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असमः नागरिकता की जांच कर रहे फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स पर क्यों है सवाल?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
असम में नेशनल सिटिज़न रजिस्टर यानी एनआरसी की फाइनल लिस्ट में जिन 19 लाख 6 हज़ार 657 लोगों का नाम शामिल नहीं किया गया है अब उनको फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल (एफटी) में अपनी नागरिकता साबित करनी होगी.
राज्य में एक सौ फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल पहले से ही चल रहें है लेकिन बीते 31 अगस्त को एनआरसी की फाइनल लिस्ट प्रकाशित होने के बाद सरकार ने और 200 नए ट्राइब्यूनल का गठन किया है.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के न्यायधीशों के एक पैनल ने हाल ही में फॉरेनर्स ट्राब्यूनल के 221 सदस्यों का चयन किया है.
मतलब ये कि पहले के जिन 21 ट्राइब्यूनल में मेंबर-जज नहीं थे उन पदों को भी भरा गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में असम में 1000 अतिरिक्त ट्राइब्यूनल की स्थापना को मंज़ूरी दी है.
लेकिन इन अर्द्धन्यायिक व्यवस्था वाले फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल के कामकाज को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं.
दरअसल, क़ानून के जानकारों का ये मानना है कि फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में रिटार्यड जजों की नियुक्ति होनी चाहिए वरना नागरिकता की अपील करने वाले लोगों को न्याय मिलने में परेशानी होगी.
फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल
अभयापुरी सब डिविजनल कोर्ट में साल 2002 से प्रैक्टिक्स कर रहे एडवोकेट अफ़ज़ल हुसैन ने बीबीसी से कहा, "मैं अवैध प्रवासी (निर्धारण) अधिनियम 1983 यानी आईएमडीटी क़ानून के समय से फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में मामले लड़ रहा हूं."
"दरअसल, सरकार को इन ट्राइब्यूनल में रिटार्यड जजों की नियुक्ति करनी चाहिए थी, लेकिन जब से नए वकीलों को बतौर मेंबर नियुक्त किया गया है वहां काम ठीक से नहीं चल रहा है."
"मेरे एक मुव्वकिल ने अपनी नागरिकता से जुड़े सारे काग़ज़ात अभयापुरी एफटी में जमा करवा दिए हैं, उस पर बहस भी हो चुकी है लेकिन तीन साल के बाद भी अब तक उस मामले में कोई फ़ैसला नहीं आया है. मैं हर महीने याचिका दायर करता हूं लेकिन एफटी मेंबर कोई ऑर्डर नहीं दे रहें हैं. इस वजह से मेरे मुव्वकिल तनाव में हैं."
प्रत्येक एफटी का नेतृत्व एफटी अधिनियम, 1941 और एफटी ऑर्डर 1984 के तहत नियुक्त जजों की नियुक्ति की जाती है जिन्हें फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल का मेंबर कहा जाता है.
लेकिन एडवोकेट अफ़ज़ल हुसैन के अनुसार एफटी मेंबर के प्रोटोकॉल को भले ही एक जज की हैसियत से मिलाकर देखा जाता है लेकिन इन मेंबरों के काम करने के तौर तरीक़ों में काफ़ी कमियां हैं.
नागरिकता से जुड़े फ़ैसले
अफ़ज़ल हुसैन कहते हैं, "एक जज या फिर रिटार्यड जज के पास क़ानूनी अनुभव होता है और वे एक प्रक्रिया के माध्यम से किसी मामले को सुनते हैं, उससे जुड़े दस्तावेज़ों की जांच करते है, वो कार्यपद्धति एफटी मेंबर के काम में देखने को नहीं मिलती. जबकि इन एफटी को किसी व्यक्ति की नागरिकता से जुड़े फ़ैसले लेने होते हैं."
दरअसल, एडवोकेट अफ़ज़ल हुसैन के 54 साल के मुव्वकील अब्दुल क़ादर एफटी के समक्ष एक ऐसे ही मामले में उलझे हुए हैं. जब बीबीसी ने क़ादर से संपर्क किया तो उन्होंने बताया, "मेरे पास 1966 से लेकर नागरिकता से जुड़े सारे दस्तावेज़ हैं. एफटी कोर्ट ने जो भी कागज़ात मांगे थे, मैंने वो सारे कागज़ात जमा करवाएं हैं."
"इस मामले को तीन साल हो चुके हैं लेकिन अब तक कोई फ़ैसला नहीं आया है. इस मामले की वजह से मेरा और मेरे बच्चों का नाम एनआरसी में नहीं आया है. मैं बहुत परेशान हूं. प्रत्येक तारीख पर अभयापुरी जाना पड़ता है. कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए पैसा कहां से लाएं."
