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अब योगी आदित्यनाथ ने खेला आरक्षण कार्ड, पर पांसा उलटा पड़ गयाः नज़रिया
- Author, शरत प्रधान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिससे भारत में राजनीतिक खिलाड़ी समय-समय पर खेलने से बाज नहीं आते.
आज़ाद भारत में ये कार्ड तकरीबन हर पार्टी ने अपने अपने तरीके से खेला और इसका भरपूर फ़ायदा उठाया है. शुरू के दशकों में तो ये सिर्फ़ अनुसूचित जाति और जनजातियों तक ही सीमित रहता था पर मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के लागू हो जाने के बाद पिछड़ी जातियों के आरक्षण की राजनीति ने ऐसा तूल पकड़ा कि सब इसी में लिप्त हो गये.
2019 लोकसभा चुनाव में जिस तरह नरेंद्र मोदी ने जादू किया उसके पीछे भी कहीं न कहीं पिछड़ों की राजनीति भी बहुत काम आई. काफ़ी हद तक ये असर पिछड़ी जातियों के वोट का था जिसने सपा-बसपा के गठबंधन को उत्तर प्रदेश में बड़ी चोट दी और विपक्ष की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, मोदी ने ऐसा पैंतरा फेंका कि बसपा सुप्रीमो मायावती केवल जाटव दलितों तक ही सीमित रह गईं और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव तो संपूर्ण यादव समाज को भी अपने साथ एकजुट करने में अक्षम रहे.
यूपी की जीत मोदी का जादू या योगी का करिश्मा?
शायद मोदी के इस चमत्कार को देखते हुए अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उसी पैंतरे को चलने की फिराक में हैं. और इसी उद्देश्य से बीते शुक्रवार को उन्होंने एक ऐसा निर्णय ले डाला जिससे 17 पिछड़ी जातियां अनुसूचित जाति की लिस्ट में परिवर्तित हो जायें. साथ ही साथ समस्त ज़िला अधिकारियों को ये भी निर्देश दे दिये कि परिवर्तित की गई जातियों को नये कास्ट सर्टिफिकेट भी जारी कर दिये जायें.
साफ़ ज़ाहिर है कि इसके पीछे 11 सीटों पर होने वाले आगामी विधानसभा उपचुनाव को प्रभावित करने का उद्देश्य है. ये जगहें खाली हुई हैं क्योंकि वहां के विधायक लोकसभा में निर्वाचित हो गये हैं.
अभी तक 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में मिली जीत का श्रेय योगी आदित्यनाथ लेते रहे हैं. केवल यूपी की भारी जीत का नहीं, देश में अन्य जगहों पर जिस तरह बीजेपी ने भारी जीत हासिल की उसकी वाह-वाही भी वो स्वयं को देते रहे हैं.
अब सबको पता है कि असली श्रेय का पात्र कौन है- वो हैं केवल एक व्यक्ति- नरेंद्र मोदी. चूंकि योगी आदित्यनाथ पूरे देश में चुनाव प्रचार करते रहे, तो जीत के लिए अपनी पीठ थपथपाना उनके लिए स्वाभाविक है.
अब आने वाले उपचुनाव में असली टेस्ट होगा उनकी चुनावी क्षमता का, क्योंकि इस बार मोदी तो शायद ही हर चुनावी क्षेत्र में रैली करें. तो जीत या हार का श्रेय योगी के सिर ही मंढ़ने वाला है.
योगी के दांव के पीछे यूपी उपचुनाव
वैसे सारा माहौल तो बीजेपी के माफिक ही है- सपा-बसपा गठबंधन टूट चुका है, कांग्रेस की हालत बद-से-बदतर हो चुकी है इसलिए मैदान बिल्कुल साफ़ है बीजेपी के लिए.
फिर भी योगी को संभवतः अंदर-अंदर की बात की शंका है कि विधानसभा उप-चुनाव में कहीं वैसा ना हो जाये जो कि 2018 के लोकसभा उप-चुनाव में उत्तर प्रदेश में हुआ था. उस समय तो बीजेपी को मुंह की खानी पड़ गयी थी और यहां तक कि योगी आदित्यनाथ के अपने गढ़ और निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर में भी उनका प्रत्याशी हार गया. भारत में राजनीतिज्ञों का आम तौर पर यह मानना है कि उपचुनाव के नतीजे सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में बहुत कम ही जाते हैं.
