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क्या बीएस-6 के कारण है ऑटो सेक्टर में सुस्ती?
ऑटो सेक्टर में मौजूदा भारी सुस्ती के लिए मांग में कमी के अलावा प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए नए उत्सर्जन मानक बीएस-6 को भी ज़िम्मेदार माना जा रहा है.
मंगलवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटो सेक्टर में जारी गिरावट के लिए बीएस-6 को भी एक कारण बताया.
असल में सरकार ने मौजूदा बीएस-4 मानक के बाद बीएस-5 की जगह सीधे 31 मार्च 2020 के बाद बीएस-6 मानक लागू करने का फ़ैसला लिया है.
यानी इसके बाद नए मानक के अंतर्गत बने वाहन ही कंपनियां बेच सकेंगी.
सरकार ने 2000 में यूरोप की तर्ज़ पर उत्सर्जन मानक से जुड़ी नीति बनाई और 2002 में बीएस-1 (भारत स्टेज-1) लागू किया था.
नए मानकों में बहुत सारी बातों को शामिल किया गया है जैसे नई गाड़ियों के इंजन नए मानक के हिसाब से बनेंगे और जो ईंधन इस्तेमाल किया जा रहा था उसको भी मानक के अनुरूप लाना होगा.
लेकिन उत्सर्जन मानकों को लागू करने के लिए जो संक्रमण समय दिया गया उसे लेकर ऑटो उद्योग के दिग्गज शुरू से ही चिंता जता रहे हैं.
क्या ये इनवेंट्री करेक्शन है?
बीते जून में ही मारुति सुज़ुकी मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ केनिची आयुकावा ने कहा, "इस संक्रण के दौरान कुछ उतार चढ़ाव होंगे और ये भी हो सकता है कि मांग में भी कमी आए....जबतक बीएस-6 ग्राहकों के लिए एक सामान्य बात नहीं बन जाती, इसमें कुछ समय लगेगा."
उन्होंने कहा कि 'इतनी तेज़ी और साहसिक तरीक़े से किसी भी देश में प्रदूषण मानक लागू नहीं किए गए यहां तक कि जापान में भी नहीं.'
उनका कहना था कि इस तरह की तकनीक लाने के लिए काफ़ी निवेश करना पड़ेगा और इससे कारें और महंगी हो सकती हैं.
वाहन निर्माताओं के संगठन सियाम ने कहा है कि अगस्त महीने में पैसेंजर वाहनों, वाणिज्यिक गाड़ियों और कारों की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की गई है.
बयान के मुताबिक़, ऑटो सेक्टर में लगातार 9वें महीने गिरावट दर्ज की गई है.
नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर सियाम के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "इस सेक्टर में मौजूदा गिरावट के लिए कई फ़ैक्टर ज़िम्मेदार हैं, जिसमें बीएस-6 संक्रमण भी शामिल है क्योंकि इससे कंपनियों को अपने उत्पादन को नई टेक्नोलॉजी की ओर ले जाना पड़ रहा है."
उनके मुताबिक़, "इस वजह से कंपनियां पुराने प्रदूषण मानकों के आधार पर होने वाले उत्पादन में कटौती कर कर दी है, इसे इनवेंट्री करेक्शन कहते हैं. जब भी प्रदूषण मानक बदलते हैं ये होता है. कंपनियों की ये कोशिश है कि 31 मार्च की समय सीमा तक पहुंचते पहुंचते थोड़ी इनवेंट्री करेक्शन हो जाए."
उनका कहना है कि डीज़ल कारों को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की ख़बर ने भी बाज़ार में पस्ती का माहौल पैदा किया है और इस पर अभी भी असमंजस की स्थिति है.
प्रदूषित गैसें जिन्हें रोकेगा बीएस-6
कार्बन डाईऑक्साइड, कर्बन मोनो ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे घातक गैसें इंटरनल कंबशन इंजन से पैदा होती हैं. इसके अलावा डीज़ल और डायरेक्ट इंजेक्शन पेट्रोल इंजन से पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) पैदा होते हैं.
प्रदूषण को कम करने के लिए ईंधन के जलने वाले चैंबर को और परिष्कृत किया जाता है जिससे बाईप्रोडक्ट कम निकलें.
इसके अलावा पर्टिकुलेट मैचर और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषण को रोकने के लिए अतिरिक्त तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.
बीएस-4 के ईंधन में सल्फ़र की मात्रा 50 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम होता था जबकि बीएस-6 में ये 10 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम होगा.
बीएस-6 में एक्स्ट्रा क्या है?
बीएस-4 के मुक़ाबले बीएस-6 में नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन पेट्रोल इंजन में 25 प्रतिशत और डीज़ल इंजन में 68 प्रतिशत कम होगा. डीज़ल इंजन में पर्टिकुलेट मैटर का स्तर भी 82 प्रतिशत कम करना होगा.
और पहली बार पर्टिकुलेट मैटर के नियंत्रण के लिए डायरेक्ट इंजेक्शन वाले पेट्रोल इंजन को भी दायरे में लाया गया है.
दिलचस्प बात ये है कि बीएस-4 में पेट्रोल और डीज़ल इंजनों के लिए अलग-अलग मानक थे. बीएस-6 में अब ये अंतर बिल्कुल कम हो जाएगा.
जब साल 2016 में भारत सरकार ने तय किया था कि अप्रैल 2020 तक बीएस-6 के मानक लागू कर दिए जाएंगे तो साथ ही रिफ़ायनरी के लिए 30 हज़ार करोड़ रुपए के निवेश की बात कही गई थी.
बीते महीने वित्त मंत्री ने आर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जो कई घोषणाएं कीं उसमें बीएस-4 के वाहनों की ख़रीद बिक्री की समय सीमा को जून 2020 तक बढ़ाने की बात भी है.
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