चेन्नई को शिमला से सीखना चाहिए कि पानी की किल्लत से कैसे निपटा जाता है

    • Author, अश्वनी शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, शिमला से

हर संकट एक चुनौती होता है मगर कई बार इससे व्यापक और स्थायी समाधान भी निकलते हैं.

पिछले साल जून में भारत का मशहूर हिल स्टेशन शिमला जल संकट से गुज़र रहा था तो इस साल दक्षिण भारतीय शहर चेन्नई पानी की कमी से जूझ रहा है.

मगर पानी के संकट से कैसे उबरना है, इस मामले में भारत से दूसरे शहर काफ़ी हद तक शिमला से सीख ले सकते हैं.

ब्रिटिश काल में भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में एक साल के भीतर ही पानी का संकट ख़त्म हो गया. जो शहर पिछले साल जल संकट का सामना कर रहा था, जिसकी ख़बर न्यूयॉर्क टाइम्स और बीबीसी में भी प्रकाशित हुई थी, वहां इस साल नल, पानी स्टोर करने के टैंक, सब ओवरफ़्लो हो रहे हैं.

चेन्नई अगर शिमला से कुछ मामलों में सबक लेता है तो वहां रहने वालों को बड़ी राहत मिलेगी.

इस दिशा में काम जल्दी शुरू करना होगा क्योंकि चेन्नई में जल का मुख्य स्रोत तेज़ी से सूख रहा है और लोगों को पानी लेने के लिए सरकारी मोबाइल टैंकरों के सामने घंटों कतार में खड़ा होना पड़ रहा है.

जल संकट को लेकर सबसे अहम सवाल यह है कि जब तक समस्या गंभीर नहीं हो जाती, तब तक हम पानी का उचित प्रबंधन क्यों नहीं करते हैं?

इस सवाल पर योजनाकारों को सोचना चाहिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन के दौर में वे जल स्रोत सूख रहे हैं जो बारह महीनों पानी से भरे रहते थे और जिनका दोहन हम दशकों से कर रहे थे.

मगर इस मामले में समय पर गंभीर न होने का कारण शायद यह है कि हम लोग पानी को दुर्लभ संसाधन मानते ही नहीं हैं या फिर सोचते हैं कि समस्या आएगी तो उससे निपट लिया जाएगा.

लेकिन पहली बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने जयराम ठाकुर से ये सवाल पूछिए. जब पिछले साल शिमला में जल का संकट आया था तब उन्हें मुख्यमंत्री बने महज छह महीने हुए थे.

तब आम लोगों ने मध्यरात्रि में उनके घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था. शिमला के लोगों ने सड़कें जाम कर दीं थी और आम नागरिक धरने पर बैठ गए थे.

शहर को पानी मुहैया कराने वाला स्रोत, ब्रिटिश दौर यानी 1921-22 से ही शहर को पानी उपलब्ध करा रहा था. यह स्रोत लंबे समय तक चले सूखे और बेहद कम बर्फ़बारी के चलते सूखने की कगार पर पहुंच गया था.

यहां से 18-20 मिलियन लीटर जल प्रति दिन निकलता था जो घटकर 9.40 मिलियन लीटर प्रतिदिन तक पहुंच गया था.

शिमला को पानी उपलब्ध कराने वाले सभी छह स्रोतों को मिलाकर जो 35-40 मिलियन लीटर जल प्रति दिन शहर तक पहुंचता था, वह घटकर 18 मिलियन लीटर प्रतिदिन तक पहुंच गया था. नतीजा- शिमला में सात दिनों तक पानी की सप्लाई बंद रही.

सात दिन बिना पानी

शिमला की आबादी दो लाख तीस हज़ार के क़रीब है और गर्मी के सीज़न में यहां रोज़ाना 20 से 25 हज़ार पर्यटक पहुंचते हैं. इन सब लोगों को सात दिन तक पानी के बिना रहना पड़ा था.

