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मोदी पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था कैसे बनाएंगे
- Author, शिशिर सिन्हा
- पदनाम, आर्थिक मामलों के जानकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था.
आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 का यह मूल संदेश बजट का भी मूल वाक्य बन गया और अब मोदी 2.0 के पाँच सालों के कार्यकाल के दौरान आर्थिक रणनीति का आधार भी.
वैसे ये कोई पहला मौक़ा नहीं है जब आर्थिक सर्वेक्षण का प्रमुख वाक्य, आम बजट की धूरी में हो. याद कीजिए 'जैम' को.
आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 में हर आँख से आंसू पोंछने के लिए समाधान के रूप में जैम यानी JAM की बात कही गई थी.
जे का मतलब जन-धन खाता, ए का मतलब आधार और एम का मतलब मोबाइल फ़ोन कनेक्शन.
2015-16 के आम बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जैम के जरिए सरकारी योजनाओं का फ़ायदा सीधे-सीधे लाभार्थियों को देने का प्रस्ताव रखा था.
आज सरकार दावा करती है कि केंद्र सरकार के 55 मंत्रालयों और विभागों की 439 योजनाओं के तहत अब तक क़रीब साढ़े सात लाख करोड़ रुपए सीधे-सीधे लाभार्थियों के खाते में डाले गए और इससे लगभग 1.41 लाख करोड़ रुपए की बचत हुई.
ये एक उदाहरण है कि किस तरह से आर्थिक सर्वेक्षण के सुझाव सरकार की आर्थिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा बनते हैं.
वैसे जब जैम की अवधारणा पहली बार सामने रखी गई तो सबसे पहले आशंका ये बनी कि क्या एक झटके में सालों-साल से चली आ रही व्यवस्था को बदलना आसान होगा?
लेकिन सरकारी दावों पर यक़ीन करें तो व्यवस्था बदली.
मुकाम हासिल हो पाएगा?
अब क्या ऐसे में पहले आर्थिक सर्वेक्षण और फिर आम बजट में पांच खरब डॉलर के लक्ष्य को अहमियत देने और उस हिसाब से रणनीति का खाका सामने रखने के बाद ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाक़ई मार्च, 2025 तक भारत को ये मुकाम हासिल हो पाएगा?
वैसे यहां ये ज़िक्र करना ज़रूरी है कि 05 खरब डॉलर के लक्ष्य की बात को सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सामने रखा था.
05 खरब डॉलर मतलब 340 लाख करोड़ रुपये से 375 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था. मोदी भी मानते हैं कि ये चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है.
अब ये जानना ज़रूरी है कि इसके लिए आधार क्या हैं?
इसके लिए आपको आर्थिक सर्वेक्षण के पहले अध्याय को बारीक से देखना होगा क्योंकि महीन अक्षरों में पेज संख्या 04 के नीचे अंग्रेज़ी में कुछ वाक्य लिखे हैं.
बोलचाल की भाषा में समझें तो इन वाक्यों में कई 'यदि' हैं. मसलन यदि निर्यात बढ़े, यदि उत्पादकता बढ़े, यदि रुपए की क़ीमत घटे, यदि जीडीपी बढ़ने की वास्तविक दर (जीडीपी बढ़ने की सांकेतिक दर से महंगाई दर घटाने के बाद) 8 फ़ीसदी हो और यदि महंगाई दर चार फ़ीसदी के आसपास तो अर्थव्यवस्था 5 खरब डॉलर यानी 375 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचेगी.
यहां एक डॉलर की कीमत 75 रुपये रहने का अनुमान है जबकि आज की तारीख में औसत कीमत 68 रुपए के आसपास है.
लक्ष्य ज़्यादा महत्वकांक्षी तो नहीं?
अब बजट के दस्तावेजों में मध्यावधि में राजकोषीय नीति से जुड़े दस्तावेज में कुछ पंक्तियां लिखी हैं, जिनका मतलब ये है कि सर्वेक्षण ने 2019-20 में जहां जीडीपी बढ़ने की वास्तविक दर 7 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया और बजट के दस्तावेज कह रहे हैं कि 2020-21 में ये दर 7.3 फ़ीसदी और 2021-22 में 7.5 फ़ीसदी रहने का अनुमान है.
