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एनआरसी: क्या एक बड़ी मानवीय त्रासदी की कगार पर है असम? - बीबीसी विशेष
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से लौटकर
असम के दरांग ज़िले के खरपेटिया क़स्बे में रहने वाले उत्पल साह कहीं भी जाएं, अब काग़ज़ों से भरा एक थैला हमेशा अपने साथ रखते हैं. उनके थैले में भरे काग़ज़ों में कोई कविता-कहानी या घर के राशन की लिस्ट नहीं बल्कि उन दस्तावेज़ों की फ़ोटो कोपियों हैं जो उन्हें नैशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न या एनआरसी में एक भारतीय नागरिक साबित करते हैं.
उत्पल की इस बेचैनी के पीछे कहानी दरअसल यह है कि 26 जून से पहले तक उनके परिवार में सब ठीक-ठाक या 'नॉर्मल' था. लेकिन जब 26 जून को आई एनआरसी की नई अडिशनल ड्राफ़्ट एक्सक्लूजन लिस्ट में उनकी माँ माया रानी साह के नाम के आगे 'डी' यानी संदिग्ध वोटर दर्ज आया, तब परिवार में सभी के होश उड़ गए.
उत्पल और परिवार के बाक़ी सदस्यों के पास अब 55 वर्षीय माया रानी साह को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए एक महीने से भी कम का वक़्त है.
माँ की नागरिकता सुनिश्चित करने के लिए उत्पल ने रात-दिन एक करके एनआरसी में लगने वाले सारे ज़रूरी काग़ज़ात और उनकी सत्यापित प्रतियाँ इकट्ठा तो कर ली हैं लेकिन फिर भी अंतिम सूची को लेकर उनके मन में बैठा डर, उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई देता है.
परिवार की नागरिकता के जुड़े काग़ज़ात थैले से निकाल कर दिखाते हुए वह कहते हैं, "आज अगर आप असम में रहने वाले बंगाली भाषी इंसान हैं तो आपके लिए खाना, पानी, नौकरी सब बाद में आएँगे, नागरिकता से जुड़े काग़ज़ात सबसे पहले."
लेकिन साथ ही एनआरसी की प्रक्रिया के अप्रत्याशित स्वभाव और उसके विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए वह आगे जोड़ते हैं, "हमारे पास तो हमेशा से पूरे काग़ज़ थे. हमने पहली लिस्ट के दौरान सब जमा भी किया था. पिछले साल जुलाई में जब एनआरसी का पहला ड्राफ़्ट आया तो उसमें हमारे परिवार के सभी सदस्यों का नाम शामिल था. किसी का भी नाम बाहर नहीं था. फिर अचानक 26 जून वाली लिस्ट में मेरी माँ को डी वोटर बता दिया था. तब हम सब बहुत डर गए थे."
इसके बाद मायारानी साहा को एनआरसी में नागरिक साबित करने के लिए नए सिरे से सत्यापित दस्तावेज़ को इकट्ठा करने का थका देने वाला चक्र शुरू हो गया.
उत्पल बताते हैं, "अब मैंने काग़ज़ और उनकी सर्टिफ़ाइड कॉपी निकलवाने के लिए भागना शुरू किया. हमारे पास वक़्त कम था इसलिए मुझे तनाव ज़्यादा हो रहा था. यहां से मैं कोकराझार, गुवाहाटी, दरांग -कितने ही जगह हफ़्तों भागता रहा. इतने दिन का रोज़गार गया, अपना पैसा लगा वो अलग. भाग-भाग के अपनी माँ का स्कूल सर्टिफ़िकेट, दादा-नाना का 1951 के एनआरसी में आए नाम से लेकर अपनी स्वर्गवासी मौसी तक का जन्म प्रमाण पत्र निकाल लिया."