स्थिति में सुधार तब जाकर हुआ जब हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए तत्काल समस्या का निदान करने को कहा.

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बीबीसी हिंदी को बताते हैं, "ऐसा नहीं था कि हमारी सरकार के दौरान ही पहली बार पानी का संकट उभरा था. यहां समस्या बनी हुई थी और लगातार गहरा रही थी जिस पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. जलवायु परिवर्तन, कम बारिश और बफ़र्बारी से लेकर शहर में बेतरतीब निर्माण सब समस्या को बढ़ा रहे थे. लेकिन समस्या हमारे ऊपर आ पड़ी."

इस साल जून बीत चुका है और शिमला शहर ख़ुद पर जल संकट की समस्या का हल निकालने वाले किसी मॉडल शहर के तौर पर गर्व कर सकता है.

शहर के 33 हज़ार घरों (जहां नल कनेक्शन लगे हैं) के लिए 44 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन की ज़रूरत है जबकि शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड (एसजेपीएनएल) के पास 50 से 52 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन उपलब्ध हो रहा है. इस लिमिटेड की स्थापना शहर में जल आपूर्ति के लिए की गई है.

एसजेपीएनएल के प्रबंध निदेशक इंजीनियर धर्मेंद्र गिल बताते हैं, "आज हम इस स्थिति में हैं कि कुछ वॉर्ड्स में सातों दिन चौबीसों घंटे पानी की आपूर्ति कर सकते हैं. कई साल के संकट के बाद भी, हमने ना तो जल की राशनिंग की है और ना ही नए कनेक्शन लेने पर रोक लगाई है. वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ महीनों में हमने 1400 नए पानी के कनेक्शन लगाए हैं. निर्माण कार्य के लिए दी जा रही जल आपूर्ति को रोका नहीं गया है. यह एक बड़ी कामयाबी है और वर्ल्ड बैंक ने भी इसे नोटिस किया है."

केपटाउन और शिमला की तुलना

इससे पहले शिमला की सड़कों में पानी के लिए ख़ूब घमासान देखने को मिलता था. सुबह और शाम में लोग, महिलाएं और बच्चे घंटो लाइन में लगकर पानी का इंतजार किया करते थे.

जानी-मानी पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने केपटाउन और शिमला की तुलना करते हुए नीति निर्धारकों और आम लोगों से जल संरक्षण के प्रति जागरूक होने की बात कही थी.

जिस शहर की रोज़ाना की ज़रूरत 44 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन की हो, वहां महज 18 मिलियन लीटर जल की उपलब्धता डराने वाली तस्वीर पेश करती है. ऐसी ही तस्वीर आज चेन्नई के अलावा भारत के कुछ अन्य शहरों की है.

कामकाजी महिला तृप्ता चौहान याद करती हैं, "पिछले साल के अनुभव तो डराने वाले सपने बन गए हैं. तब मुझे अपनी दो बेटियों को स्कूल भेजने से लेकर, घर के काम काज, बूढ़ी सास की देखभाल करने और किचन संभालने तक में मुश्किल हुई थी. घर के सात नलों में एक बूंद पानी नहीं था. मेरे पति कुछ डब्बे लेकर कार से यहां से 13 किलोमीटर दूर जाते थे वहां एक प्राकृतिक स्रोत से पानी लेकर आते थे. इस साल किचन और बाथरूम सब जगह पानी है."

रामनगर इलाके की एक घरेलू महिला किरण शर्मा बताती हैं, "लोगों को ये समझना होगा कि पानी एक संसाधन है. पिछले साल के संकट से शिमला ने सीखा है कि हमें इसकी बचत और संरक्षण दोनों पर ध्यान देना चाहिए. इस साल पानी की कोई समस्या नहीं है. हमें पीने और इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त पानी मिल रहा है. मैं ख़ुद जल संरक्षण को लेकर जागरूकता फैला रही हूं."

