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डी राजा बने सीपीआई के पहले दलित महासचिव
- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) का अगला महासचिव राज्यसभा सांसद डी राजा को चुना गया है.
वो कम्युनिस्ट पार्टियों के 95 साल के इतिहास में किसी कम्युनिस्ट पार्टी के पहले ऐसे महासचिव होंगे, जो दलित समुदाय से आते हैं.
पूर्ववर्ती महासचिव सुधाकर रेड्डी के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने के बाद तीन दिनों तक चली पार्टी की नेशनल काउन्सिल की बैठक में पार्टी की बागडोर डी राजा को सौंपी गई है.
कम्युनिस्ट पार्टियों को अक्सर यह आलोचना झेलनी पड़ती है कि जाति के प्रश्न को ईमानदारी से संबोधित नहीं करतीं और नेतृत्व के मामले में आज भी उनके यहाँ समाज के कथित ऊंचे तबके के लोगों का दबदबा है.
दलित राजनीति से कम्युनिस्ट पार्टियों के तीखे संबंध लगभग उतने ही पुराने हैं जितना भारत में उनका अपना अस्तित्व.
1925 में सीपीआई का गठन हुआ और उसके 11 साल बाद डॉ अम्बेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया. उनकी लेबर पार्टी 1938 में इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट के ख़िलाफ़ हुई व्यापक हड़ताल में सीपीआई के साथ शामिल हुई.
लेकिन जल्द ही उसके साथ उनके रिश्ते सहज नहीं रहे और स्थिति यह हुई कि 1952 में उत्तरी मुम्बई (बॉम्बे) से अम्बेडकर की उम्मीदवारी का सीपाआई ने खुलकर विरोध किया.
शीर्ष नेतृत्व में पहुंचने का मतलब
मार्क्सवादी विचारक आनंद तेलतुंबड़े काउंटर करेंटस के अपने लेख में लिखते हैं कि तत्कालीन कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे ने मतदाताओं से यहाँ तक अपील कर डाली कि 'वे अपना वोट बर्बाद कर दें लेकिन डॉ अम्बेडकर को वोट न दें.' अम्बेडकर वो चुनाव हार गए थे.
तब से दलित राजनीति का संदेह कम्युनिस्ट पार्टियों पर गहराता गया. बाद के दिनों में खासकर 1967 के बाद भारतीय राजनीति में बहुजन नेतृत्व ने अपनी स्थायी जगह बनानी शुरू की तो भी कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने यहाँ उदार नहीं हुईं और अपना कोर समर्थन-समूह खोती गईं.
यहाँ तक कि 1990 के बाद जब मंडल आयोग लागू हुआ और देश के नेतृत्व का जाति-स्वरूप बदलने लगा तो भाजपा और संघ परिवार ने भी दलित-ओबीसी जातियों में अपने नेतृत्व विकसित करने शुरू किये, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों ने जाति की व्यवहारिक राजनीति को अभी भी नहीं अपनाया.
मूलतः बिहार में जनाधार वाली एक कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई, एमएल (माले) को जाति के सवाल पर ज्यादा समावेशी माना जाता है लेकिन वहां भी शीर्ष नेतृत्व ऊंची जातियों के हाथ में रहा है.
माले के पूर्व विधायक एनके नंदा कहते हैं, "नीचे के स्तर पर, यानी ब्लाक और जिला स्तर पर तो कम्युनिस्ट पार्टियों में दलित-बहुजन जातियों का नेतृत्व खूब मिलेगा लेकिन शीर्ष नेतृत्व आज भी ऊंची जातियों के हाथ में है."
इस इतिहास और हकीकत को देखते हुए डी राजा का चुनाव एक असर पैदा करने वाला चुनाव कहा जा सकता है.
किताबों से अपना रिश्ता कायम करने के बाद राजा ने अपने कॉलेज के आरंभिक दिनों में ही कार्ल मार्क्स का 'दास कैपिटल' और कम्युनिस्ट मैनीफ़ेस्टो पढ़ा.
बाकौल राजा, "परिवेश में राजनीतिक आन्दोलन था. उनके आस-पास तब कम्युनिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन की गतिविधियाँ थीं. कॉलेज के पुस्तकालय में मार्क्सवादी साहित्य था, पूरा शहर एक साम्यवादी शहर था."
पार्टी के विश्वास पर खरे उतरते रहे
1967-68 में वे सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ़ से जुड़े. 1973 में एक साल के लिए पार्टी की जिला इकाई ने उन्हें पढने के लिए मास्को भेजा और वहां से लौटकर 1974 से वे पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गये.
