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क्या चिदंबरम को जेल भेजने के पीछे है राजनीति - नज़रिया
- Author, शिवम विज
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दुनिया गोल है. 2011 में जब पी चिदंबरम गृह मंत्री थे तो उन्होंने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जिस इमारत का उद्घाटन किया था, बुधवार को गिरफ़्तारी के बाद उसी सीबीआई मुख्यालय की इमारत में उन्हें रात बितानी पड़ी.
जब चिदंबरम गृह मंत्री थे, तब सीबीआई ने सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में हत्या के आरोप में गुजरात सरकार में तब के मंत्री अमित शाह को गिरफ़्तार किया था. आज अमित शाह गृह मंत्री हैं और पी चिदंबरम को सीबीआई ने गिरफ़्तार किया है.
चिदंबरम न केवल मोदी के दाहिने हाथ माने जाने वाले अमित शाह के लिए परेशानी खड़ी की बल्कि सीधे तौर पर मोदी पर भी हाथ डाला. 2002 गुजरात दंगे की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) कर रही थी. वहां मोदी को फंसाने की कोशिश की गई, उनका मानना था कि जांच एजेंसी को चिदंबरम की शाह हासिल थी.
भगवा आतंक
बीजेपी के नज़रिये में यह बहुत बुरा था लेकिन चिदंबरम यहीं नहीं रुके उन्होंने 2010 'भगवा आतंकवाद' शब्दावली का उपयोग करते हुए पूरे संघ परिवार को निशाने पर लिया.
उन्होंने आतंकवाद पर एक सम्मेलन के दौरान कहा, "अतीत में हुए कई बम विस्फोटों से जुड़ा हाल ही में भगवा आतंकवाद का नया स्वरूप सामने आया है. मेरी सलाह है कि हम हमेशा सतर्क रहें और केंद्र और राज्य स्तर पर आतंकवाद को रोकने की अपनी क्षमताएं बढ़ाना जारी रखें."
इस टिप्पणी पर बीजेपी ने तुरंत ही हंगामा खड़ा कर दिया. हिंदुत्व ताक़तों ने 'हिंदुत्व' से 'आतंकवाद' को जोड़ना उसे अवैध साबित करने की कोशिश के रूप में देखा, जिसे अब तक इस्लामिक ताक़तों से ही जोड़ा जाता था.
हालांकि अंत में सभी इस बात पर सहमत हुए कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है, लेकिन जो नुकसान होना था वो हो चुका था.
चाहे वो जांच स्पष्ट थी या नहीं (कुछ धमाकों के तार हिंदुत्व संगठन से जुड़े पाए गए थे), लेकिन यह राजनीतिक रूप से आत्मघाती बना क्योंकि इससे बीजेपी और संघ को सेक्युलर साजिश का शिकार होने का कार्ड खेलने का मौका मिल गया.
कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से चिदंबरम की बातों का खंडन करना पड़ा. जनार्दन द्विवेदी ने कांग्रेस के एक वक्तव्य में तब कहा था, "यह विवाद एक शब्द की वजह से शुरू हुआ है. (जिस सम्मेलन में गृह मंत्री ने विवादित बयान दिया था) उनके एजेंडे में भगवा नहीं बल्कि आतंकवाद था और आतंक का कोई रंग नहीं होता. यह पूरी तरह से काला है. भगवा, लाल, हरा या सफ़ेद, आप चाहे इसे जिस किसी से जोड़ें... आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता. आतंकवाद की निंदा की जानी चाहिए. भाषा का उपयोग करने में संयम बरतना ज़रूरी है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि लोगों को किसी भी रंग पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए क्योंकि सभी रंग का अपनी एक परंपरा और इतिहास है."
आईएनएक्स मामला
चिदंबरम के ख़िलाफ़ ताज़ा मामला क़ानूनी से अधिक राजनीतिक है. यह तो स्पष्ट है. लेकिन मामला क़ानूनी है. जब चिदंबरम यूपीए-1 के दौरान वित्त मंत्री थे तब आईएनएक्स नाम की एक मीडिया कंपनी को 305 करोड़ रुपये के विदेशी निवेश की अनुमति की आवश्यकता थी. तब फॉरेन इनवेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड को यह अनुमति देनी पड़ी. कथित तौर पर कंपनी ने अनुमति के बगैर ही निवेश किया.
आईएनएक्स कंपनी के मालिक थे इंद्राणी और पीटर मुखर्जी. ये दंपति अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या के अभियुक्त हैं और फिलहाल जेल में हैं. जेल में रहते हुए, इंद्राणी मुखर्जी ने इस बात को स्वीकार करने का फ़ैसला किया कि वे और उनके पति पीटर ने क़ानूनी पेंचीदगियों से बचने के लिए पी चिदंबरम को रिश्वत दी थी. जो रकम उन्होंने चिदंबरम के बेटे कार्ति को दी वो आश्चर्यजनक रूप से महज 10 लाख रुपये थे!