"1997 में जब से असम में 'डी-वोटर' की पहचान शुरू हुई है, तब से लेकर अब तक के अपने माता-पिता के हर चुनाव में वोट देने के प्रमाण को लिस्ट से निकलवाकर उसे सत्यापित करवाया. जितने काग़ज़ात की ज़रूरत है, उससे कहीं ज़्यादा है मेरे पास. एनआरसी केंद्र में सुनवाई के वक़्त मेरे काग़ज़ देखकर वहां के अफ़सर भी चौंक रहे थे. लेकिन इतना सब होने के बाद भी हम डरे हुए हैं. अब तो सिर्फ़ एनआरसी की अंतिम सूची का इंतज़ार है."
"अब तक जो हुआ है, उसके आधार पर तो कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता. कुछ नहीं मालूम क्या होगा. हम सारा दिन यही सोचते रहते हैं कि एनआरसी की लिस्ट में नाम आएगा या नहीं. यही सोचकर दिल बैठ जाता है की कहीं अगर नाम नहीं आया तो माँ को डिटेंशन सेंटर में बंद किया जा सकता है."
उत्पल के इस ख़ौफ़ की जड़ को समझने के लिए हमें 5 दशक पहले के असम की राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि पर एक नज़र डालनी होगी. असम में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जारी एनआरसी की प्रक्रिया दरअसल राज्य में अवैध तरीक़े से घुस आए बांग्लादेशियों के ख़िलाफ़ हुए 6 साल लम्बे जनांदोलन का नतीजा है.
असम समझौते के अनुसार 25 मार्च 1971 के बाद असम में दाख़िल हुए लोगों की नागरिकता को अवैध मानकर वापस भेजा जाना तय किया गया था.
बीते साल जुलाई में प्रकाशित हुई एनआरसी की ड्राफ़्ट लिस्ट में तक़रीबन 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे. इनमें से कुल 36 लाख लोगों ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए क्लेम फ़ॉर्म भरे हैं, सभी को एनआरसी की आख़िरी लिस्ट का इंतज़ार है.
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें काग़ज़ात होने के बावजूद सालों अवैध नागरिकों की तरह जेल में बिताने पड़े. ऐसी ही कहानी है भारतीय नागरिक मधुबला मंडल की. बांग्लादेशी होने के आरोप में उन्होंने तीन साल डिटेंशन सेंटर में बिताए हैं.
असम के चिरांग जिले के बिश्नुपुर गांव की निवासी 59 वर्षीय मधुबाला मंडल आज तक कोकराझार की जेल में गुज़ारा अपना वक़्त भूल नहीं पायी हैं. दुबली पतली काया और तकलीफ़ से भरी गहरी उदास आँखों वाली मधुबाला सत्यजीत रे की फ़िल्मों में दिखाए गए दादी के किरदार की याद दिलाती हैं. ग़लत पहचान के कारण तीन साल डिटेंशन सेल की यातना झेलकर बाइज़्ज़त बाहर आयीं मधुबला मंडल अपनी रिहाई की सारी उम्मीद छोढ़ चुकी थीं.
अपनी बाँस की झोपड़ी के सामने बैठी मधुबाला आँसू पोंछते हुए कहती हैं, "तीन साल पहले अचानक एक शाम एनआरसी का नोटिस कोई मेरे घर के बाहर पेड़ में अटका के चला गया. मुझे तो पता भी नहीं था की कोई नोटिस आया है. शाम को मैं लकड़ी लेकर आ रही थी तो घर के सामने खले रहे एक बच्चे ने हाथ में काग़ज़ का टुकड़ा पकड़ा दिया. मैं तो पढ़ी-लिखी नहीं हूं, मुझे समझ में नहीं आया कि काग़ज़ में क्या लिखा है. फिर 2 महीने बाद एक दिन अचानक मेरे घर पर पुलिस आयी. उस सुबह बहुत ठंड थी और मैं अपनी पोती के लिए आग जला रही थी. मैंने उनसे कई बार कहा की मेरा नाम मधुबाला मंडल है और मैं बांग्लादेशी नहीं हूं. लेकिन फिर भी उन्होंने मेरा नाम 'मधुबाला दास' ही लिखा और मुझे ले जाकर कोकराझार जेल में बंद कर दिया."
