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नवरुणा कांड: सुप्रीम कोर्ट का आख़िरी मौक़ा कब आएगा?
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
"केस को एक साल बीत चुका था. तब नरेंद्र मोदी अपने चुनावी प्रचार के दौरान मुज़फ़्फ़रपुर आए थे. प्रचार करके चले गए. जीत भी गए. लोगों ने कहा अब बीजेपी की सरकार आ गई है, आपके इंसाफ़ मिल जाएगा. लेकिन इंसाफ़ नहीं मिला. अब तो नरेंद्र मोदी पांच साल शासन करने के बाद दोबारा भी जीतकर आ गए हैं, लेकिन हमें कहां इंसाफ़ मिला! मुझसे बड़ा बीजेपी सपोर्टर कौन था? श्यामा प्रसाद मुखर्जी मेरे रिश्तेदार लगते थे. लेकिन मुझे तो शंका अब बीजेपी की सरकार पर ही हो रही है. वो ही नहीं चाहते कि केस उजागर हो, क्योंकि उनके लोग फंस जाएंगे."
ये शब्द मुज़फ़्फ़रपुर के अतुल्य चक्रवर्ती के हैं. जिनकी 13 साल की बेटी नवरुणा का सात साल पहले 18 सितंबर 2012 को आधी रात को घर से कथित तौर पर अपहरण हो गया था. 68 दिनों के बाद नवरुणा की अस्थियां घर से ही सटी गली के नाले से बरामद हुई थीं.
नवरुणा अपहरण कांड की जांच शुरू में मुज़फ़्फ़रपुर पुलिस ने की. बाद में यह मामला सीआईडी को दिया गया.
राष्ट्रीय सुर्खियों में आने के चलते बिहार सरकार दबाव में आ गई. तब जाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश और फिर सुप्रीम कोर्ट के कहने के बाद 14 फ़रवरी 2014 को केस सीबीआई को सौंप दिया गया.
पिछले क़रीब पांच साल से इस अपहरण कांड की जांच सीबीआई कर रही है. लेकिन उसकी जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई ने आठ बार मोहलत मांगी, कोर्ट ने सीबीआई को हर दफ़े फटकारा, जल्दी से जल्दी जांच पूरी करने को कहा.
यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा और मौजूदा चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने अपनी सुनवाइयों के दौरान सीबीआई को ये भी कह दिया कि "ये आख़िरी मौका होगा."
तारीख़ पर तारीख़
सबसे पहले 13 अक्टूबर 2017 को चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अदालत ने सीबीआई की ओर से की गई समय की मांग पर अपने आदेश में कहा कि "जांच के लिए समय मार्च 2018 तक बढ़ाया जाता है. लेकिन ये आखिरी चांस होगा."
फिर अगली सुनवाई अप्रैल 2018 को हुई. इस बार मामला चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के कोर्ट में मामला नहीं गया. सीबीआई ने केस से जुड़े अन्य मामलों से संबंधित पिटीशन किसी दूसरे कोर्ट में डालकर वहां से और छह महीने का समय ले लिया.
नवरुणा के पिता अतुल्य कहते हैं, "मैंने तब तक इंतज़ार किया. लेकिन अक्टूबर में जब छह महीना बीत रहा था तब सीबीआई दफ़्तर जाकर केस के आईओ सीबीआई के एएसपी कल्याण भट्टाचार्य से पूछा था. उन्होंने कहा कि और समय देना होगा. मैंने कहा अब एक दिन और नहीं रुकुंगा. अगली सुनवाई की तारीख दो नवंबर 2018 को मिली. लेकिन तब तक चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायर कर चुके थे. सीबीआई ने जानबूझकर देरी की."
दो नवंबर 2018 को नवरुणा का मामला नए चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अदालत में सुना गया. सीबीआई ने फिर से समय की मांग की. अदालत ने आदेश दिया, "सीबीआई की प्रार्थना पर विचार करते हुए जांच करने के लिए और छह महीने का समय दिया जाता है. लेकिन यह आख़िरी मौका होगा."
छह महीने बाद फिर से जस्टिस एएम खनविलकर और जस्टिस ए रस्तोगी की अदालत में मामले की सुनवाई हुई. सीबीआई की ओर से फिर से समय मांगा गया. जांच एजेंसी ने इस बार अदालत के सामने दलील रखी कि वे केस के तीन गवाहों/संदिग्धों की ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट कराना चाहते हैं.
