असम में बाढ़ः पांच महीने की गर्भवती लिपि दास की तकलीफ़ कौन सुनेगा?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, डिब्रूगढ़ के लेजाई गांव से, बीबीसी हिंदी के लिए
"मैं पांच महीने के गर्भ से हूं. एक सप्ताह पहले सबकुछ ठीक था. मैं अपने पति के साथ चेकअप करवाने अस्पताल भी गई थी. डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड करवाने को कहा था. लेकिन बाढ़ के कारण हमारे परिवार को सब कुछ छोड़कर राहत शिविर में चला आना पड़ा. पिछले 6 दिन से हम यहीं पर हैं."
36 साल की लिपि दास जब यह सब कुछ कह रही थीं, तो उनके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी.
क्या उन्हें अपने होने वाले बच्चे की फिक्र सता रही है?
इस सवाल का जवाब देते हुए लिपि कहती हैं, "राहत शिविर में घर जैसी सुविधा कहां मिलेगी. गर्भ के समय डॉक्टर अच्छा खाना और साफ़ पानी पीने के लिए कहते है. वरना बच्चा स्वस्थ पैदा नहीं होता. राहत शिविर में अच्छा खाना कहां मिलेगा? यहां खाने में केवल चावल, दाल और आलू मिलता है. पीने का पानी भी ठीक नहीं है. दो शौचालयों में कई लोग जाते हैं. मुझे बहुत चिंता हो रही है. बाढ़ मेरा सब कुछ बर्बाद न कर दे."
डिब्रूगढ़ ज़िले के लेजाई हायर सेकेंडरी स्कूल में बनाए गए एक अस्थायी राहत शिविर में इस समय सैकड़ों लोगों के साथ लिपि का परिवार भी रह रहा है.
वो पास के कोठाबाम गांव की रहने वाली है जहां अधिकतर घर बाढ़ के पानी में डूब गए हैं.
दरअसल दो दिन पहले 28 साल की आरती घटवार भी इसी राहत शिविर थीं. वो नौ महीने के गर्भ से हैं और उन्हें इसी महीने बच्चा होने वाला था.
राहत शिविर की स्थिति को देखते हुए आरती के घर वालों ने उन्हें डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल में भर्ती करवाया है.

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बाढ़ प्रभावित इस इलाक़े को पार करते हुए मैं आगे कोलाखुआ के गोजाईगांव पहुंचा.
इस गांव में ज़्यादातर मकान की केवल छत दिखाई दे रही थी. क्योंकि बांस और टीन की छत से बने क़रीब सभी मकान आधे से ज़्यादा पानी में डूबे हुए थे और ख़ाली थे.
यहां चारों तरफ़ पानी ही पानी भरा था. एक देसी नाव के सहारे 200 परिवार की आबादी वाले इस गांव के अंदर जाने पर पता चला कि यहां से लगभग सभी परिवार अपनी जान बचाकर सुरक्षित जगह पर चले गए हैं.
केवल कुछ लोग चांग घर (बांस और पक्के पिलर से बना ऊंचा पारंपरिक मकान) पर अपने फर्नीचर और बाक़ी समान की रखवाली के लिए रुके हुए हैं.
यहीं चांग घर के ऊपर अपने नौ साल को बेटे के साथ रह रही तिलु रानी सैकिया हजारिका ने कहा, "हम बाढ़ के कारण पिछले एक हफ्ते से यहां बंदी है. कोई हमारी ख़बर लेने नहीं आता. सरकार की तरफ़ से राहत सामग्री एक दिन मिली थी वो भी मेरे पति को लाने के लिए नाव से जाना पड़ा. पिछले दो दिन से मेरा 10 साल का बेटा बुखार से तप रहा है लेकिन हम दवा लाने के लिए यहां से नहीं निकल पा रहें हैं. काफ़ी तकलीफ़ में दिन काट रहे हैं."

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गोजाईगांव की अहमियत क्यों
तिलुरानी की बात सुनकर मुझे नाव से वहां ले जाने वाले मिहिर ने उनसे कहा कि आज रास्ते खुल गए हैं और वे अपने बेटे को दवा दिलाने ले जा सकती हैं.
इस समय बाढ़ के भारी संकट से गुज़र रहे गोजाईगांव की अहमियत इसलिए है क्योंकि असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत इसी विधानसभा क्षेत्र से की थी.
अर्थात सोनोवाल ने अपना पहला चुनाव मोरान विधानसभा क्षेत्र से लड़ा था और गोजाईगांव इसी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है.
एक सवाल का जवाब देते हुए तिलु रानी ने कहा, "सोनोवाल पहली दफ़ा यही से विधायक बने थे और आज वे राज्य के मुख्यमंत्री हैं. हम सब गांव वालों को लगा था कि सोनोवाल नदी तट के पास एक बांध बनावा देंगे लेकिन वो मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार भी यहां नहीं आए."
वो कहती हैं, "पहले कांग्रस की सरकार थी और अब बीजेपी की सरकार है. लेकिन हमारे गांव को कोई फर्क नहीं पड़ा. हर साल हमें बाढ़ से भारी नुकसान उठाना पड़ता है. घर का सारा सामान, धान सबकुछ बर्बाद हो जाता है. इसलिए मेरे पति ने दो साल पहले कुछ पैसे जमा कर यह चांग घर बनवाया ताकि हम अपने क़ीमती समान को बाढ़ से बचा सकें."
तिलुरानी का एकमात्र बेटा अरुप सोनोवाल कलाखोवा गोजाईगांव प्राथमिक विद्यालय में कक्षा चार में पढ़ाई कर रहा है और वो चाहती हैं कि उनका बेटा अच्छी शिक्षा हासिल करे. लेकिन बाढ़ के कारण यहां स्कूल लंबे समय तक बंद रहते हैं.

