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आज के दौर में दलित राजनीति वामपंथी और दक्षिणपंथी राजनीति के ध्रुवीकरण की शिकार हो गई है: सूरज येंगड़े
- Author, अभिजीत कांबले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जब तक कोई सूरज येंगड़े को हाल ही में प्रकाशित हुई एक विवादित किताब 'कास्ट मैटर्स' (Caste Matters) के लेखक के तौर पर नहीं जानता है, तब तक वो उनके अफ्रीकियों जैसे लंबे बाल, शानदार सूट और आत्मविश्वास से भरे उनके चेहरे से ही उनकी पहचान करता है. सूरज येंगड़े का व्यक्तित्व सहज आत्मविश्वास से भरा हुआ है.
ट्विटर-बाओ में सूरज येंगड़े का परिचय आंबेडकरवादी और अफ्रीकीवादी है. वो महाराष्ट्र के नांदेड़ ज़िले से ताल्लुक़ रखते हैं. इस वक़्त वो अमरीका की हारवर्ड यूनिवर्सिटी में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो के तौर पर काम कर रहे हैं.
पिछले महीने आई उनकी किताब, 'कास्ट मैटर्स' (Caste Matters), इस समय चर्चा का विषय बनी हुई है. बहुत से लोग सूरज येंगड़े के लेखन की तारीफ़ कर रहे हैं. लेकिन, इस किताब की काफ़ी आलोचना भी हो रही है.
आख़िर इस किताब में क्या लिखा है? और इससे जुड़े विवाद पर सूरज येंगड़े का क्या कहना है?
मैंने उनसे उनकी किताब और कई दूसरे मुद्दों पर बात की. ग़रीबी में गुज़रे उनके बचपन से लेकर उनके यहां तक के सफ़र के बारे में भी चर्चा हुई. इस दौरान उन्हें कई भेदभाद और तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा. बातचीत में उन्होंने हमें ये भी बताया कि किस तरह अपनी पढ़ाई के लिए उन्होंने चार महाद्वीपों का सफ़र तय किया.
ये लेख सूरज येंगड़े के साथ हुई बातचीत पर आधारित है. 'कास्ट मैटर्स', सूरज येंगड़े की दूसरी किताब है, जिसे पेंगुइन ने प्रकाशित की है.
महाराष्ट्र के नांदेड़ की भीम नगर कॉलोनी में ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे एक परिवार में उनका जन्म हुआ था. यहीं सूरज का बचपन गुज़रा था. स्कूल के दिनों में सूरज को खेत मज़दूर के तौर पर और ट्रक ड्राइवरों के क्लीनर के तौर पर भी काम करना पड़ा था.
सूरज येंगड़े ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई नांदेड़ में ही पूरी की. इसके बाद थोड़ा वक़्त मुंबई में गुज़ारने के बाद वो उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए विदेश चले गए. सूरज येंगड़े ने अफ्रीका, यूरोप और अमरीका के कई संस्थानों में अध्ययन किया है. वो किसी अफ्रीकी विश्वविद्यालय से पीएचडी हासिल करने वाले पहले दलित विद्वान हैं. सूरज ने दक्षिण अफ्रीका की जोहानिसबर्ग यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की है.
उन्होंने दलित चिंतक आनंद तेलतुम्बड़े के साथ मिलकर, 'द रेडिकल इन आंबेडकर' (The Radical in Ambedkar) नाम की किताब भी संपादित की है.
अपनी किताब 'कास्ट मैटर्स' (Caste Matters) के बारे में सूरज येंगड़े के विचार-
सूरज येंगड़े ने 'कास्ट मैटर्स' में भारत में जाति की हक़ीक़त के बारे में विस्तार से चर्चा की है. उन्होंने इसमें अपने साथ हुए भेदभाव और तकलीफ़ों का भी ब्यौरा दिया है और साथ ही आज के भारत में दलितों की स्थिति के बारे में भी लिखा है. साथ ही सूरज ने इस किताब में जाति-विरोधी आंदोलनों की चुनौतियों पर भी चर्चा की है.
इस किताब को लिखने का मक़सद बताते हुए सूरज येंगड़े कहते हैं, ''मैंने पूरी दुनिया के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की समीक्षा की. जब मैंने उस नज़रिए से भारत पर नज़र डाली, तो मेरी कोशिश बाक़ी दुनिया से भारत के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों की तुलना करने की थी.''
