'दूसरे फली नरीमन का मिलना नामुमकिन है'

    • Author, रमेश मेनन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

फली नरीमन भारत के ना केवल मशहूर और प्रतिष्ठित वकील थे बल्कि अपने आप में एक पूरी संस्था थे. उन्हें लीविंग लेजेंड के तौर पर देखा जाता था.

अदालतों में जब वे दमदार तरीके से अपनी दलीलें पेश किया करते तो न्यायाधीश भी ध्यानपूर्वक उनको सुनते थे.

ज्ञान और दृष्टिकोण के चलते लोग उन्हें प्रशंसा और सम्मान से देखते थे.

उन्हें हमेशा उस कानूनविद के तौर पर देखा जाएगा जिन्होंने भारतीय संविधान और कानून के विकास में मदद की.

अंतरराष्ट्रीय कानूनी मसलों पर भी उनकी शानदार पकड़ थी.

फली नरीमन को कानून के क्षेत्र और सार्वजनिक जीवन में अप्रतिम योगदान के चलते 1991 में पद्म भूषण और 2007 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.

रंगून से हिंदुस्तान

अपनी कद्दावर शख्सियत के बावजूद वे बेहद विनम्र इंसान थे. वे हर नजरिए की बात सुनने को उत्सुक रहते थे. फली हमेशा अधिक मेहनत करने को तैयार रहते थे.

उनके माता पिता, सैम और बानो, रंगून से भागकर भारत आए थे.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दिसंबर, 1941 में जब जापान ने रंगून पर बम बरसाने शुरू किए थे तब सैम और बानो ने रंगून से निकलने का फैसला लिया था.

शायद ही उन्हें इस बात का अंदाजा रहा होगा कि फली एक दिन भारत के सबसे बेहतरीन कानूनविद बनेंगे.

जब सैम और बानो ने भारत में शरण ली थी, तब फली की उम्र थी 12 साल.

फली नरीमन के प्रशंसक कहते हैं कि दूसरे फली का मिलना नामुमकिन है तो वे गलत नहीं कह रहे होते हैं.

अपातकाल के विरोध में इस्तीफ़ा

उन्होंने हमेशा अपनी सोच के मुताबिक बात कही, खुद के विचारों को संपादित नहीं किया. उन्हें जो सही लगा, हमेशा उन्होंने वैसा ही कहा.

फली मई, 1972 में भारत के एडिशनल सॉलिस्टर जेनरल बनाए गए थे और इस पद पर वे जून, 1975 तक रहे.

26 जून, 1975 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपातकाल लागू किया तो उन्होंने इसके विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

यहां यह ध्यान रखने की बात है कि वे ऐसा साहस दिखाने वाले इकलौते सरकारी अधिकारी थे.

वैसे सैम चाहते थे कि उनका बेटा भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास करके नौकरशाह बने.

लेकिन फली ऐसा नहीं कर पाए और उन्होंने कानून के क्षेत्र में करियर बनाने का विकल्प चुना. उन्होंने मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री ली.

बंबई हाईकोर्ट से वकालत

इस परीक्षा में उन्होंने पहला स्थान हासिल किया था. उन्हें तब किनलोक फोर्ब्स गोल्ड मेडल और प्राइज फॉर रोमन कानून और न्यायशास्त्र के लिए सम्मानित किया गया था.

फली ने मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद से ही बंबई हाईकोर्ट में वकालत शुरू कर दी थी.

उन्होंने सबसे पहले पायने एंड कंपनी के लिए बतौर ट्रेनी काम शुरू किया था. इसके बाद उन्होंने हाई प्रोफाइल कांगा चैंबर को ज्वाइन किया.

इस चैंबर के साथ सर जमशेदजी कांगा, हरिलाल कानिया, नानी पालकीवाला, एचएम सीरवाई और सोली सोराबजी जैसे प्रतिष्ठित वकील जुड़े हुए थे.

फली को इन दिग्गजों के साथ काफी कुछ सीखने को मिला, उन्होंने तेजी से सीखा भी.

अपनी आत्मकथा, 'बिफोर मेमोरी फेड्स' में फली ने लिखा है कि सर जमशेदजी कांगा ने उन्हें वकालत की पेचिदगियों के बारे में समझाया था.

इनमें एक बारीक बात थी- जटिल चीजों को हमेशा सरल बनाकर पेश करने की सलाह.

नानी पालकीवाला की जगह

शुरुआती सालों में फली शीर्ष वकीलों के सहायक की भूमिका निभाया करते थे.

एक दिन ऐसा हुआ कि नानी पालकीवाला को अदालत में पेश होना था, लेकिन उसी वक्त वे कहीं और भी व्यस्त रहने वाले थे.

ऐसे में उन्होंने फली को अपनी जगह अदालत भेज दिया और कहा कि सुनवाई से पहले वे अदालत पहुंच जाएंगे.

