You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बीएस येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने की पटकथा 2008 में लिखी गई थीः नज़रिया
- Author, नवीन जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक के राजभवन में शुक्रवार शाम छह बजे के क़रीब बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
दरअसल कर्नाटक वो राज्य है जहां से बीजेपी ने दक्षिण भारत की राजनीति में प्रवेश किया था.
यहां उसकी शुरुआत साल 2004 में हुई थी. राज्य में सरकार बनाने, दूसरी सरकारों को गिराने और अन्य राजनीतिक जोड़-तोड़ की रणनीति और खेल यहां येदियुरप्पा ही बनाते रहे हैं.
इसलिए कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जो बीजेपी 75 साल से बड़े-बुजुर्गों को सत्ता से दरकिनार करती रही है उसके पास इसी उम्र के येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.
इसकी वजह यह है कि यह सारा राजनीतिक खेल येदियुरप्पा का रचा हुआ है. साल 2004 में जब कर्नाटक विधानसभा त्रिशंकु हुई थी तो उस वक़्त कई तरह के प्रयोग हुए थे.
कांग्रेस और जेडीएस की सरकार बनी थी, फिर विफल हुई, इसके बाद फिर से जेडीएस और बीजेपी की सरकार बनी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनाए गए, लेकिन जब बीजेपी को सत्ता सौंपने की बारी आई तो उन्होंने मना कर दिया और इस्तीफ़ा दे दिया. राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था.
लेकिन सारा राजनीतिक खेल असल में 2008 से शुरू होता है. इस साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत से महज तीन सीटें कम मिलीं और येदियुरप्पा ने सरकार बनाने का दावा किया.
राज्यपाल ने उनका यह दावा मंजूर कर लिया और अल्पमत की सरकार बनी और उनका खेल तभी शुरू हो गया था.
और बहुत मजे की बात ये है कि उन्होंने जो कुछ भी खेल किया, कैसे कांग्रेस के विधायकों को तोड़ा, कैसे जेडीएस के विधायकों को अपने पाले में लाये, उन सभी के बारे में खुल कर बाद में बात की और स्वीकार किया कि उन्होंने ग़लत किया.
दल-बदल क़ानून का तोड़ ऐसे निकाला
दल-बदल क़ानून 1985 में लागू हुआ था. येदियुरप्पा ने इस क़ानून का भी तोड़ निकाल लिया और चोर दरवाजे से दूसरे पार्टी के विधायकों को अपने पाले में लाने के लिए पहले इस्तीफ़ा दिलवाया और फिर बाद के उपचुनाव में खड़ा कर जीत दिलवा दी.
2008 में येदियुरप्पा की पार्टी ने कांग्रेस और जेडीएस के कुल सात विधायकों को तोड़ा था, जिसमें से पांच उपचुनाव जीते थे.
इस तरह येदियुरप्पा की सरकार बच गई और सदन में बहुमत हासिल करने में वे सफल रहे. लेकिन राज्य में बीजेपी के जो पहली सरकार बनी वो सबसे भ्रष्ट और बदनाम साबित हुई.
खनन घोटाला हुआ, जांच हुई, बड़े आरोप लगे और कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा को लोकायुक्त ने संगीन आरोपों में लिप्त पाया. उन्हें इस्तीफ़ा तक देना पड़ा. इस्तीफ़ा तो बीजेपी ने लिया लेकिन इससे येदियुरप्पा बहुत नाराज़ हुए.
नाराज़गी इतनी बढ़ गई कि बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी. उन्हें जेल तक जाना पड़ा.
ऑपरेशन लोटस
बाद में येदियुरप्पा ने कर्नाटक जनता पक्ष नाम की पार्टी बनाई. सबसे रोचक बात यह है कि साल 2012 में जब उन्होंने बीजेपी छोड़ी, तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से उन सभी रणनीति के बारे में बताया जो उन्होंने बीजेपी में रहते हुए अपनाया था.
येदियुरप्पा ने बताया कि उन्होंने किस तरह से 2008 में दल-बदल कराया और कैसे उन्होंने दूसरे दलों के विधायकों को तोड़ा.
उन्होंने इस पर अफसोस भी जताया. अपनी ग़लती मानी और कहा कि उन पर ऐसा करने के लिए पार्टी का दबाव था.
सार्वजनिक तौर पर अपनी स्वीकारोक्ति में उन्होंने बताया कि उस पूरी रणनीति का नाम 'ऑपरेशन लोटस' दिया गया था.
- यह भी पढ़ें | बीजेपी का कर्नाटक में ऑपरेशन होगा सफल?
फिर की बीजेपी में वापसी
येदियुरप्पा की नई पार्टी बहुत कमाल नहीं कर पाई. साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें दोबारा बीजेपी में लेकर आए. इसके बाद 2018 में विधानसभा चुनाव हुए तो नतीजों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई लेकिन कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन करने में कामयाब हुए और सरकार बना ली.
जब येदियुरप्पा के हाथ से सत्ता छूटी, तभी से उनका ऑपरेशन लोटस एक बार फिर से शुरू हो गया था, जिसकी सफलता अब जाकर साबित हुई है.
राज्य में कांग्रेस और जेडीएस सरकार में भले थी, लेकिन दोनों पार्टियों के बीच काफी अंतर्विरोध थे, इसका फ़ायदा भी येदियुरप्पा ने उठाया.
कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन स्वाभाविक गठबंधन नहीं था. कर्नाटक में ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे की हमेशा विरोधी रही हैं. जेडीएस का अस्तित्व ही 'कांग्रेस विरोध' से रहा है.
येदियुरप्पा ने 2018 के ऑपरेशन लोटस को फिर से शुरू किया और इस बार भी कामयाबी पाई.
लेकिन आगे बड़ी है चुनौती
अब बीजेपी का सारा खेल सबके सामने है और येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, लेकिन उनकी सरकार भी कितनी स्थिर होगी, यह कहना कठिन है क्योंकि कर्नाटक की राजनीति में अभी उनके पास बड़ा बहुमत नहीं है.
उनके सामने कई चुनौतियां आएंगी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि येदियुरप्पा ने शुक्रवार को अकेले शपथ ली.
अकेले शपथ लेने की वजह यह है कि मंत्री बनने की इच्छा रखने वालों की लाइन इतनी लंबी है कि किसे खुश रखा जाए, किसे नाराज़, यह फ़ैसला इतनी ज़ल्दबाजी में नहीं लिया जा सकता है.
उनके सामने दूसरे दलों के सभी बागी विधायकों को खुश करने और पार्टी के वरिष्ठों को साथ लेकर चलने की चुनौती होगी.
कुल मिलाकर कर्नाटक में बीजेपी की जो राजनीति है, उसके केंद्र में येदियुरप्पा ही हैं और उनकी सारी की सारी रणनीति ऑपरेशन लोटस को लेकर रहती है कि अगर बहुमत न मिले तो बहुमत कैसे अर्जित किया जाए.
सरकार बनाने और गिराने की बीजेपी की यह रणनीति कर्नाटक से निकल कर कई राज्यों में साबित हो चुकी है.
इस बार बीजेपी कर्नाटक में सरकार बनाने में सफल रही है और चर्चा इस बात की है कि इस रणनीति को अब मध्य प्रदेश में दोहराया जा सकता है.
(बीबीसी संवाददाता अभिमन्यु कुमार साहा से बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)