इसलिए तीन महीने और दिए जाने चाहिए. अदालत ने सीबीआई की दलील को स्वीकार करते हुए तीन और महीने का समय दे दिया. केस की अगली सुनवाई की तिथि 21 अगस्त 2019 को तय हुई.
परिजनों के सवाल
जस्टिस एएम खनविलकर और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की अदालत में 21 अगस्त को हुई सुनवाई इस केस में अब तक की आख़िरी सुनवाई थी.
सीबीआई ने फिर से तीन महीने का समय मांगा. अदालत ने और वक्त दे भी दिया है. अदालती आदेश के अनुसार, तीन महीने के बाद यानी इसी साल नवंबर में समयावधि ख़त्म हो जाएगी.
लेकिन क्या इस बार नवरुणा और उनके माता-पिता को इंसाफ़ मिल पाएगा?
मेरा यह सवाल सुनकर नवरुणा की मां मैत्री चक्रवर्ती सिर पर हाथ रख लेती हैं. वो कहती हैं, "मुझे उम्मीद नहीं है." ये कहते-कहते उनका गल रुंध गया और आंखों से आंसू निकलने लगे.
अतुल्य आक्रोश में कहते हैं, "सीबीआई बस इतना बता दे कि मेरी बेटी ज़िंदा है या मर गयी? क्या वो हड्डियां जो सीबीआई ने हमें दिखायी थी, वो मेरी बेटी की हड्डियां थीं? अगर हां तो डीएनए रिपोर्ट क्यों नहीं देती?"
सीबीआई ने 11 नवंबर 2016 को नवरुणा के अपहरण के बाद हत्या की पुष्टि करते हुए धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया था.
अतुल्य कहते हैं, "सीबीआई ने मुझे धोखे में रखकर डीएनए टेस्ट करा लिया. पहले सैंपल ले लिया. बाद में हड्डियाँ दिखायीं. जब मुज़फ़्फ़रपुर पुलिस ने हड्डियां और खोपड़ी बरामद किया था तब मैंने उसे मानने से इनकार कर दिया था. क्योंकि हड्डी 68 दिनों बाद बरामद हुई थी. और जब फॉरेंसिक की जांच रिपोर्ट आयी तब उसमें कहा गया कि हत्या 15-20 दिन पहले हुई है. क्या 15 से 20 दिन में कोई लाश केवल हड्डी बन सकती है?"
डीजीपी पर आरोप
दस्तावेज़ों को दिखाते हुए अतुल्य कहते हैं, "पिछले सात साल में मेरे जीवन में जो कुछ घटा है, सब कुछ इन कागज़ों में दर्ज है. सोचा है कि इन्हें एक क़िताब की शक्ल दूंगा. ये एक पिता का अपनी बेटी को पाने के लिए संघर्ष है."
वो इन सबके पीछे बिहार के मौजूदा डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे पर आरोप लगाते हैं, "ये सब गुप्तेश्वर पांडे करा रहे हैं. वो भू-माफियाओं से मिले हुए थे. उनकी शह पर ही सब कुछ हुआ. लेकिन आज बिहार के डीजीपी बन गए हैं."
अतुल्य कहते हैं, "जिन गवाहों/संदिग्धों के ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट का हवाला देकर सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से समय मांगा था उनमें से एक गुप्तेश्वर पांडे का भी नाम था."
वो एक दस्तावेज को दिखाते हुए कहते हैं, "देखिए, मेरे पास यही एक सबूत है गुप्तेश्वर पांडे के ख़िलाफ़. 21 फ़रवरी 2013 की रात उनके क्वार्टर पर गया था. मदद की गुहार लगाई थी. तब उन्होंने इस कागज पर एके उपाध्याय (तत्कालीन एडीजी क्राइम, सीआईडी) का नंबर लिखकर दिया था. लेकिन आपको पता है! जो नंबर उन्होंने दिया था, उससे पहले भी मेरे पास फ़ोन आया था. मैंने उसमें अपनी बेटी की आवाज सुनी थी. बाद में फ़ोन कट गया था."
"जब दोबारा मैंने कॉल किया तो पता चला कि वो उड़ीसा के किसी जगह का नंबर था. बाद में जब गुप्तेश्वर पांडे के नंबर देने पर दोबारा फ़ोन किया तो एके उपाध्याय ने समय नहीं होने का हवाला देकर बात करने से मना कर दिया. बाद में जब लगाया तब बोला ग़लत नंबर है. ये सारी बात मैंने सीबीआई को भी बताई है. तब तक मेरी बेटी ज़िंदा थी. ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं. लेकिन सवाल ये है कि गुप्तेश्वर पांडे ने एके उपाध्याय का नंबर ही क्यों दिया और उसी नंबर से मेरे दोनों सिम नंबर पर कॉल क्यों आया था?"