एसएजपीएनएल ने महिलाओं का एक सक्रिय समूह 'जल सखी' के नाम से बनाया है जिसकी महिलाएं अपने आसपड़ोस में जल संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाती हैं और जल की बर्बादी के बारे में भी सूचना देती हैं.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह बदलाव कैसे हुआ, किस बात का असर लोगों पर इतना हुआ है.

ऐसे सुधरे हालात

शिमला में पानी के संकट और इसके निदान को समझने के लिए इस शहर के ऐतिहासिक तथ्यों को देखना होगा. यह शहर क़रीब 30 हज़ार लोगों के लिए बसाया गया था लेकिन यह तेज़ी से फैलता गया.

इससे पूरे पहाड़ी इलाक़े की रूपरेखा बदलती गई. आबादी बढ़ने से पानी की मांग भी बढ़ी. अनियंत्रित निर्माण कार्य होने और वन क्षेत्र के कटने और कामचलाऊ सुविधाओं के चलते समस्या तेज़ी से बढ़ी.

शहर को पानी की आपूर्ति करने की सबसे पुरानी व्यवस्था गुम्मा में है, जो शहर से 35 किलोमीटर दूर है. यह 2200 मीटर की ऊंचाई पर बसे शहर को पानी मुहैया कराने का मुख्य स्रोत है.

यहां नौटी खड्ड नाम की बारह मासी नदी है जो क़रीब 1400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. इस स्रोत से पानी लेने के लिए पानी को पहले तो 700 मीटर ऊपर चढ़ाया जाता है फिर इसे पाइपों के नेटवर्कों के जरिए शहर में भेजा जाता है.

पाइपों की व्यवस्था भी समय के साथ जर्जर हो चुकी थी. शहर को पानी उपलब्ध कराने वाले पांच अन्य छोटे स्रोतों के साथ भी यही समस्या थी, जिसके चलते बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद भी होता था.

सरकारी एजेंसी WAPCOS लिमिटेड ने 2017-18 में जल आपूर्ति और जल मांग के आकलन के लिए एक अध्ययन किया. इस अध्ययन में पाया गया गया कि आपूर्ति किए जा रहे ड्रिंकिंग वॉटर का क़रीब 47 फ़ीसदी हिस्सा लीकेज के चलते बर्बाद हो रहा है.

वितरण के दौरान भी 25 प्रतिशत पानी बर्बाद हो रहा था. इसका मतलब यह था कि 70 फ़ीसदी से ज़्यादा पानी बर्बाद हो रहा था. इसके अलावा कुप्रबंधन की अपनी समस्याएं भी थीं, जिसमें अमान्य इमारतों-होटलों और ग़ैर क़ानूनी कॉलोनियों में पानी की आपूर्ति शामिल थी.

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के प्रधान सचिव श्रीकांत बाल्दी बता ते हैं, "हमने सबसे पहले अमूल्य पानी की बर्बादी को रोका. फिर मैंने क़रीब सौ साल पुरानी पाइपों को बदलने का आदेश दिया, जिसके बाद पानी की बर्बादी नगण्य हो गई. 1921-22 में जो पाइप लाइन बिछाई गई थी, उसे बदलने में आठ करोड़ रुपये खर्च हुए. इससे पानी की उपलब्धता बढ़ गई. हमने गुम्मा में ब्रिटिश काल में लगाए गए मोटर पंप को भी बदला. इससे स्थिति बेहतर हुई. इन दो क़दमों से ही 26 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन ज़्यादा उपलब्ध हो गया."

इसके बाद शिमला से 43 किलोमीटर दूर गिरि नदी योजना को भी सुधारा गया. 2007 में क़रीब 64 करोड़ की लागत से शुरू हुई योजना की क्षमता 21 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन की थी लेकिन ख़राब डिज़ाइन और लीकेज के चलते यहां से महज 12 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन आपूर्ति हो रही थी.

लेकिन सुधार कराए जाने के बाद यह योजना अपनी पूरी क्षमता के साथ शहर को पानी उपलब्ध करा रही है.

