.

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इन समस्याओं के बावजूद भारत सरकार अपने महत्वकांशी प्रोग्राम - डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट के लिए उत्साहित है.
इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए ज़रूरी है कि मोबाइल कनेक्टिविटी देश में बहुत अच्छी हो.
सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश भी कर रही है. इसके लिए सरकार देश की 250,000 ग्राम सभाओं को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी दे रही है.
ये प्रोजेक्ट 2011 से चल रहा है, लेकिन अबतक लक्ष्य के आधे से भी कम हिस्से को पूरा किया जा सका है.
जहां काम पूरा हुआ भी है, उनमें से कम में ही इंटरनेट ठीक से चल रहा है.
सरकार की नेशनल डिजिटल कम्युनिकेशन पॉलिसी ने माना है कि अभी इस दिशा में और कोशिशें किए जाने की ज़रूरत है.
इसमें सभी छोटे इलाक़ों तक कनेक्टिविटी पहुंचाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है और कहा गया है कि महिलाओं और विकलांग लोगों जैसे तबक़ों पर ख़ास तौर पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है.
पॉलिसी में ये भी कहा गया है कि शहरी और ग्रामीण इलाक़ों के जिन हिस्सों में इंटरनेट कनेक्टिविटी कमज़ोर है, वहां पब्लिक वाई-फाई इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिए उसे ठीक किया जा सकता है.
पूरे देश के डिजिटलीकरण के दावे तभी साकार हो पाएंगे जब लोकेशन, लिंग और कमज़ोर तबक़ों को ध्यान में रखा जाएगा. डिजिटल खाई इन्हीं लोगों के ईर्द-गिर्द है.
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