जेल की भयावह यादें आज भी मधुबाला को सोने नहीं देती. बुरे सपनों और दर्द करते हड्डियों के जोड़ों की वजह से रातों को सो न पाने वाली मधुबाला आगे कहती हैं, "जेल में मैं एक कमरे में 40 औरतों के साथ रहती थी. हम दिन भर रोते और यही सोचते रहते की हमें आख़िर किस बात की सज़ा दी जा रही है. वहां मेरी भूख ख़त्म हो गयी और मैं बीमार रहने लगी. आँखों की रोशनी भी चली गयी. मेरे सामने वहां कितने ही लोग बीमार पड़कर मर गए, मुझे लगा मैं भी यहीं मर जाऊंगी. आख़िर के दिनों में तो मैं ख़ुद नहाना धोना भी नहीं कर पाती थी. वही जेल में कुछ मुझसे कम उम्र की औरतें थीं जो दया करके मेरी मदद कर दिया करती थीं. समझ नहीं आता की जब मैं भारतीय हूं तो मुझे इस उम्र में बांग्लदेशी बताकर जेल में बंद क्यों रखा गया?"
एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट प्रकाशित होने के ठीक पहले असम सरकार ने पत्र लिखकर केंद्र से राज्य भर में दस नए डिटेंशन सेंटर्स बनवाए जाने की प्रक्रिया को तेज़ करने की माँग की है.
साथ ही अगस्त के अंत में प्रकाशित होने वाली एनआरसी की अंतिम लिस्ट में शामिल न हो पाने वाले सैकड़ों लोगों के नए आवेदनों का निवारण करने के लिए राज्य भर में 200 नए फ़ॉरन ट्रायब्यूनल्स बनवाए जाने की प्रक्रिया शुरू की है.
काग़ज़ी मुश्किलों से साथ-साथ असम में हर साल आने वाली बाढ़ यहां के लोगों के लिए एनआरसी में ख़ुद को नागरिक साबित करने की लड़ाई को मुश्किल बना रहा है.
यूं तो बेकी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है, लेकिन बरसात के मौसम में इस नदी का विस्तार देखते ही बनता है. नदी किनारे बैठे, पानी की सतह के ऊपर जमा होती धुंध को देखते हुए बरपेटा ज़िले के निवासी नज़रुल अहमद गहरी सोच में डूब जाते हैं.
ब्रह्मपुत्र की ही तरह बेकी के किनारे बसने वाले सैकड़ों परिवार हर साल यहां आने वाली बाढ़ की वजह से विस्थापित हो जाते हैं. इन विस्थापित परिवारों के लिए पुश्तैनी ज़मीनों पर अपने मालिकाना हक़ के साथ-साथ एनआरसी में अपनी दावेदारी को साबित करना भी मुश्किल हो रहा है.
बरपेटा ज़िले में बेकी नदी के किनारे बसे गामाड़ीगुरी गांव में रहने वाले नज़रुल इस दोहरी मार से जूझते हुए नागरिकता साबित करने की अपनी लड़ाई के बारे में बताते हुए कहते हैं, "बेकी में आने वाली बाढ़ की वजह से 2014 से अब तक मेरा घर तीन बार टूट चुका है. नदी हर साल हमारा घर-मिट्टी सब बहा के ले जाती है. इसके बाद जब हम नए गांव में रहने के लिए जाते हैं तो लोग हमें बांग्लदेशी समझकर हम पर शक करते हैं और एनआरसी के दफ़्तर में शिकायत कर देते हैं. मेरे दादाजी ने असम में 1913 में ज़मीन ली थी लेकिन आज उस ज़मीन पर नदी का पानी बह रहा है. हमारे पास 1951 से लेकर अभी तक के सारे काग़ज़ हैं लेकिन फिर भी मेरा नाम एनआरसी लिस्ट में नहीं आया."
नज़रुल के साथ खड़े स्थानीय युवा आमिर हुसैन एनआरसी को लेकर युवाओं में पनप रही उलझन के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि नौकरी ढूँढने की उम्र में हम अपना पूरा समय यही साबित करने में लगा रहे हैं कि वह इस देश में नौकरी कर सकते हैं या नहीं.