राजा को पार्टी ने युवाओं को संगठित करने की जिम्मेवारी दी और 1976 में उन्हें आल इण्डिया यूथ फेडरेशन की राज्य इकाई का सचिव चुना गया. वे युवा नेता के रूप में उभरते गये.
पार्टी ने उन्हें राज्य परिषद और बाद में राज्य कार्यकारिणी का सदस्य बनाया. राज्य में उन्होंने काम के अधिकार के पक्ष में और बेरोजगारी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया, कई पदयात्राओं से लोगों को जोड़ा.
साल 1985 में उन्हें छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुए अखिल भारतीय सम्मेलन में आल इण्डिया यूथ फेडरेशन का महासचिव चुन लिया गया. उस दौरान उन्होंने 'सेव इण्डिया, चेंज इण्डिया' के नारे के साथ अभियान चलाया, देशव्यापी सायकल यात्रा की.
1992 के हैदराबाद सम्मेलन में वे पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आ गए और उसके एक साल बाद उन्हें दिल्ली बुला लिया गया.
दिल्ली में भी उनका समय निजी-पारिवारिक आर्थिक परेशानियों का रहा, जिसे उनकी जीवनसाथी और पार्टी की केरल इकाई की कद्दावर महिला नेता एनी राजा ने संभाला और उन्होंने पार्टी और राजनीतिक गतिविधियों के लिए खुद को समर्पित रखा.
जंतर-मंतर से ससंद तक
डी राजा 2006 में तमिलनाडु से सीपीआई के राज्यसभा सांसद बने. तब से अभी तक वे राज्य सभा सांसद हैं. 24 जुलाई को राज्यसभा में उनके कार्यकाल का आख़िरी दिन है.
दो बार क्रमशः द्रमुक और दूसरी बार अन्नाद्रमुक के सहयोग से पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में भेजा. वहां राजा सर्वाधिक हस्तक्षेप करने वाले सांसदों में से एक हैं. उन्होंने समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक मसले को शिद्दत से उठाया है, विश्वविद्यालयों के मुद्दे उठाये हैं.
उनके रेफरेंस से भरे भाषणों के दौरान दूसरी पार्टियों के सांसदों का भी सहयोग मिलता रहा है. संसद से बाहर जनांदोलनों से उनका जुड़ाव हमसब ने देखा है. राजा अधिकतम जनांदोलनों के धरना-प्रदर्शनों में जंतर-मंतर पर भाग लेते हुए देखे जा सकते हैं.
अभी कम्युनिस्ट पार्टियों का जनाधार घटा है. कभी भारत की दूसरी बड़ी संसदीय पार्टी रही सीपीआई के आज लोकसभा में महज 2 सांसद हैं.
एक ही वर्ष स्थापित आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया में से आरएसएस ने बढ़त हासिल कर ली है और केंद्र में उसकी समर्थक पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार है.
ट्रेड यूनियन के स्तर पर भी सीपीआई की एटक (आल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस) की बढ़त को भाजपा के मजदूर संघ ने काफी पहले चुनौती पेश कर दी है.
चुनौतियां
इस खराब हालात में डी राजा पार्टी की बागडोर संभालने जा रहे हैं. उनकी सहजता, बौद्धिकता, संसदीय राजनीति में पकड़, सभी पार्टियों में और मीडिया में लोकप्रियता जहाँ उनकी ताकत होगी, वहीं उनके व्यक्तिव का एक पक्ष उनके लिए चुनौती भी बनेगा.
उनके आलोचक कहते हैं कि पार्टी संचालन के लिए ज़रूरी, सामयिक और कठोर निर्णय लेने में वे सक्षम नहीं है. एक चुनौती उनका कार्यकर्ताओं से भाषा के स्तर पर कनेक्ट करने में असहजता भी है.
हिन्दी क्षेत्र, जहाँ पार्टी एक ताकत हुआ करती थी, में अपना गौरव वापस करने के लिए जनता से हिन्दी में संवाद जरूरी है. राजा को हिन्दी में बोलते हुए कभी नहीं सुना गया है.
हालांकि यूथ फ्रंट पर उनका अखिल भारतीय अनुभव और जनांदोलनों से उनका जुड़ाव संभवतः कोई हल दे सके. जाति के सवाल पर भी डी राजा के सामने कम चुनौतियाँ नहीं हैं.
एक तो निर्णयकारी समितियों में बहुजन भागीदारी कम है और दूसरा खुद राजा की अपनी राजनीतिक ट्रेनिंग वर्ग को ज्यादा महत्व देने के लिए प्रेरित करेगी.
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