भारत में दलित आंदोलन की मौजूदा स्थिति क्या है? मीडिया में मौजूद आर्थिक रूप से संपन्न लोगों, साहित्य की दुनिया में मौजूद ऊंचे दर्जे के लोगों और उद्योग जगत के उच्च वर्गों की स्थिति क्या है?
सूरज येंगड़े कहते हैं, ''जब मैंने इन सभी वर्गों को तुलनात्मक नज़रिए से देखा, तो मैंने ये पाया कि भारतीय संदर्भ में जाति सबसे अहम मुद्दा है. आप किसी भी धर्म से ताल्लुक़ रखते हों, आप किसी भी क्षेत्र के रहने वाले हों, और आपकी विचारधारा कुछ भी हो, सभी को जोड़ने वाली चीज़ जाति ही है. आप किसी ख़ास जाति में पैदा हुए हैं तो आप को उसी के साथ जीना होता है. अगर आप अपनी जाति के बंधन से छुटकारा पाना भी चाहें, तो वो आप का पीछा नहीं छोड़ती.''
दलितों का वर्गीकरण-
अपनी किताब में सूरज येंगड़े ने दलितों को कई वर्गों में बांटा है. उनकी किताब के एक अध्याय का नाम है- द मेनी शेड्स ऑफ़ दलित्स (The Many Shades of Dalits). इसमें सूरज ने दलितों को कई दर्जों में बांटा हैं. मसलन-
टोकन दलित. इसके दो उप वर्ग हैं. कट्टरपंथी और प्रतिक्रियावादी.
उच्च वर्ग के दलित-ये नौकरीपेशा पाखंडी हैं, जो तीसरी पीढ़ी के दलित हैं.
आत्ममुग्ध दलित-नुक़सानदेह दलित, क्रांतिकारी दलित.
अपनी किताब में सूरज ये तर्क देते हैं कि विशेषाधिकार से लैस दलित भी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से निचले दर्जे के लोगों से जातिगत भेदभाव करते हैं. इसका नतीजा ये होता है कि सभी दलितों की एकजुटता नहीं मुमकिन हो पाती. इससे दलित विरोधी ताक़तों के ख़िलाफ़ संघर्ष में दरारें पड़ जाती हैं.
दलितों के इस वर्गीकरण के लिए बहुत से लोग सूरज येंगड़े की आलोचना कर रहे हैं.
आंबेडकरवादी आईएएस अधिकारी, राजा शेखर वुन्द्रू, जो ख़ुद भी एक लेखक हैं, ने सूरज की किताब की समीक्षा करते हुए द ट्रिब्यून (The Tribune) अख़बार में लिखा, ''सूरज येंगड़े की किताब किसी ड्राइंग रूम में बैठ कर परिचर्चा करने का नतीजा लगती है. ये एक अनजान रास्ते पर चलने का जोखिम लेती मालूम होती है और दलित आंदोलन पर तगड़ा प्रहार करती है. उसके निशाने पर दलित मध्यम वर्ग है, जिसे जातीय वर्गीकरण के नाम पर निशाना बनाया जा रहा है.''
विद्वान जादूमणि महानंद ने सूरज येंगड़े की किताब की समीक्षा में, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में क्रांतिकारी आंदोलन का पाखंड (Faking radicalism in a global context) एक लेख लिखा है.
इसमें महानंद ने सूरज येंगड़े की किताब की कड़ी आलोचना की है. वो कहते हैं कि दलित अपने आप में एकजुटता लाने वाला वर्ग है और सूरज द्वारा इसका अन्य वर्गों में विभाजन नहीं किया जा सकता है.
ऐसी आलोचनाओं के जवाब में सूरज येंगड़े कहते हैं कि इस वर्गीकरण के ज़रिए उन्होंने ये दिखाने की कोशिश की है कि दलित अपने आप में एक समान समुदाय नहीं हैं. और इसके अंदर कई वर्ग मौजूद हैं, जिनकी अपनी अलग-अलग अपेक्षाएं हैं. वो कहते हैं कि उनका इरादा दलितों को एक खांचे में जमा करने वाली सोच को चुनौती देने का है.