वह कहते हैं, "मेरा घर नदी के उस पार है और हर साल बाढ़ की वजह से हमें बहुत नुक़सान उठाना पड़ता है. लेकिन मैं पढ़ा-लिखा हूं और ज़िंदगी में कुछ करना चाहता हूं. पर अब एनआरसी में नाम न आने की वजह से मुझे लगता है कि मैं एक ऐसी दलदल में धँसता जा रहा हूं जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं है."
भविष्य की चिंताएं साझा करते हुए वह जोड़ते हैं, "वैसे तो इस उम्र में मुझे आगे की पढ़ाई, नौकरी और अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. लेकिन मैं सारा दिन डरते हुए सिर्फ़ यही सोचता रहता हूं की एनआरसी की अंतिम लिस्ट में मेरा नाम आएगा या नहीं. कहीं मुझे बांग्लादेशी समझ कर जेल में तो बंद नहीं कर देंगे?"
वहीं, मानवाधिकार पर काम कर रही सामाजिक संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार असम में अभी तक पचास से ज़्यादा लोग नागरिकता से जुड़े तनाव की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं. एनआरसी की अंतिम लिस्ट प्रकाशित होने के बाद यहां हालात और नाज़ुक हो जाने की आशंका है.
बक्सा ज़िले के चुनबारी गांव में रहने वाले साठ वर्षीय अम्बर अली स्टोन क्वेरी में पत्थर तोड़ कर गुज़ारा करते थे. लेकिन एनआरसी लिस्ट में ख़ुद को डी-वोटर बताए जाने के बाद, 7 जुलाई को उन्होंने ट्रेन के सामने कूद कर जान दे दी. उनकी मौत के बाद से पत्नी हज़ेरा ख़ातून की ज़िंदगी के सारे पन्ने बिखर गए हैं.
मिट्टी और बांस से बने अपने एक कमरे के घर के सामने बैठी हज़ेरा देर तक बरसात के गिरते पानी को चुपचाप देखती रहती हैं. उनके बोलने का इंतज़ार करते हुए उन्हें देखकर मुझे लगा जैसे असम में होती घनघोर बारिश का यह क्षण भी इस वक़्त हज़ेरा के दुख और उनकी उदासी में शामिल है.
काफ़ी देर ख़ामोश रहने के बाद हज़ेरा कहती हैं, "एनआरसी की सुनवाई से लौटने के बाद से वो बहुत परेशान रहने लगे थे. न खाते, पीते, न सोते और न किसी से ज़्यादा बात करते. सिर्फ़ एक ही चिंता करते रहते, एनआरसी में नाम नहीं आया तो क्या होगा? उस दिन मैं बच्चों के लिए चावल बना रही थी जब वो अचानक उठे और पुराने कपड़े पहन कर कहीं निकल गए. हम सारा दिन ढूँढते रहे लेकिन कहीं नहीं मिले. फिर बाद में पता चला की उन्होंने आत्महत्या कर ली है. न मेरे बारे में सोचा और न बच्चों के बारे में...बस चले गए."
इस बारे में सरकार का पक्ष जानने के लिए बीबीसी ने हर संबंधित ज़िले के उच्चतम पुलिस अधिकारियों से लेकर गृह मंत्रालय तक में सम्पर्क किया. लेकिन सभी ने एनआरसी के मुद्दे पर बात करने से इंकार कर दिया. लेकिन नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर सभी ने एनआरसी की वजह से हो रही आत्महत्याओं को नकारते हुए कहा कि यह आत्महत्याएं निजी कारणों से हो रही हैं.
असम के उच्च पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार राज्य में सब कुछ ठीक है और ख़ुशहाल है. अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि प्रशासन एनआरसी की अंतिम लिस्ट के प्रकाशन से पहले हर तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद और सक्षम है.
लेकिन पीड़ित परिवारों के साथ काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शाहजहां अली प्रशासन की इसी उदासीनता को असम में बढ़ रही आत्महत्यों के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.