डीजीपी क्या कहते हैं
इन आरोपों पर डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे का कहना है कि उन्हें फंसाया जा रहा है.
वो कहते हैं, "मुझे फंसाने में दो लड़के हैं. एक है हेमंत जिसके ख़िलाफ़ मैंने एक बार छेड़खानी के मामले में कार्रवाई की थी. मुझे तो फिर बाद में उससे मतलब नहीं रहा. पर वो मेरे पीछे पड़ा रहा. दूसरा लड़का है अभिषेक रंजन जो नवरुणा की बड़ी बहन नवरूपा के मित्र हैं. वही दिल्ली में रहकर इनका केस भी लड़ रहा है. अब ये दोनों क्यों ऐसा कर रहे हैं मुझे नहीं पता. पर मैं एक बात जरूर कहूंगा कि इन लोगों ने खुद केस में इतनी देरी करवाई."
"पहले को वे डीएनए टेस्ट के लिए मना करते रहे, बाद में डीएनए टेस्ट हो गया तो साबित हो गया कि वो अस्थियां नवरुणा की ही थीं. मैं अभी भी कहूंगा कि नवरुणा की हत्या उसके घरवालों ने ही की थी. जब घर के पास से लाश मिली तो मानने से इनकार कर दिया. जहां तक बात सीबीआई इंट्रोगेशन की है तो मैंने खुद सीबीआई को कहा था, मु़झसे भी पूछताछ करिए. वरना मेरे ऊपर सवाल उठेंगे."
अभिषेक रंजन ने बीबीसी को बताया, "ये मेरे लिए शॉकिंग है. डीजीपी मेरे बारे में ऐसा कह रहे हैं. यह शर्मनाक भी है. आप किसी लड़की के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं. इसके पहले भी वे ऐसा कर चुके हैं. उस समय जिसके बारे में कह रहे थे वो नाम नवरुणा का ही घर का नाम था, सोना. "
अभिषेक रंजन कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट का काम केवल ऑर्डर करना है. फ़ैसला सुनाना है. मगर जांच तो सीबीआई को करनी है. मैं इतने दिनों से केस को देख रहा हूं, मेरी जानकारी में अभी तक सीबीआई ने कोर्ट को कोई ऐसी रिपोर्ट नहीं सौंपी है जिसमें वे खुद एक परिणाम पर पहुंचे हों."
सीबीआई के डीएसपी अजय कुमार इस केस से आईओ भी हैं, वो कहते हैं, "हमारी जांच अभी चल रही है. अगली सुनवाई में हम अपनी जांच रिपोर्ट पेश करेंगे. मैं केवल इतना ही कह सकता हूं कि हमारी जांच सही दिशा में चल रही है. इसके अलावा बाकी जो कुछ भी है हम कोर्ट को बताएंगे. क्योंकि उसी की निगरानी में जांच चल रही है."
ज़मीन का विवाद
तत्कालीन सीबीआई इंस्पेक्टर आरपी पांडे उस समय इस मामले में जांच अधिकारी थे. अतुल्य का दावा है कि "अगर वे होते तो अब तक केस का सॉल्यूशन हो चुका होता, लेकिन उन्हें वीआरएस दे दिया गया."
आरपी पांडे कहते हैं, "देरी की वजह एविडेंस जुटाना था. हमारे लिए भी बहुत मुश्किल आई थी. क्योंकि सीबीआई को केस बहुत देर से मिला था करीब दो साल बाद. तब तक एविडेंस सारे इधर-उधर हो चुके थे. हमारे बाद भी लोगों को मुश्किलें आई होंगी. लेकिन मुझे उम्मीद है कि पॉजिटिव रिजल्ट आएगा."
नवरुणा केस की असल जड़ में ज़मीन का एक विवाद था. परिजनों का आरोप है कि भू-माफिया ने उनकी ज़मीन हड़पने की नीयत से अपहरण कराया था. सात कट्ठे की इसी ज़मीन पर अतुल्य चक्रवर्ती का घर है.