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अबतक 30 की मौत
पिछले कुछ दिनों से असम और इसके ऊपरी हिस्से में लगातार हो रही बारिश के कारण आई बाढ़ से प्रदेश के कुल 33 में से 29 ज़िले बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से 17 जुलाई शाम को जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय राज्य के 4626 गांव बाढ़ के पानी में डूबे हुए हैं.
जबकि इन गांवों में 57 लाख 51 हजार से अधिक आबादी बाढ़ से प्रभावित हुई है.
असम सरकार ने पूरी तरह बेघर हुए लोगों के लिए 819 राहत शिविर स्थापित किए हैं, जिनमें 1 लाख 51 हजार 947 लोगों ने शरण ले रखी है.
पिछले 24 घंटो में बाढ़ के पानी में डूबने से 10 लोगों की मौत हो गई है. इस तरह अब तक मरने वालों की संख्या 30 हो गई है.
असम आपदा विभाग की एक जानकारी के अनुसार बाढ़ से सबसे ज़्यादा नुक़सान राज्य के धुबड़ी, मोरीगांव, धेमाजी और दरांग ज़िले में हुआ है.
इसके अलावा काजीरंगा नेशनल पार्क में पानी कम होने की बात कही जा रही है लेकिन 13 जुलाई से अबतक कम से कम 39 वन्य जीवों की बाढ़ के कारण मौत हुई है, इनमें एक सिंग वाले पाँच गैंडे बताए गए हैं.

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सड़कों पर बसेरा
बाढ़ में अपना सबकुछ गंवा चुके अधिकतर लोगों ने सड़क को अपना बसेरा बना रखा है, जहां इंसान और मवेशी साथ रहते हैं.
गोजाईगांव के रहने वाले रुखीनाथ हजारिका कहते हैं, "हमारे गांव में हर साल बाढ़ आती है लेकिन इस बार पानी ज़्यादा हुआ है. पानी अचानक बढ़ जाने पर आप खुद को बचाएंगे, न कि घर के सामान को. हमें बाढ़ का पता होता है इसलिए ज़्यादा सामान घर पर नहीं रखते. बस थोड़े से गुज़ारा कर रहे हैं."
अगर हर साल बाढ़ से तकलीफ़ होती है, तो इस इलाक़े को छोड़कर कहीं और क्यों नहीं बस जाते?
इस सवाल का जवाब देते हुए हजारिका कहते है, "किसानी के अलावा हमें कुछ नहीं आता. अगर कहीं चले भी गए तो हमें काम कौन देगा. बाढ़ की यह परेशानी बचपन से झेलते आ रहे हैं. सरकार चाहे तो बांध बनाकर हमें थोड़ी राहत दे सकती है लेकिन सुनवाई कहां है. मुख्यमंत्री सोनवाल यही से विधायक हुए और सांसद भी बने. उस समय वे बाढ़ से बचाने के लिए हमारी मदद करने की बात कहते थे, लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं किया."
राष्ट्रीय राजमार्ग 37 से जो सड़क कोलाखोवा गांव की तरफ जाती है, वो पूरा इलाक़ा बाढ़ की चपेट में आ गया है.
कोलाखोवा गांव की सड़क पर अपने मवेशियों को लेकर बैठी 45 साल की रूपज्योति बोरा बाढ़ वाले दिन को याद कर अब भी डर जाती हैं.

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'बाढ़ का सामना करना युद्ध का सामना करने जैसा'
वो कहती हैं, "यह शुक्रवार की रात की बात है. हम सभी खाना खाकर सो रहे थे. इतने में पानी आने की आवाज़ सुनी. पहले पानी धीरे-धीरे आ रहा था. लेकिन अचानक तेज़ी के साथ पानी घर में घुस गया. हम केवल धान को ही ऊपर रख सकें. बाक़ी सारा सामान बाढ़ के पानी में डूब गया. किसी तरह अपनी गाय और बच्चो को लेकर वहां से निकल कर यहां पहुंचे हैं."
दरअसल कोलाखोवा गोजाईगांव का यह इलाक़ा ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदी चेचा के बिल्कुल नज़दीक है.

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लेजाई हायर सेकेंडरी स्कूल में बने राहत शिविर में पिछले चार दिन से रह रहे शंकर ठाकुर कहते हैं, "हर साल खेती मज़दूरी करके थोड़ा बहुत पैसा जमा करते है. लेकिन जब बाढ़ आती है तो सब कुछ छोड़कर भागना पड़ता है. नदी पास है इसलिए बारिश होते ही बाढ़ आ जाती है. बाढ़ का सामना करना युद्ध का सामना करने जैसा है. पता नहीं अब आगे क्या करेंगे."
फ़िलहाल इलाक़े में लगातार बारिश हो रही है ऐसे में राहत शिविरों में रह रहे लोग कब तक वापस अपने घर लौटेंगे कोई नहीं जानता.
डिब्रूगढ़ ज़िला उपायुक्त पल्लव गोपाल झा कहते हैं, "ज़िला प्रशासन की तरफ़ से राहत शिविरों में रह रहे लोगों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है. राहत सामग्री समय पर पहुंचाने की व्यवस्था की गई है और मेडिकल सुविधा का भी ध्यान रखा जा रहा है. अभी स्थिति को सामान्य होने में थोड़ा समय लगेगा."
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