सूरज के अनुसार दलितों का विभाजन न तो नकारात्मक है और न ही सकारात्मक. ये तमाम वर्गों की अपेक्षाओं को बयान करने वाला है, जिसे आज बताए जाने की सख़्त ज़रूरत है.
सूरज कहते हैं, ''असल में दलितों को देखने का एक बेहद रूढ़िवादी नज़रिया विकसित किया गया है. मसलन, अगर हम उच्च शिक्षा को पैमाना बनाएं, तो पता चलता है कि देश के कुल ग्रेजुएट छात्रों में से तीन फ़ीसद भी दलित नहीं हैं. लेकिन, वो लोग इन तीन प्रतिशत स्नातकों की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि देखो, दलितों की स्थिति बदल गई है. मैं इस सोच के पार जाना चाहता था. मैं ये बताना चाहता था कि दलितों में भी कई वर्ग हैं. उनकी अलग-अलग अपेक्षाएं और आकांक्षाएं हैं.''
वो आगे कहते हैं, ''ये वर्गीकरण दलित समुदायों की उम्मीदों और आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है. आज इसे बताए जाने की ज़रूरत है. मेरा तर्क ये है कि जाति व्यवस्था के माहौल के चलते दलितों के बीच भी इतने वर्ग पैदा हो गए हैं.''
ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ ब्राह्मणों की आवाज़-
सूरज येंगड़े की किताब में एक अध्याय है-'ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ ब्राह्मण'. इस अध्याय के लिए भी सूरज को आलोचना का सामना करना पड़ा है.
आरोप ये लगा है कि सूरज ने इस चैप्टर में ब्राह्मणों का महिमामंडन किया है.
हालांकि सूरज इस आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि ब्राह्मणों के ऊपर ये ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है कि वो जाति विरोधी आंदोलन में सक्रिय रूप से शरीक हों. और उन्होंने ये चैप्टर इसी इरादे से लिखा.
इसको और विस्तार से समझाने की कोशिश करते हुए सूरज येंगड़े कहते हैं, ''जाति व्यवस्था दलितों ने नहीं बनाई. ये उनके ऊपर लादी गई व्यवस्था है. आज हम उस व्यवस्था का ख़ात्मा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसकी स्थापना में हमारा कोई रोल नहीं था. मेरा कहना है कि जिन्होंने इस व्यवस्था को शुरू किया, उन्हें इसके समापन के संघर्ष में सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए. चूंकि ब्राह्मणों को सदियों से सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से विशेषाधिकार मिले हुए हैं. तो वो दलितों की आवाज़ बुलंद करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में केवल दलित ही क्यों जाति विरोधी आंदोलन के लिए संघर्ष करें? जाति व्यवस्था का अंत समाज के सभी तबक़ों के लिए फ़िक्र की वजह होनी चाहिए.''
वो आगे कहते हैं, ''जब मैं ब्राह्मणों के बारे में बात करता हूं, तो मेरा अर्थ ब्राह्मण जाति से नहीं होता, बल्कि ब्राह्मणवादी सोच से होता है, जो ख़ुद को औरों से ऊपर मानती है. महात्मा फुले और बाबासाहेब आंबेडकर के शुरू किए हुए आंदोलन में ब्राह्मण और ग़ैर-दलित जातियों के लोग भी शामिल हुए थे.''
सूरज के अनुसार आज वो ऐसे लोगों को जाति विरोधी आंदोलन से जुड़ा हुआ नहीं देखते हैं.
वो पूछते हैं कि वो आख़िर कहां हैं?
सूरज कहते हैं, ''हम दुनिया के कई आंदोलनों के साथ ऐसा होते हुए देखते हैं. अमरीका में अश्वेत समुदाय, गोरे लोगों के बीच फैले नस्लवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है.''
दलित पूंजीवाद
पिछले कुछ बरसों से दलित पूंजीवाद की बड़ी चर्चा हो रही है. दलित उद्योगपतियों का एक संगठन डीआईसीसीआई इस चर्चा के केंद्र में है. ऐसा दावा किया जाता है कि दलित पूंजीवाद, दलितों के उद्धार का एक माध्यम है. सूरज ने अपनी किताब में एक पूरा अध्याय दलित पूंजीवाद पर लिखा है.
