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असम की बाढ़: जहां सैलाब में बह गईं कई ज़िंदगियां
असम में आई बाढ़ ने वहां रहने वाले लोगों के जीवन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. बच्चे, बुज़ुर्ग और जानवर सभी बाढ़ के आए इस क़हर से जूझ रहे हैं.
जिन बच्चों के हाथों में खिलौने और किताबें होनी चाहिए वो पीने के पानी और खाने के लिए हाथ फैला रहे हैं. कई तस्वीरों में बच्चों को छाती तक भरे पानी में देखा जा सकता है.
वहीं कुछ महिलाएं हैं जो नाव चलाकर, ज़रूरतों का सामान इकट्ठा करके ख़ुद को और अपने परिवार को बचाने की कोशिश में लगी है. कई ऐसे बुज़ुर्ग है जिनके घर तो उजड़ गए हैं लेकिन वो अपने उजड़े घर के कुछ हिस्सों को बचाने की कोशिश में अब भी लगे हुए हैं.
ये तस्वीरें बाढ़ से जूझ रहे असम के आम लोगों के संघर्ष की एक झलक दिखाती हैं.
असम में बाढ़ आने से हालात इतने बेकार हो गए हैं कि पूरे राज्य में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है. बाढ़ के इस संकट से ख़ुद को बचाते हुए छाती तक भरे पानी में चलती हुई बच्ची.
राज्य में राहत और बचाव कार्य जारी है. लोगों को सुरक्षित रखने के लिए कैंप लगाए जा रहे हैं. ऐसे ही एक कैंप में अपनी आंखों में इस संकट के टलने की उम्मीद लिए एक बुज़ुर्ग महिला.
इस बाढ़ में कई लोगों के घर उजड़ गए. लेकिन घर के बचे हुए सामानों के जद्दोजगद के साथ नया घर बसाने की उम्मीद लोगों में अब भी ज़िंदा है. इसी तरह घुटनों तक भरे पानी में एक हाथ में झोला और चप्पल तो दूसरे में सिलेंडर लेकर चलते हुए एक बुज़ुर्ग.
खुद को सुरक्षित जगह ले जाने के लिए एक बच्चे को साथ लिए नाव का सहारा लेते हुए युवक.
संकट सिर्फ़ बाढ़ का नहीं बल्कि पीने के पानी का भी है. बाढ़ से जूझ रहे बच्चे पीने के पानी के लिए हाथ फ़ैलाते हुए.
अपने परिवारों के साथ लोग बाढ़ के इस कहर से अपने सामानों को बचाने के लि जूझ रहे हैं. इस तस्वीर में बचे बर्तनों और बची हुई उम्मीदों के साथ एक परिवार.
इंसान पर जब भी संकट आता है तो वो इश्वर को याद करने लगता है. फिर किसी के हिंदू या मुस्लिम होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि सबकी तकलीफ़े एक-सी हो जाती हैं और दुआएं भी. बाढ़ के संकट में भी नमाज़ अदा करते हुए बुज़ुर्ग.
जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो नुक़सान सिर्फ इंसान का ही नहीं होता है. जानवर भी उस आपदा से उतने ही प्रभावित होते हैं. लेकिन मनुष्य खुद को बचाने का रास्ता ढूंढ निकालता है और जानवर अपनी जान बचाने के संघर्ष में जुटे रहते हैं. ये तस्वीर इस बात को बयां करती है कि प्रकृति के लिए सब समान है. वो सभी के साथ एक जैसा ही व्यवहार करती है.
जिन बच्चों के हाथों में बल्ले होने थे, गेंदे होनी थी वे लकड़ियां चुन रहे हैं. ये एक पीढ़ी का नुक़सान है. बाढ़ ने कई ज़िंदगियों की दिशाएं मोड़ दी हैं.
जिन्हें न बाढ़ का मतलब मालूम है, न राहत कार्यों का. इन मासूमों के लिए सुरक्षा का मतलब है मां की गोद या पिता का साथ.
जो मुश्किलों में भी मुस्कुराने की ताकत रखती हैं. बाढ़ में नांव पर अपने परिवार के साथ सुरक्षित स्थान ढूंढती एक महिला.
आंखों में सवाल है, जिनके ठोस जवाब न परिवार के पास हैं न ही सरकार के पास.
बाढ़ ने बहुत कुछ छीन लिया है लेकिन फिर भी स्थितियों को बेहतर बनाने की गुंजाइश हमेशा रहती है.
बाढ़ के कारण बांध के टूट जाने से स्थिति ज़्यादा गंभीर हो गई है. लोग अपने घर तो खो ही चुके हैं लेकिन अन्य चीज़ों को बचाने में जुटे हैं.
तस्वीरों में वहां के लोगों की पीड़ा का बस हिस्सा भर है. उनकी तक़लीफ इन तस्वीरों से कहीं ज़्यादा बड़ी है.
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