वो आगे कहते है, "मेरे तीन बेटे हैं और एक बेटी है. पत्नी का नाम एनआरसी की फाइनल लिस्ट में आया है लेकिन हम पांच लोगों का नाम नहीं है. मेरे दोनों बेटे ग्रैजुएट हैं लेकिन एनआरसी में नाम नहीं होने के कारण वे नौकरी के लिए कहीं आवेदन नहीं कर पा रहें हैं. हम भारतीय हैं और प्रत्येक चुनाव में वोट डालते हैं."
फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स के मेंबर
अब्दुल क़ादर ने बताया, "लेकिन एनआरसी के कारण हम सबका भविष्य खतरे में पड़ गया है. तीन साल से हमारा पूरा परिवार टेंशन में दिन गुजार रहा है. मैंने अपने वकील से कह दिया है, चाहे स्वदेशी हो या विदेशी, हमारा फ़ैसला करवा दीजिए."
सुप्रीम कोर्ट के रिटार्यड जज मदन बी लोकुर ने हाल ही में नई दिल्ली के इंडियन सोसाइटी आफ इंटरनेशनल लॉ में आयोजित 'पीपुल्स ट्राइब्यूनल' नामक एक कार्यक्रम में स्पष्ट कहा था, "असम में फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल एक मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं. ये ट्राइब्यूनल्स अपनी प्रक्रियाओं और कामकाज को अपने दम पर विकसित कर रहे हैं."
"इनमें किसी भी तरह की एकरूपता नहीं है. यही कारण है कि दो-तिहाई आदेश एकपक्षीय हुए हैं क्योंकि उनके कामकाज में एकरूपता नहीं है. गरीब और अनपढ़ लोग जटिल प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाते हैं और नामों की वर्तनी में मामूली ग़लतियों ने हजारों लोगों को नागरिकता की अंतिम सूची से बाहर कर दिया है."
इसी 'पीपुल्स ट्राइब्यूनल' कार्यक्रम में मौजूद सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने भी कहा, "ट्राइब्यूनल के कामकाज में धार्मिक और भाषाई आधार का एक पैटर्न है. सबसे अहम बात ये है कि फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स के मेंबर का कार्यकाल और उनके वेतन और भत्ते प्रत्यक्ष तौर पर सरकार के फ़ैसले पर निर्भर होता है."
हिंदू और मुसलमान दोनों में नाराज़गी
गृह विभाग की एक जानकारी के अनुसार, शुरू में यहां 11 अवैध प्रवासी निर्धारण न्यायाधिकरण (आईएमडीटी) थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साल 2005 में अवैध प्रवासियों (न्यायाधिकरणों द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 यानी आईएमडीटी कानून को रद्द कर दिया था जिसके बाद इन्हें एफटी में परिवर्तित कर दिया गया.
इसके बाद सरकार ने 1983 में और 21 एफटी का गठन किया. बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार ने एफटी में जमा हुए मामलों को निपटाने के लिए राज्य में ट्राइब्यूनल्स की कुल संख्या सौ कर दी. इन विदेशी ट्राइब्यूनल्स के कामकाज को लेकर शुरू में किसी तरह का विवाद नहीं था.
क्योंकि उस समय इनकी संख्या कम थी और इनमें ज्यादातर रिटार्यड जजों को नियुक्त किया गया था. लेकिन 2014 के बाद से काफी संख्या में वकीलों को एफटी मेंबर के तौर पर नियुक्त किया गया और तभी से एफटी का कामकाज सवालों के घेरे में है.
इन ट्राइब्यूनल्स के फ़ैसलों को लेकर खासकर बंगाली बोलने वाले हिंदू और मुसलमान दोनों में नाराज़गी है. दरअसल एनआरसी से बाहर हुए 19 लाख से अधिक लोगों को अब अपनी नागरिकता साबित करने के लिए एफटी कोर्ट में अपील करनी होगी.
नागरिकता साबित करने का मौक़ा
एक जानकारी के अनुसार इन 19 लाख लोगों में करीब 12 लाख बंगाली बोलने वाले हिंदू है जबकि करीब 5 लाख मुसलमान है. क्या एफटी कोर्ट की मौजूदा व्यवस्था में इतनी बड़ी तादाद में अपील करने वाले लोगों को आसानी से अपनी नागरिकता साबित करने का मौका मिल पाएगा?
इस सवाल का जवाब देते हुए ग्वालपाड़ा जिला अदालत में लंबे समय से प्रैक्टिक्स कर रहे एडवोकेट नज़रूल इस्लाम कहते हैं, "फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स की मौजूदा व्यवस्था में अपील करने वाले लोगों के लिए प्रक्रिया सहज नहीं होगी. इसमें लोगों को काफी परेशानी का सामना करना होगा."