दीर्घकालिक रणनीति

एसजेपीएनएल ने गुम्मा योजना में 10 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन अतिरिक्त जोड़ने की व्यवस्था की है. इसके लिए शिमला से 32 किलोमीटर दूर चाबा में सतलुज नदी से पानी लिया जा रहा है.

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बताते हैं कि यह उल्लेखनीय काम महज 10 महीनों में 92 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है, इसके चलते ही अब राज्य के पास 51 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन उपलब्ध है.

जयराम ठाकुर ने बताया, "दो लंबी रणनीतियों के तहत हमने दो काम किए. एक तो मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बनाया, सप्लाई और वितरण नेटवर्क को बेहतर किया. नलों में लीकेज पर अंकुश लगाया. इससे पानी की उपलब्धता बढ़ी. इसके अलावा हम सतलुज नदी से पानी लेने की एक योजना बना रहे हैं जिससे 67 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन की आपूर्ति संभव होगी. वर्ल्ड बैंक की मदद वाली इस योजना की क्षमता 2050 तक 107 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन होगी."

शिमला के पूर्व मेयर और सीपीएम नेता संजय चौहान के मुताबिक़ दूसरे हिल स्टेशनों की तरह ही जलवायु परिवर्तन, सूखा और एक्स्ट्रीम वेदर कंडीशंस शिमला के लिए चुनौती बने रहेंगे. उन्होंने कहा, "इस साल जल आपूर्ति की स्थिति निश्चित तौर पर बेहतर हुई है. जो योजनाएं शुरू हुई हैं उसमें दीर्घकालीन ज़रूरतों का ध्यान रखा गया है. 2016 में इलाके में पीलिया का प्रकोप फैला था जिसके चलते हमें 10 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन देने वाले अश्वनी खड्ड योजना को बंद करना पड़ा था."

संजय चौहान के मुताबिक शिमला 85 जल प्रपातों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए और इसके अलावा अटल मिशन रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफ़ॉर्मेशन के अधीन गंदे पानी को साफ करने के पायलट प्रॉजेक्ट पर भी ध्यान देना चाहिए.

एसजेपीएनएल के निदेशक धर्मेंद्र गिल बताते हैं कि ऐसे नौ जल प्रपातों को पुनर्जीवित किया गया है और सार्वजनिक शौचालयों में इस्तेमाल हुए पानी को साफ़ करने के दो प्रॉजेक्टों ने काम करना शुरू कर दिया है. इसके अलावा शहर में 20 वॉटर एटीएम लगाए गए हैं और नौ वॉटर एटीएम जल्दी ही लगाए जाने पर काम चल रहा है.

राज्य सरकार ने बीते एक साल में शिमला में पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 125 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश किया है. वर्ल्ड बैंक चाहता है कि शिमला का मॉडल दूसरे शहरों में भी अपनाया जाए.

राज्य सरकार ने इसके साथ साथ मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह के साथ एक क़रार किया है जिसके तहत अश्वनी खड्ड और नौटी खड्ड के दो कैचमेंट इलाकों में छोटे-छोटे चेक डैम बनाए जाएंगे. इससे शिमला को पानी की आपूति करने वाले मुख्य स्रोत में मौसम की मार पड़ने पर भी पानी की कमी नहीं होगी.

शिमला के इतिहासकार और इंडियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज कार्यकर्ता राजा भसीन बताते हैं, "पर्वतीय क्षेत्र में आबादी बढ़ रही है, प्राकृतिक जल स्रोत सूख रहे हैं. बारह महीनों पानी से भरे रहने वाले स्रोत भी सूख रहे हैं. पर्यटक बड़ी संख्या में आ रहे हैं, बिना किसी योजना के निर्माण कार्य हो रहे हैं. ये सब चुनौतियां किसी भी अच्छी कोशिश को नाकाम कर सकती हैं. हिल स्टेशनों सहित सभी जगहों पर जल संकट गहरा रहा है. ऐसे में हमें पानी की हर एक बूंद बचानी चाहिए."

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