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रमेश कुमारः जिनके हवाले है कर्नाटक की सरकार का भविष्य
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बंगलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर कांग्रेस और बीजेपी इस बहस में लगी हैं कि कर्नाटक की राजनीति में यह किसकी जीत है तो वहीं विधानसभा अध्यक्ष केआर रमेश कुमार, जिस पर सबकी नज़रें टिकी हैं, चुपचाप कुछ ऐसा करने में जुटे हैं जिससे सरकार गिरने से रुक जाये.
बागी विधायकों के इस्तीफ़े पर विधानसभा अध्यक्ष को निर्णय के लिए बाध्य नहीं करने लेकिन उन्हें विश्वास मत में भाग लेने से छूट देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर रमेश कुमार ने सीधी सी प्रतिक्रिया दी, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करता हूं और मैं अपने संवैधानिक भूमिका के अनुसार काम करूंगा."
लेकिन बीजेपी यह जानती है कि विधानसभा अध्यक्ष आराम से नहीं बैठेंगे और उनकी राह में रोड़े अटकाने की भरसक कोशिशें करेंगे. रमेश कुमार न केवल कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीते हैं बल्कि ये वो शख्स हैं जिन्होंने बीजेपी की राजनीति का बहुत मजबूती से विरोध किया है.
लिहाजा बीजेपी को पता है कि यदि उन्हें सत्ता में आने से रोकने का कोई तरीका होगा तो वो उसे आजमाने से चूकेंगे नहीं. क्योंकि कर्नाटक में इस तरह की उठापटक का उनका अनुभव पुराना है.
रमेश कुमार के ख़िलाफ़ विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव लड़ने से पीछे हट गये बीजेपी सरकार में क़ानून मंत्री रह चुके सुरेश कुमार ने बीबीसी से कहा, "वह किसी भी पक्ष की वकालत कर सकते हैं. राजनीतिक कारणों के लिए वो किसी भी नियम की व्याख्या करने में सक्षम हैं. उसके लिए वो कोई भी मिसाल क़ायम कर सकते हैं."
रौबदार व्यक्तित्व
अब अपने कौशल से रमेश कुमार ने कर्नाटक के नाटक में सबकी नींद उड़ा दी है. मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी (जेडीएस विधायक दल के नेता के रूप में) और कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया समेत सत्तारूढ़ गठबंधन के चिंतित संयुक्त प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने कहा, "बिना मेरी अनुमति के एक भी विधानसभा सदस्य अनुपस्थित नहीं हो सकता."
यह कांग्रेस-जेडीएस के 15 बाग़ी विधायकों के लिए सीधा-सीधा संदेश है कि वो वोटिंग के दिन सदन में मौजूद रहें नहीं तो उन्हें परेशानी होगी.
रमेश यूं ही व्यर्थ में धमकी नहीं देते. उनके निर्वाचन क्षेत्र के लोग और विधानसभा के सभी विधायक चाहे वो सत्ताधारी दल से हों या न, इससे अवगत हैं.
वह विधायकों के इस्तीफ़े और उनको अयोग्य करार देने को लंबित रखने से ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते लेकिन यह सत्तारूढ़ दल को विधानसभा अध्यक्ष की शख्सियत के बूते पैंतरेबाज़ी का मौका ज़रूर देता है.
1970 के दशक में वीरेंद्र पाटिल के नेतृत्व वाली कांग्रेस (ओ) सरकार के अनुमोदन पर जापान की यात्रा पर जा रहे राजनेताओं और अधिकारियों के बच्चों के प्रतिनिधिमंडल के ख़िलाफ़ बहस के लिए तत्कालीन विपक्षी नेता डी देवराज उर्स से मुलाक़ात के बाद रमेश कुमार राजनीति में उतरे.
देवराज उर्स रमेश की ज़ोरदार बातों से प्रभावित होते हुए पहले उन्हें बंगलुरू शहर से पार्षद के लिए और बाद में कोलार ज़िले के श्रीनिवासपुरा से विधायक का टिकट दिया. उनकी तार्किक बातें आज भी उनकी मज़बूती है.
तर्क शक्ति, तीक्ष्ण बुद्धि की प्रशंसा
ब्राह्ण-किसान के बेटे 70 वर्षीय रमेश कुमार अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी के वेंकटशिवा रेड्डी के साथ बीते चार दशकों से रेड्डी बहुल श्रीनिवासपुरा से बारी बारी से चुनाव लड़ते आये हैं, जहां शायद ही कोई उनके अपने समुदाय का है.
क़ानून की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाने के बावजूद रमेश कुमार की तर्क शक्ति और उनकी तीक्ष्ण बुद्धि की तो उनके विरोधी भी प्रशंसा करते हैं.
रमेश कुमार कर्नाटक के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष केएच रंगनाथ को अपना गुरु मानते हैं.
रमेश कहते हैं, "उन्होंने बताया कि मुझे कैसा व्यवहार करना चाहिए और संसदीय प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए, मुझे कैसी भाषा का उपयोग करना चाहिए. उन्होंने मुझसे कहा कि किसी भी विषय पर बगैर अच्छी तरह पढ़ाई किये कभी नहीं बोलना चाहिए."
बतौर विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार का पहला कार्यकाल 1994 में था जब एचडी देवेगौड़ा मुख्यमंत्री थे. तब उन्होंने पार्टी के भीतर रामकृष्ण भार्गव का समर्थन करने वाले एक मुसीबत खड़ी करने वाले विधायक को चुपचाप बाहर कर दिया था.
जेएच पटेल सरीखे विलक्षण बुद्धि वाले वक्ता की मौजूदगी वाले सदन में रमेश कुमार ने बहस करने की अपनी क्षमता का परिचय दिया जो आज भी याद किया जाता है.
टीवी कैमरे को सदन में दी अनुमति
अध्यक्ष की भूमिका को मानवीय बनाते हुए वो बहस में शामिल हुए. सदन में टीवी कैमरे की अनुमति पूरे देश में सबसे पहले उन्होंने ही दी थी.
तब सदन की एक महत्वपूर्ण बहस को कैमरे में क़ैद करने की इस संवाददाता ने अनुमति मांगी थी तो उन्होंने कहा था, "लोगों को यह देखना चाहिए कि उनके प्रतिनिधि सदन के पटल पर क्या करते हैं."
हालांकि उनकी तीखी ज़ुबान उन्हें बार-बार परेशानी में भी डालती रही है. कुछ महीने पहले, जब उनसे विपक्षी बीएस येदियुरप्पा के उस कथित बयान के विषय में पूछा गया जिसमें यह दावा किया गया था कि 'विधायकों का इस्तीफ़ा स्वीकार करने के एवज में स्पीकर को 50 करोड़ रुपये में ख़रीदा जा सकता है' तो रमेश कुमार ने अपनी तुलना एक बलात्कार पीड़िता से की थी. जिसका देश भर में विरोध हुआ.
सुरेश कुमार कहते हैं, "वो भावुक हो जाते हैं. बीते वर्ष एक बार वो इतने भावुक हो गये कि अध्यक्ष की कुर्सी से उठ कर चल दिये."
उन पर वन ज़मीन को हड़पने का मामला भी कई सालों तक चला. आख़िरकार इसमें उन्हें कर्नाटक हाई कोर्ट में जीत मिली.
ख़ुद रमेश कुमार कहते हैं, "मुझे बदनाम करने के लिए मेरे विरोधियों ने हर तरह के हथकंडे का इस्तेमाल किया और अब वो थक गये हैं."
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