इतना ही नहीं, चिदंबरम के ख़िलाफ़ 2006 के एयरसेल मैक्सिस सौदे में भी ऐसे ही आरोप हैं. इससे जुड़े छापे और जांच चल रही है. लेकिन बुधवार को चिदंबरम की गिरफ़्तारी मोदी युग में कांग्रेस के किसी हाई-प्रोफ़ाइल नेता की पहली गिरफ़्तारी है.
कांग्रेस के लिए कोई सहानुभूति नहीं
आमतौर पर सरकारें इस डर से किसी विपक्षी नेता को गिरफ़्तार नहीं करतीं कि जनता उससे सहानुभूति दिखाना शुरू कर देगी. आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के साथ भी यही हुआ. लेकिन आज, ऐसी गिरफ़्तारियों का रानजीतिक असर न के बराबर दिखता है. विपक्षी नेताओं के प्रति लोगों की सहानुभूति जताने के सामने आज मोदी कहीं ताक़तवर हैं.
यह गिरफ़्तारी ऐसे समय में हुई है जब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार सुस्त पड़ती दिख रही है. पी चिदंबरम 2004 से 2008 के बीच ग्रोथ और राजकोषीय घाटा दोनों का ख्याल रखने वाले बेहतरीन वित्त मंत्री थे. सोशल मीडिया पर एक सवाल बहुत पूछा जा रहा है कि सीबीआई ने चिदंबरम से पहला सवाल यह पूछा कि कैसे अर्थव्यवस्था को किकस्टार्ट दिया जाए.
चिदंबरम की गिरफ़्तारी ऐसे वक्त में हुई है जब कश्मीर का पूरा विपक्ष जेल में है. अब जबकि अर्थव्यवस्था मोदी सरकार के लिए लगातार बुरी सुर्खियां बनाती रहेंगी, भ्रष्टाचार के मामलों में विपक्ष को कुछ इसी तरह की और हाई-प्रोफ़ाइल गिरफ़्तारियां देखनी पड़ सकती हैं.
इस कड़ी में जांचकर्ता जिन बड़े नामों के पीछे पड़े हैं उनमें शशि थरूर, रॉबर्ड वाड्रा, राहुल गांधी और सोनिया गांधी हैं.
रॉबर्ट वाड्रा पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है तो सोनिया और राहुल पर नेशनल हेराल्ड मामले में भ्रष्टाचार का आरोप है.
वहीं सुनंदा पुष्कर के मामले में बार बार यह धारणा बनाई जाती है कि शशि थरूर ने अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया था. दिल्ली पुलिस ने थरूर पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 489-ए (पति या उसके परिवार का महिला के साथ क्रूर व्यवहार) और धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत आरोप लगाया है.
बीजेपी समर्थक ट्विटर हैंडल और बीजेपी समर्थन न्यूज़ चैनल का माहौल देख कर कि जिस तरह वे जांच एजेंसियों की कदम चाल बताते हैं, आप हवा का रुख भांप सकते हैं.
इससे बीजेपी को मदद कैसे?
अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ रही है, ऐसे में बीजेपी को 'मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को संभालने में नाकाम रही' इस हेडलाइन को लगातार बदलते रहने की ज़रूरत है. पहले यह कश्मीर था और अब चिदंबरम, आगे दूसरे भी आएंगे.
इससे जनता को लगातार यह भी याद दिलाया जा सकेगा कि देखो विपक्ष कितना भ्रष्ट, बिकाऊ और गुनहगार है. सरकार की कोशिश है कि हमारे दिमाग को बहुत सारी ऐसी चीज़ों से भर दे जो हमें कम से कम रौशनी में भी नज़र आए और हम अर्थव्यवस्था के सामने जो बड़ी मुसीबत मुंह बाए खड़ी है उस पर कम से कम बातें करें.
चिदंबरम कुछ दिनों में जमानत पर बाहर आ जाएंगे, लेकिन उनकी गिरफ़्तारी से मोदी सरकार को लोगों को यह याद दिलाने में तो ज़रूर मदद मिलेगी कि कांग्रेस पार्टी कितनी भ्रष्ट है और विपक्ष दहशत में चुप रहेगा.
जन नेता नहीं
जैसे जैसे विपक्षी नेता जनता से अपना संपर्क खोते जाएंगे, सरकार के लिए उन्हें गिरफ़्तार करना उतना ही आसान होता चला जाएगा, चाहे वे आरोप सच्चे हों या झूठे या अतिश्योक्ति ही क्यों न हों. चिदंबरम खुद ही इसके एक अच्छे उदाहरण हैं. वे एक अच्छे प्रशासक और प्रतिष्ठित वकील रहे हैं लेकिन कभी भी एक बड़े जन नेता नहीं थे.
हालांकि अपने घरेलू मैदान तमिलनाडु के शिवगंगा से 1985 और 2009 में दो बार लोकसभा सदस्य रहे हैं. 2019 के चुनाव में उनके बेटे कार्ति चिदंबरम डीएमके की मदद से वहां से जीते. लेकिन अगर चिदंबरम लुटियन दिल्ली के राजनीतिज्ञ की जगह एक बड़े जन नेता होते तो शायद यह (जन नेता होना) उनके लिए एक ढाल की तरह होता.