लेकिन संयोग ऐसा हुआ कि चीफ जस्टिस छागला और जस्टिस गजेंद्रगाडकर की बेंच के सामने मामले की सुनवाई पहले शुरू हो गई और तब तक नानी पालकीवाला अदालत नहीं पहुंच पाए.

फली ने अदालत को बताया कि पालकीवाला पहुंचने ही वाले होंगे, लेकिन न्यायाधीशों ने उनसे पूछ लिया कि क्या वे मामले के बारे में कुछ जानते हैं.

फली ने जोरदार तरीके से मामले में दलील रखी.

जज बनने का ऑफर

जस्टिस छागला जब अपना फैसला सुना रहे थे तभी पालकीवाला पहुंच गए और उन्होंने अदालत में फैसले से पहले अपनी दलील रखने की अनुमति मांगी.

जस्टिस छागला ने कहा कि फली ने मामले को इतने अच्छे तरीके से सामने रखा है कि उन्हें नहीं लगता है कि पालकीवाला उसमें कुछ और जोड़ पाएंगे.

फली नरीमन को तब वकालत में आए एक ही साल हुए थे लेकिन इस वाकये से उनकी तीक्ष्ण मेधा का अंदाजा होता है.

महज 38 साल की उम्र में उन्हें जज बनने का ऑफर मिल गया था लेकिन अपने बढ़ते बच्चों और परिवार की आर्थिक जरूरतों को देखते हुए वे इस ऑफर को स्वीकार करना नहीं चाहते थे.

उनकी बेटी अनाहीता, ने उनसे गुजारिश की थी कि वे इसे स्वीकार कर लें, लेकिन उन्हें इसे नहीं स्वीकारा.

सालों बाद उनकी बेटी ने जज के तौर पर फली का एक कार्टून बनाया था ताकि उनको याद दिलाया जाए कि अगर उन्होंने ऑफर स्वीकार कर लिया होता तो इस तरह नजर आते.

कॉलेजियम सिस्टम

अपनी आत्मकथा में उन्होंने शंकरी प्रसाद (1951), सज्जन सिह (1965), गोलकनाथ (1967), केशवनंदन भारती (1973) और मिनर्वा मिल्स (1980) जैसे ऐतिहासिक मामलों का विवरण दिया है कि किस तरह से न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों की रक्षा की.

मूल अधिकार जो संविधान का मूल तत्व हैं और जिन्हें कभी संशोधित नहीं किया जा सकता.

अपनी आत्मकथा में फली ने जस्टिस एचआर खन्ना के योगदान पर भी रोशनी डाली है.

जस्टिस खन्ना ने 1977 में उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था जब सबसे सीनियर होने के बावजूद उन्हें सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस नहीं बनाकर इंदिरा गांधी की सरकार ने जस्टिस एमएच बेग को चीफ जस्टिस बनाया था.

फली नरीमन का विश्वास परंपरागत न्यायापालिका में था जिसमें कॉलेजियम सिस्टम के तहत न्यायाधीशों की नियुक्त करने की परंपरा है.

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन का केस

जब सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने न्यायाधीशों को सुनवाई के लिए मामले सौंपे जाने और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कार्यकाल में न्यायापालिका के काम काज को लेकर अपनी चिंताओं को जाहिर करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस बुलाई, तब फली नरीमन काफी व्यथित हुए थे.

उन्होंने तब कहा था कि अगर ये चिंताएं वास्तविक भी हैं तो भी इसे सुप्रीम कोर्ट की सीमा में ही रहना चाहिए था.

भोपाल गैस कांड की त्रासदी के बाद जब वे यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के मुख्य वकील के तौर पर सामने आए तब एक विदेशी प्रकाशन ने उन्हें 'फॉलन एंजल (गिरा हुआ देवदूत)' लिखा था.

तब उन्होंने प्रकाशन को एक पत्र लिख कर कहा था कि वे खुद मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, लेकिन ये सही नहीं होता कि वे उन लोगों की बात नहीं सुनते जिन्होंने कथित तौर पर मानवाधिकार का उल्लंघन किया है.

क्लाइंट के बारे में पूर्वधारणा बनाने के लिए वकील पर बहुत सारा बोझ भी था. लेकिन हर किसी को अपनी पसंद के वकील के जरिए अपने बचाव का संवैधानिक अधिकार हासिल है.

धर्मनिरपेक्ष भारत

फली ने इस मामले में अदालत के बाहर, पीड़ितों और कंपनी के बीच समझौता कराया जिसके तहत कंपनी ने पीड़ितों को 470 मिलियन डॉलर राहत की पेशकश की थी.

गुजरात की केशुभाई पटेल सरकार ने नर्मदा बांध से विस्थापित हुए आदिवासियों की ओर से दर्ज कराए गए मामले में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपना वकील बनाने के लिए संपर्क किया, तो फली तैयार हो गए थे.