यानी 05 खरब डॉलर के लिए तय समय सीमा के शुरुआती तीन सालों में विकास दर सात से साढ़े सात फ़ीसदी के बीच रहेगी.
अब ऐसे में बाक़ी बचे तीन सालों 2022-23, 2023-24 और 2024-25 में विकास दर आठ फ़ीसदी से कहीं ज़्यादा और यहां तक कि दोहरे अंक में होनी चाहिए, तब जाकर लक्ष्य कहीं हासिल हो सकता है.
ऐसे में ये सवाल तो उठता है कि क्या ये लक्ष्य ज्यादा ही महत्वाकांक्षी तो नहीं?
जवाब है, हां.
इनकी वजहें हैः
- परेशानी यहां पर सबसे बड़ी ये है कि दुनिया भर में विकास दर की रफ्तार धीमी पड़ रही है.
- दूसरी ओर देश में उपभोक्ता मांग और निवेश मांग में अभी भी कमी बनी हुई है.
- तीसरी बात ये कि जलवायु परिवर्तन ने मॉनसून की रफ्तार को बिगाड़ रखा है जिसका असर भारतीय कृषि को भुगतान पड़ रहा है.
- चौथी बात ये है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा हिस्सा रखने वाले सेवा क्षेत्र में हालात बहुत अच्छे नहीं हैं.
- पांचवीं बात ये है कि कच्चे तेल को लेकर अनिश्चितता हाल-फ़िलहाल ख़त्म होती नहीं दिख रही.
मतलब ये कि अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां लगातार बढ़ ही रही हैं और जब आठ फ़ीसदी पर सवाल हो तो दोहरे अंक में विकास दर की बात तो बहुत ही दूर है.
लक्ष्य हासिल करने के लिए क्या किया गया?
अब ये देखा जाना ज़रूरी है कि बजट में पांच खरब के लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या कुछ ख़ास किया गया है.
पांच सालों में बुनियादी सुविधाओं पर 100 लाख करोड़ रुपए का निवेश, कारोबारी सुगमता का माहौल बनाने के लिए ज़िला स्तर तक के प्रयास पर ज़ोर, विदेशी निवेश की सीमा को आसान और शर्तों को सरल करना, मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए कच्चे माल पर सीमा शुल्क कम करना और तैयार सामान पर आयात सीमा शुल्क बढ़ाना और विदेशों में जाकर उधारी जैसी कुछ प्रमुख बातें हैं.
आख़िरी का प्रावधान काफ़ी रोचक है और इसके नतीजे काफ़ी दूरगामी हो सकते हैं. अगर सरकार अपनी उधारी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार का रुख़ करती है तो इसके दो असर हो सकते हैं.
पहला, सरकारी गारंटी की वजह से सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पैसा सस्ता मिलेगा, वहीं घरेलू बाजार में बैंकों पर सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाने का दवाब कम होगा. इससे वो ज्यादा से ज्यादा पैसा उद्योग को बतौर क़र्ज़ दे सकते हैं.
साथ ही इससे ब्याज दर में कमी आएगी, जिससे निवेश की लागत को घटाने में मदद मिलेगी. मत भूलिए कि आर्थिक सर्वेक्षण से लेकर बजट तक पाँच खरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए निवेश की रफ्तार बढ़ाने ही नहीं, लागत कम करने पर भी ख़ासा ज़ोर दिया गया है.
उम्मीद
अंत में एक नज़र वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की इन पंक्तियों पर, जो उनके बजट भाषण का हिस्सा है:
"भारतीय अर्थव्यव्था को एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने में 55 साल लग गए, लेकिन जब देश और उसके लोगों का दिल आशा, विश्वास और आकांक्षाओं से भरा हुआ है तो हमने पांच सालों में एक ट्रिलियन डॉलर जोड़ने का काम किया.
"आज हमलोग तीन ट्रिलियन डॉलर के क़रीब हैं. जब हम पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ख्वाहिश रखते हैं तो कई चकित होते हैं कि क्या ये संभव होगा."
"हमें अपने नागरिकों पर विश्वास है और उनके पुरुषार्थ और आगे बढ़ने के सपने पर भी. मोदी सरकार के नेतृत्व में हम इस लक्ष्य को ज़रूर हासिल करेंगे."
उम्मीदों पर दुनिया कायम है और भारत अपवाद नहीं है.
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