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ट्रैफिक नियम: हे जनता तू लाइन में लग और सभ्य बन- व्यंग्य
- Author, सुधीश पचौरी
- पदनाम, लेखक, बीबीसी हिंदी के लिए
अपनी जनता इन दिनों बहुत परेशान है. या तो घर में बंद रहती है या 'प्रदूषण कंट्रोल' वाले के यहां चार-पाँच पांच घंटे लाइन में खड़ी है या फिर कहीं ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने या रिन्यू कराने में लगी है.
कारों की बिक्री में गिरावट भले हो. इकोनॉमी नाक के बल भले खड़ी हो लेकिन हेलमेट का बाज़ार गर्म हो गया है. कहीं कोई हेलमेट ख़रीद रहा है तो कोई कार की पेटी कसवा रहा है. कहीं कोई अपनी आरसी खोज रहा है तो कोई नंबर प्लेट ठीक करा रहा है और कोई लाइटें ठीक करा रहा है.
कोई सोचता है, अपनी गाड़ी तो जी का जंजाल है कोई कहता है अपनी गाड़ी क्यों ख़रीदूं और फिर ट्रैफ़िक पुलिस से ख़ौफ़ खाऊं? क्या पता किस बात पर चालान कर दे? क्यों न ओला-ऊबर से काम चलाऊं.
नए ट्रैफ़िक क़ानून को लागू करने वालों को कौन समझाए कि एक तो कार बाज़ार बैठा हुआ था और इस एक्ट ने उसे और ठंडा कर दिया. कर लो इकोनॉमी का इलाज!
जब से नया ट्रैफ़िक क़ानून लागू हुआ है तब से जनता ने सड़क पर निकलना बंद कर दिया कि कहीं कोई ट्रैफ़िक पुलिस वाला 10-20 हज़ार का ज़ुर्माना न ठोक दे.
कई इसे 'ट्रैफ़िक टेरर' कहते हैं. ट्रैफ़िक वाले वाक़ई 'टेरिफ़िक' नज़र आते हैं. कश्मीर में लोग कर्फ़्यू के कारण भले न निकलते हों लेकिन इधर तो बिना कर्फ़्यू के ही कर्फ़्यू है.
ये क्या हो रहा है?
मंत्री जी कहते हैं कि हम तो जनता की जान बचाना चाहते हैं. हर बरस देश में हज़ारों दुर्घटना में मारे जाते हैं या विकलांग हो जाते हैं. हमारे लिए जनता की ज़िदंगी क़ीमती है.
हमें तो यह सब बकवास लगता है. जो जनता पांच हज़ार साल पहले 'विश्व गुरु'रही है, जिसने दुनिया को ज्ञान दिया हैं और 'सभ्यता जहां पहले आई'वाला राष्ट्रगीत गाती रहती है, उसे सभ्य बनाने वाले आप कौन?
अरे भैया! हमारी ज़िंदगी! हम जानें! आप काहे मरे जाते हो? हानि-लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ! किसी की सड़क पर आई है आएगी. होनी को कौन रोक सकता है?
अब क्या बताएं आपको! जब से मोटर ट्रैफ़िक व्हीकल एक्ट लागू हुआ है तब से अपनी दिल्ली की सड़कें मनहूस हो गई हैं. न सड़क पर भों भों न पों पों. बिना लाइसेंस वाले नौनिहाल अपने 'डैड की ऑडी, मर्सिडीज़ या ट्योटा दौड़ाकर रौंदना भूल गए हैं. बिना हेलमेट युवक मोटरसाइकिल से रेस करना भूल गए हैं.
बाइक पर तरह-तरह के करतब दिखाना भूल गए हैं. ग़लत तरीक़े से टेक ओवर करते हुए और जो टोके उसे ठोकते हुए 'रोड रेज़' करना बंद हो गया है. जहां तीस की स्पीड से चलना है वहां सौ की स्पीड से फर्राटा भरना असंभव हो गया है...कितना मनहूस बना दिया है हमारी 'सड़क कल्चर' को?
अरे भैया! हमें नहीं चाहिए ऐसी मनहूस सडकें! ये तो अमरीका यूरोप को फबती हैं. और फिर हमें कब तक लाइन में लगाओगे. पहले आधरकार्ड ने लगाया. फिर नोटबंदी ने लगाया. अब लाइसेंसों के लिए लगे हैं. आधी उम्र तो लाइनों में ही गुज़र गई बावजूद दस बीस हज़ार का ज़ुर्माना!
सब तरफ़ ट्रैफ़िक पुलिस का आतंक है. ज़रा ज़रा सी चूक पर दस बीस हज़ार का चालान काट रही है. स्कूटर ठहरा पांच हज़ार का लेकिन रसीद काट दी तेईस हज़ार की. छोरे ने स्कूटर सड़क पर ही छोड़ गया.
एक ट्रक वाले का तो सीधे दो लाख का चालान काटा. ग़ाज़ियाबाद में एक बंदा अपनी गाडी में माता-पिता के साथ आ रहा था कि पुलिस वाले ने रोक लिया कि ये दिखा वो दिखा. इसी के चक्कर में उस डाइबिटिक को हार्ट अटैक हो गया. कहां तक बताऊं इस नए 'ट्रैफ़िक टेरर'को.
जनता कह रही है कि सड़क सभ्यता सिखानी थी तो भैया पहले प्यार से सिखाते समझाते. न मानते तो कहते?
पुलिस कहती है कि जब तक डंडा न हो तब तक लोग नहीं मानते. भय बिनु होइ न प्रीति! और हम कह भी क्या रहे हैं इतना ही न किः
लेन में चल! ग़लत 'ओवर-टेक' मत कर! पेटी बांध! ड्राइविंग लाइसेंस रख! आरसी रख! लाइट ठीक रख! बीमा करा. इंडीकेटर दे! स्पीड लिमिट देख. लालबत्ती पर रुक. बाएं देख. दाएं देख. हरी बत्ती पर चल! 'ओवर-लोड' मतकर...नहीं तो दस बीस हज़ार के लिए तैयार रह! अब सब मान रहे हैं न! जब से एक्ट लागू किया है, एक्सीडेंट कम हो गए हैं.
फिर भी कुछ ही राज्य सरकारों को जनता का यह सड़क-दर्द समझा जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड या बंगाल की सरकारें. इन्होंने एक्ट तुरंत लागू नहीं किया. ये उसमें संशोधन की बात कर रहे हैं.
हम तो कहेंगे कि 'सिविल सेंस' प्राप्त करने और सभ्य नागरिक बनने के लिए जनता को इतना तो सहना ही होगा. पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी तभी तो बन सकती है जब जनता लाइन में रहे! नए भारत को चाहिए नई जनता. एकदम आज्ञाकरी जनता. लाइन में लगी अनुशासित जनता!
इसलिए हे जनता! तू लाइन में लग! सभ्य बन! सिविल सेंस सीख! नोन्सेंस मत बन!
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