"इसका कारण है कि लोगों को एनआरसी की लिस्ट से बाहर किया गया है लेकिन उनकी नागरिकता अब भी खत्म नहीं हुई है. उन्हें विदेशी नहीं बनाया गया है. लेकिन जब ये लोग फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स के समक्ष अपील करेंगे उस समय काफी परेशानी होने वाली है. क्योंकि फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल के मेंबर की भूमिका निष्पक्ष नहीं है."
धुबड़ी ज़िला अदालत में बीते 27 साल से प्रैक्टिक्स कर रहे वरिष्ठ वकील अब्दुल मनन का कहना है, "ट्राइब्यूनल को कोर्ट नहीं कहा जा सकता. वो एक कार्यालय है. वे लोग न मजिस्ट्रेट है और न ही जज हैं. जब तक एफटी में रिटार्यड जजों की नियुक्ति नहीं की जाएगी तबतक एफटी से निष्पक्ष फैसले की उम्मीद नहीं की जा सकती."
संवैधानिक अथॉरिटी
हालांकि गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील कमल नयन चौधरी को एफटी व्यवस्था में कानूनी तौर पर कोई कमी नजर नहीं आती. वो कहते हैं, "पूरी दुनिया में जब अवैध विदेशी नागरिक का पता लगाया जाता है तो उसमें न्यायिक और अर्द्ध न्यायिक प्रक्रिया की आवश्कता नहीं होती है. इस काम को कार्यपालिका के लोग करते हैं."
"केवल असम में ही इसके विपरीत हो रहा है. कानून में जब विदेशी होने की बात आती है तो उस व्यक्ति को खुद यह साबित करना होता है कि वो विदेशी नहीं है. अभी राज्य में एफटी प्रक्रिया के जरिए जो काम हो रहा है वो पूरी तरह कानूनी है और उस पर सवाल उठाना कहीं से भी सही नहीं है."
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं असम के तीन बार लगातार मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई के कार्यकाल में ही फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल की संख्या में इजाफा किया गया था, लेकिन अब वे खुद एफटी की भूमिका पर सवाल उठा रहें है. गोगोई कहते हैं, "असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल जिस कदर काम कर रहें है उससे लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है."
"एफटी कभी किसी फौजी को विदेशी बना देते हैं. कोई पुलिस अधिकारी है तो उसे विदेशी बना दिया जा रहा है. ये ट्राइब्यूनल न्यायिक निकाय की तरह काम नहीं कर रहें है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज भी बोल रहें है कि ये (एफटी) संवैधानिक अथॉरिटी नहीं है. मानव अधिकार के लोग भी सवाल उठा रहें हैं."
क़ानूनी प्रक्रिया के तहत
अब सवाल यह भी उठ रहें है कि प्रदेश में महज़ 300 एफटी 19 लाख से अधिक लोगों की नागरिकता पर फैसला लेने में कितना समय लेंगे? इसका जवाब देते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता कहते हैं, "एनआरसी में नाम नहीं आने का मतलब ये नहीं है कि वो व्यक्ति विदेशी है."
"फिलहाल राज्य में 300 एफटी हैं और हमारी सरकार आने वाले दिनों में इनकी संख्या एक हजार करने वाली है. लिहाजा लोग अपने दस्तावेज लेकर एफटी में जा सकेंगे और अपना पक्ष रख सकेंगे. जहां तक सवाल एफटी के कामकाज को लेकर है तो गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ जजों का पैनल एफटी मेंबर का चयन करता है."
"इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं होता. यह पूरी तरह एक क़ानूनी प्रक्रिया के तहत होता है. इसके अलावा जिन लोगों को एफटी में अपील करने के बाद क़ानूनी मदद की ज़रूरत पड़गी तो हमारी सरकार ने हर ज़िले में निशुल्क क़ानूनी मदद करने की व्यवस्था की है."
अपील प्रक्रिया कब से शुरू होगी
एनआरसी राज्य समन्वयक कार्यालय ने हाल ही में जानकारी दी है कि जिन लोगों के नाम एनआरसी की फाइनल लिस्ट में शामिल नहीं किए गए है उन लोगों को जल्द से जल्द कारण बताते हुए प्रमाणित दस्तावेज़ भेजे जाएंगे ताकि वे एफटी के समक्ष अपनी अपील दायर कर सकें.
हालांकि यह अपील प्रक्रिया कब से शुरू होगी इसपर कुछ नहीं कहा गया है. लेकिन एनआरसी से नाम ख़ारिज वाले दस्तावेज़ प्राप्त करने के बाद लोगों के पास एफटी में अपील करने के लिए 120 दिन का समय रहेगा.
लेकिन वरिष्ठ वकील अब्दुल मनन का कहना है, "एफटी के पास अब जो 19 लाख लोगों की अपील आएगी उसको 120 दिन में निपटाना किसी भी तरह संभव नहीं है. एफटी के कामकाज का अब तक जो तरीका रहा है, इस तरह तो इतने मामलों को निपटाने के लिए अगले 25 साल भी कम पड़ जाएंगे."
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