लेकिन उन्हें जब मालूम हुआ कि राज्य में ईसाईयों पर चुन चुनकर हमले किए जा रहे हैं, बाइबिल और चर्च को जलाया जा रहा है तो उन्होंने मामले की पैरवी से इनकार करते हुए कहा था कि वे इस राज्य के लिए किसी भी मामले में वकील नहीं बनेंगे.

दरअसल, आजादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनना स्वीकार किया था, ये बात फली को बहुत पसंद थी और वे भारत को हमेशा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के तौर पर ही देखना चाहते थे.

उन्होंने ये भी उम्मीद जताई थी कि धर्मनिरपेक्ष भारत में ही वे मरेंगे.

न्यायापालिका की स्वतंत्रता

फली नरीमन ने सबसे पहले नेशनल ज्यूडिशिएल अपाइंटमेंट्स कमीशन की संवैधानिकता को चुनौती दी थी.

उनका कहना था कि इसके प्रावधनों के चलते न्यायपालिका की स्वतंत्रता को झटका लगेगा. न्यायापालिका की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में वे हमेशा सबसे आगे नजर आए.

उन्होंने हमेशा स्पष्टता से कहा कि कार्यपालिका को जजों की नियुक्ति में दखल देने या फैसले करने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

उन्हें जब लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था तब उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने कहा था, "नरीमन वास्तव में दुनिया भर के कानूनविदों के लिए अनुकरणीय हैं. वे भारत के सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक वकीलों में एक हैं."

उन्होंने कभी गोलमोल बातें नहीं कहीं.

अगस्त, 2018 में राज्य सभा के नव निर्वाचित सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा था कि सांसद आम लोगों की उम्मीदों, उनकी समस्याओं और उनकी पीड़ाओं का ध्यान नहीं रखते लेकिन उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि वे एक अरब लोगों के प्रतिनिधि हैं जिनकी उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं.

फली का प्राइवेट बिल

उन्होंने संसदीय कार्यवाही के लगातार बाधित रहने पर यह भी सुझाया था कि स्पीकर को अपनी चेयर पर बैठे रहना चाहिए और सदन के स्थगन की घोषणा नहीं करनी चाहिए.

उनके मुताबिक अगर स्पीकर अपनी जगह पर बैठे रहेंगे तो सत्र जारी रहेगा और संसदों को आखिरकार उन्हें सुनना पड़ेगा और कार्यवाही बाधित नहीं होगी.

उन्होंने नव निर्वाचित सांसदों से यह भी कहा कि उन्हें संसदीय कार्यवाही में शामिल होना चाहिए क्योंकि इस काम के लिए उन्हें भुगतान मिलता है.

जब वे राज्यसभा के नामांकित सदस्य बने तो उन्होंने प्राइवेट बिल पेश करने की कोशिश की थी जिसमें काम नहीं तो वेतन नहीं का प्रस्ताव था.

लेकिन उनके इस बिल पर कभी चर्चा नहीं हो सकी और हर बार यह लेप्स होता रहा.

उन्होंने इस बात की ओर भी संकेत दिलाया था कि सांसदों को माननीय कहा जाता है, ऐसे में उन्हें संसद सदस्य के तौर पर मिलने वाले सम्मान और सुविधाओं के मुताबिक काम करना चाहिए.

फली नरीमन की सलाह

आजकल जिस तरह की गंदगी राजनीति के केंद्र में आ गई है, उसे देखते हुए फली नरीमन की सलाह समझदारी से भरी थी.

फली कई पुस्तकों के लेखक भी रहे. उनकी लिखी कुछ किताबों में है- 'इंडियाज लीगल सिस्टम- कैन इट बी सेव्ड?', 'गॉड सेव द ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट' और 'द स्टेट ऑफ द नेशन- इन कंटेक्स्ट ऑफ इंडियाज कंस्टीट्यूशन.'

करीब साढ़े छह दशकों तक वकालत करने और इतिहास को अपने सामने बनते हुए देखने के बाद, आख़िरी दौर में वे चिंता से भरे थे.

एक टेलीविजन इंटरव्यू में उन्होंने कहा था भारत में जो कुछ हो रहा है, उससे वे चिंतित है और उन्हें लगता है कि भारत को एक वास्तविक मायनों वाले नेता की कमी बुरी तरह खल रही है.

वे केवल भारत को लेकर चिंतित नहीं थे. उन्होंने यह भी बताया था कि पूरी दुनिया किस तरह लीडरशिप के संकट के दौर से गुजर रही है और इसने मानवता के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है.

आने वाले कई दशकों तक फली नरीमन, कानून के छात्रों और वकालत करने वालों के लिए रोल मॉडल बने रहेंगे क्योंकि उन्होंने कानून और शासन व्यवस्था के सिद्धांतों को जिस तरह से स्थापित किया, वैसा अब तक कुछ ही लोग कर पाए हैं.

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