तब शायद कांग्रेस पार्टी उनकी गिरफ़्तारी के मामले को कुछ बेहतर तरीके से हैंडल करती. वे छिपते नहीं और लुकआउट नोटिस जारी नहीं किया जाता और जब कांग्रेस के दफ़्तर में वे प्रेस वार्ता के लिए प्रकट हुए तो उसके बाद वे अपने घर नहीं जाते और सीबीआई की टीम उनके घर के दीवार फांद कर अंदर नहीं घुसती.
अगर कांग्रेस पार्टी के नज़रिये में यह राजनीतिक प्रतिशोध है तो सोनिया और राहुल को कांग्रेस दफ़्तर में चिदंबरम की उस प्रेस वार्ता के दौरान उनके बगल में खड़े होना चाहिए था.
उन्हें वहीं अपनी गिरफ़्तारी देनी चाहिए थी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करना चाहिए था. उनकी गिरफ़्तारी के वक्त उनके जोरबाग स्थित घर के बाहर टीवी कैमरों के आगे नारेबाज़ी करते और केवल कुछ ही कांग्रेस कार्यकर्ता नज़र आए, जो कि न के बराबर था.
राजीव गांधी के नज़दीकी
1954 में एक अमीर कारोबारी परिवार में जन्में चिदंबरम ने क़ानून को अपना करियर बनाने के लिए चुना. राजीव गांधी की नज़र में आए और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में चुनावी लहर के चलते जीत गए. राजीव गांधी ने उन्हें कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्री बनाया.
यह चिदंबरम ही थे जो प्रधानमंत्रियों की सुरक्षा के लिए एसपीजी क़ानून लाए. लेकिन क़ानून के मुताबिक तत्कालीन प्रधानमंत्री को यह सुविधा नहीं प्राप्त थी और जब 1989 के चुनाव में राजीव गांधी चिदंबरम के राज्य में प्रचार के लिए गए थे तब उनके पास एसपीजी कवर नहीं था. राजीव गांधी की हत्या के बाद मणिशंकर अय्यर लगातार और बार बार सार्वजनिक रूप से उसके लिए चिदंबरम को दोषी ठहराते रहे हैं.
इसके बावजूद, यह चिदंबरम की प्रतिभा ही थी कि वे देवेगौड़ा और फिर इंद्रकुमार गुजराल के कैबिनेट में छोटे छोटे अंतराल के लिए मंत्री पद पाने में सफल रहे. फिर यूपीए-1 में वे वित्त मंत्री बने लेकिन जब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार सुस्त पड़ने लगी तब 2008 में उनकी जगह प्रणब मुखर्जी को वित्त मंत्रालय सौंप दिया गया.
इसका असर यूपीए-2 में देखने को मिला. हालात बिगड़ते गए और जब 2012 में प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाया गया तब चिदंबरम को एक बार फिर वित्त मंत्रालय में वापस लाना पड़ा.
विवादास्पद गृह मंत्री
26/11 के मुंबई हमले के बाद शिवराज पाटील को गृह मंत्री के पद से बर्खास्त करने के बाद एक कुशल गृह मंत्री की ज़रूरत थी. तब कहा जा रहा था कि चिदंबरम गृह मंत्रालय नहीं संभाला चाहते थे क्योंकि वित्त मंत्रालय में उनके लिए बड़ी उपलब्धि हासिल करना आसान था.
गृह मंत्री के रूप में वे अकुशल रहे, यहां एक अहंकारी के रूप में उनकी छवि बनी. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उन्हें एक ख़लनायक के रूप में देखा. उनके गृह मंत्री रहते कई मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप में गिरफ़्तार किया गया, जिनमें से कई बाद में निर्दोष साबित हुए.
उस दौरान ही ऑपरेशन ग्रीनहंट चलाया गया जिसका उद्देश्य माओवाद प्रभावित जंगलों से विद्रोहियों का सफाया था, उसकी बहुत आलोचना हुई. लेकिन वही चिदंबरम पूर्वोत्तर और कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों को कम करने के लिए सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम की समीक्षा किए जाने के पक्षधर थे.
उनके गृह मंत्रालय के दौर में ही अमित शाह के ख़िलाफ़ केस चलाए गए थे और नरेंद्र मोदी को भी गिराने की नाकाम कोशिशें की गई थीं. लेकिन उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सका. मामले लंबे चले और मोदी अभियुक्त नहीं बनाए जा सके.
आज कुछ लोग कह रहे होंगे कि निश्चित ही कुछ न कुछ भ्रष्टाचार का मामला तो रहा ही होगा, वहीं कुछ ये भी कह रहे होंगे कि गुजरात दंगों के मामले में दोषी नहीं साबित कर पाने का वे खामियाजा भुगत रहे हैं.
अब बाकी तो इतिहास है. लेकिन उनकी पार्टी की जो स्थिति आज है उससे यह संभव है 73 वर्षीय चिदंबरम अपने राजनीतिक करियर का सुखद अंत नहीं देख पाएं.
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