बरपेटा स्थित अपने दफ़्तर में बीबीसी से बातचीत के दौरान शाहजहां कहते हैं, "जिन लोगों का नाम लिस्ट में नहीं है, उनका तनाव बहुत बढ़ गया है साथ ही काग़ज़ात और वक़ील के लिए पैसा चाहिए. जिनके पास इतने साधन नहीं हैं वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. प्रशासन की उदासीनता की वजह से स्थिति और ख़राब हो रही है".
दूसरी ओर 70 के दशक में असम बॉर्डर पुलिस में उप-महानिरीक्षक रहे हिरण्या कुमार भट्टाचार्य का मानना है कि सरकारी महक़मों के इतने प्रयासों के बाद भी एनआरसी की वर्तमान प्रक्रिया कमियों से भरी है.
बॉर्डर पुलिस के अधिकारी के तौर पर काम करते हुए अपने अनुभवों के आधार पर हिरण्या ग़ैर-क़ानूनी ढंग से भारत में घुसे बांग्लादेशियों पर 'ऑपरेशन लेबन्सराम' नामक किताब भी लिख चुके हैं.
बीबीसी से बातचीत में हिरणय कहते हैं, "बांग्लादेश से सटे असम के ज़िलों का ग़ौर से विश्लेषण करने पर आप पाएँगे कि वहां एनआरसी ड्राफ़्ट से बाहर किए गए नामों की संख्या, उन इलाक़ों में ग़ैर-क़ानूनी ढंग से घुसे बांग्लादेशियों की तुलना में काफ़ी कम है. इसका मतलब साफ़ है कि कई लोग फ़र्ज़ी दस्तावेज़ दिखाकर लिस्ट में शामिल हुए हैं."
असमिया लेखक और वरिष्ठ पत्रकार राजीव भट्टाचार्य एनआरसी की प्रक्रिया में मौजूद ख़ामियों के लिए एक सेंट्रल डेटाबेस की कमी को ज़िम्मेदार मानते हैं. बीबीसी से विशेष बातचीत में असम का राष्ट्रवादी पक्ष रखते हुए वह बताते हैं कि राज्य के लिए एनआरसी क्यों ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "फ़िलहाल एनआरसी की प्रक्रिया में झोल हैं जिसकी वजह से कई वास्तविक नागरिकों को लिस्ट से बाहर कर किया गया जबकि बहुत से बांग्लादेशी फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों की मदद से लिस्ट में शामिल हो गए. यह कमियाँ दुरुस्त की जानी चाहिए ताकि किसी भारतीय नागरिक का नुक़सान न हो और न ही एक भी अवैध प्रवासी यहां रह पाए."
"लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता की असम पहले से ही राज्य में घुस आए बहुत से ग़ैर-क़ानूनी प्रवासियों और शरणार्थियों का बोझ उठा चुका है. इसलिए एनआरसी ज़रूरी है. इस प्रक्रिया से बांग्लादेश तक यह संदेश भी चला जाएगा की अब ग़ैर-क़ानूनी ढंग से सरहद पार कर असम में बस पाना बांग्लादेशियों के लिए एक सुरक्षित विकल्प नहीं है."
सही और ग़लत की क़ानूनी पेचीदगियों से इतर एनआरसी की प्रक्रिया उन लाखों लोगों के भविष्य के ऊपर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है जिनके ऊपर 'स्टेटलेस सिटिज़न' या 'बिना देश के नागरिक' हो जाने का ख़तरा मँडरा रहा है.
असम में हो रही एनआरसी एक जटिल और बहुपरतीय प्रक्रिया है जिसे काले और सफ़ेद से सरलीकृत खाँचों से इतर, उसकी समग्र ख़ामियों और परिस्थितिजन्य मजबूरियों के साथ देखने की ज़रूरत है.
लेकिन भारतीय हो, बांग्लादेशी हों या कोई और - सबसे बड़ा सवाल है कि एनआरसी की लिस्ट से बाहर होकर डिटेंशन सेंटर तक का सफ़र पूरा करने वाले लोगों का भविष्य क्या होगा? सरकार हो, अदालत हो या प्रशासन, इस सवाल का सुलझा हुआ जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है.
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