अतुल्य जब नवरुणा का कमरा, उसका चप्पल, उसके कपड़े और दूसरी निशानियां दिखा रहे थे तब एक टॉप जो हैंगर से लटका था, मटमैला हो गया था, उसको दिखाते हुए कहते हैं, "ये टॉप को इस तरह हमने तब से रखा है. जिस रात नवरुणा का अपहरण हुआ था. उसके पहले दिन उसने यही टॉप पहना था. उसे बहुत पसंद भी था यह. क्या पता फिर से आ जाए. ये देखकर खुश होगी."
पृष्ठभूमि
नवरुणा का केस पहले अपहरण का मामला बना. माता-पिता ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी जब अपने कमरे में सोई थी तब खिड़की का ग्रिल काटकर उसका अपहरण कर लिया गया.
मैत्री बताती हैं कि पुलिस ने सबसे पहले हम लोगों पर ही संदेह किया. पुलिस अफ़सर ये पूछते थे कि मां-बाप के रहते हुए बेटी का घर से कैसे अपहरण हो गया.
वो कहती हैं, "हमनें उन्हें भी यही बात बताई थी और अब आपको भी दिखा रहे हैं. हम लोग उसके कमरे के बगल वाले कमरे में नहीं सोए थे. हमारा कमरा कम से कम 20 फीट की दूरी पर है. अतुल्य हाई ब्लड प्रेशर और दिल के रोगी हैं. उन्हें रात में नींद की गोलियां खाने के बाद ही नींद आती है. उस रात भी गोलियां खाकर सो गए. उस दिन तीज का पर्व भी था. हम लोग तो नहीं मनाते तीज, मगर मुहल्ले के सारे लोग उस दिन काफी रात तक जगे थे."
अतुल्य उन्हें बीच में ही रोकते हुए कहते हैं, "मैंने सीबीआई को कहा था कि अपहरण पुलिस की गाड़ी रोड पर लगाकर की गई थी. ताकि किसी को पता नहीं चल सके. लेकिन पुलिस ने उल्टा हम लोगों पर ही संदेह किया कि हमने ज़मीन का पैसा बचाने के लिए अपनी बेटी को मार दिया."
अब तक क्या-क्या हुआ?
पिछले सात साल के दौरान केस के आठ अनुसंधानकर्ता बने. तीन मुजफ्फरपुर पुलिस के, दो सीआईडी के और तीन सीबीआई के.
लेकिन जांच कितनी हुई? इसके बारे में कोई नहीं जानता. जब तक मामला पुलिस और सीआईडी तक था, तब तक तो सबको मालूम चल जाता था कि केस में क्या हो रहा है. मगर जब से सीबीआई की जांच हुई है, किसी को कुछ नहीं मालूम. खुद नवरुणा के माता-पिता यह कहते हैं.
वे कहते हैं, "हमने जब भी उनसे यह सवाल किया वह जवाब सुप्रीम कोर्ट में देने की बात करने लगते. उनकी कार्रवाई जो दिखती है वो सिर्फ इतनी ही है कि उन लोगों ने सात अभियुक्तों को एक साल तक पकड़ कर रखा. तीन-तीन बार रिमांड पर लिया. अब सब जमानत पर हैं. लेकिन विडंबना देखिए इतने दिनों की पूछताछ में वे किसी परिणाम तक नहीं पहुंच सके."
सीबीआई ने जिन सात लोगों को गिरफ्तार किया वे सारे वही भू-माफिया हैं, जिनपर आरोप लगा है. ये नाम हैं रमेश कुमार, सुदीप चक्रवर्ती, श्याम पटेल, शब्बू, बीकू शुक्ला, रमेश अग्रवाल, राकेश सिंह.
अतुल्य बातचीत में कहते हैं, "हम यहां के लिए भाषायी अल्पसंख्यक थे. बंगाली थे. हमें कमज़ोर समझ कर दबाया गया. इसके पहले भी बंगाली लोगों के साथ ऐसा किया था. उन्हें प्रताड़ित करने की कोशिश की गई थी. एके भादुड़ी और एचएस मुखर्जी पर हमले करवाए गए थे."
जब हम नवरुणा के घर से निकलने लगे उनकी मां मैत्री चक्रवर्ती ने रोक लिया. कहने लगीं, "इस ज़मीन के लिए इतना कुछ हो गया. मेरी फूल जैसी बेटी को हमसे जुदा कर दिया. अब चाहते हैं कि यहां से सब कुछ बेच कर चले जाएं. मगर अब कोई ख़रीदार ही नहीं मिल रहा."
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