उन्होंने दलित पूंजीवाद को लेकर खुलकर ऐतराज़ जताया है. वो कहते हैं कि दलित पूंजीवाद का विचार तो अच्छा है. लेकिन उसकी बुनियाद बहुत कमज़ोर है. दलित पूंजीवाद के प्रणेताओं का कहना है कि वो अश्वेत पूंजीवादियों की तरह काम करेंगे. लेकिन, जब आप अश्वेत पूंजीवाद की शुरुआत और उसके सफ़र को देखते हैं, तो आप को लगता है कि दलित पूंजीवाद और अश्वेत पूंजीवाद में कितना बड़ा फ़ासला है.
सूरज येंगड़े का कहना है कि अगर आप के पास पूंजी है, तो भी आप को भेदभाव का सामना करना पड़ता है. वो कहते हैं कि दलित एक ज़माने से पूंजीवादी रहे हैं. एलेनॉर ज़ेलियट ने लिखा है कि भारत में 19वीं सदी में महार जाति के दलित पूंजीवादी थे. ब्रिटिश राज के कई दस्तावेज़ इस बात की पुष्टि करते हैं.
वो कहते हैं, ''उत्तरी भारत में चमार पूंजीवादी रहे हैं. क्या इससे जाति व्यवस्था ख़त्म हो गई? क्या इससे कुछ बदलाव आया? बल्कि हुआ ये कि पूंजीवाद ने दलितों को अपने में समाहित कर लिया.''
सूरज कहते हैं कि पूरी दुनिया में पूंजीवाद को विरोध का सामना करना पड़ रहा है. पूंजीवादियों को ख़ुद पता है कि उनके लिए सबसे बड़ा ख़तरा वो हैं जो सबसे ज़्यादा सताए हुए हैं और संसाधन विहीन हैं.
भारत में दलित सबसे ज़्यादा शोषित हैं.
सूरज के अनुसार आज पूंजीवाद, इस वर्ग को अपने अंदर समाहित करने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए पूंजीवादी ताक़तें सरकार का इस्तेमाल कर रही हैं.
दलित आंदोलन का भविष्य क्या होगा?
आज के दौर की दलित राजनीति और दलित आंदोलन के बारे में सूरज का कहना है कि दलित आंदोलन इस वक़्त बहुत ही सीमित दायरे में काम कर रहा है. आज दलितों के वज़ीफ़ों पर ख़तरा मंडरा रहा है. भारत के संविधान के प्रणेताओं में दलित भी रहे हैं. लेकिन, आज संविधान में दलितों के सामने ही बदलाव किया जा रहा है. इन सब का मतलब क्या है? इसका मतलब ये है कि दलित आंदोलन के पास दूरदृष्टि का अभाव है.
इसमें आकांक्षाओं को शामिल करने की क्षमता नहीं है. आज दक्षिणपंथी और वामपंथी आंदोलन, बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर दलित आंदोलन पर क़ाबिज़ होने की कोशिश कर रहे हैं. तो, एक तरीक़े से हर वर्ग आज आंबेडकर को अपनाने को उत्सुक दिख रहा है. लेकिन, वो आंबेडकर की संपूर्ण सोच को अपनाने को तैयार नहीं हैं, वो आंबेडकर के आंदोलन की धार पर क़ब्ज़े की कोशिश कर रहे हैं.
आज दलित राजनीति भी वामपंथ और दक्षिणपंथ के ध्रुवीकरण की शिकार हो गई है. दलित राजनीति को दक्षिणपंथ विरोधी होना चाहिए. लेकिन, दक्षिणपंथ विरोधी राजनीति में गठबंधन के अभाव के चलते, दलित राजनीति का भविष्य बहुत अच्छा नहीं दिखता है.
वो कहते हैं, ''मैं आज के युवा वर्ग को लेकर बहुत फ़िक्रमंद हूं. आज के युवा फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर लाइक करने और कमेंट करने में मसरूफ़ हैं. उनके सामने एक केंद्रीकृत और मज़बूत एजेंडा है ही नहीं. हालांकि कुछ युवा इस बात के अपवाद हैं लेकिन, व्यापक नज़रिए से देखें तो एक बड़ा ख़ालीपन साफ़ नज़र आता है."
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