ऐसे में योगी आदित्यनाथ का पिछड़ी जातियों का कार्ड खेलना समझ में आता है. और एक दम से जारी किये गये ये आदेश जिसके ज़रिये 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति के लिस्ट में शामिल कर दिया जाना था, उसके पीछे ये ही उद्देश्य नज़र आता है.
वैसे तो मोदी के जादू का असर अभी ख़त्म नहीं हुआ है फिर भी अपने इस आदेश के ज़रिये, योगी आदित्यनाथ इन 17 पिछड़ी जातियों के एक बड़े वोट बैंक को सपा और बसपा से खींच कर बीजेपी की ओर आकर्षित करना चाहते हैं.
बीजेपी नेता ही आड़े आए
लेकिन उनकी इन उम्मीदों पे पानी फेरने कोई और नहीं, बल्कि बीजेपी के ही केंद्रीय समाजिक न्याय मंत्री थावर चंद गहलोत खड़े हो गये. गहलोत ने भरे संसद में योगी के इस कदम की आलोचन की है. इस आदेश को 'असंवैधानिक' बताते हुए उन्होंने कहा कि, अनुसूचित जाति की लिस्ट में किसी प्रकार का परिवर्तन करने का अधिकार केवल संसद को है, किसी भी प्रदेश सरकार को नहीं.
मज़े की बात है कि इस आदेश के विरोध में सबसे पहले मायावती ने आवाज़ उठाई. और राज्यसभा में उनकी बात को क़ानूनी रूप देने के लिये खड़े हुए उनकी बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा. मिश्रा ने ये दलील भी दी कि संविधान में राष्ट्रपति तक को ये अधिकार नहीं है कि अनुसूचित जाति की लिस्ट में किसी प्रकार के छेड़छाड़ कर सकें.
ऐसी स्थिति में योगी के पास अब इसके अलावा को और विकल्प नहीं बचता कि वो अपना आदेश वापस लें और नये सिरे से केंद्र सरकार से एक औपचारिक आग्रह करे. फिर मामला संसद में जायेगा और संसद उस पर अपना निर्णय दे. इससे ये तो तय है कि फिलहाल योगी को मुंह की खानी पड़ रही है और वो भी अपनी पार्टी के अंदर से. भारत के सबसे बड़े प्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री को आदत नहीं है 'ना' सुनने की. शायद इसी कारण उन्होंने इस बात की अनसुनी कर दी कि ऐसे आदेश दो बार जारी होने के बाद अस्वीकृत हो चुके हैं.
पहले भी किये गये थे ये प्रयास
पहली बार यही प्रयास, इसी राजनीतिक उद्देश्य के साथ सपा अध्यक्ष और तात्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 2004 में किया था. पर उसके ख़िलाफ़ रिट याचिका दाखिल की गयी और उस आदेश को हाई कोर्ट ने निरस्त कर दिया.
उसके आठ साल बाद, मुलायम के पुत्र अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान 2012 में इसे एक बार फिर जारी कर दिया. लेकिन इस बार भी उस आदेश का वही हश्र हुआ.
ये सब जानते हुए भी योगी आदित्यनाथ ने इस आदेश को जारी किया तो उसका मतलब ये भी हो सकता है कि उनका मक़सद था कि सगूफा छोड़ना. इस प्रकार से उन्हें कहने का मौका तो मिल गया कि वो स्वयं चाहते थे कि उन 17 जातियों का भला करें जिससे उनकी पार्टी को उन जातियों का समर्थन मिल सके आने वाले उपचुनाव में.
निशाना नहीं लग पाया
दरअसल इस हथियार के ज़रिये योगी एक तीर से दो निशाने साधना चाहते थे. एक ओर इन जातियों को ये दिलासा देना कि योगी को इनकी कितनी फिक्र है. और दूसरी ओर वो पिछड़ी जातियों को ये सिग्नल देना कि इसके ज़रिये वो आरक्षण की गुंजाइश बढ़ा रहे हैं, क्योंकि ये 17 जातियां पिछड़ी जाति की लिस्ट से बाहर हो जायेंगी.
कुछ भी हो, फिलहाल तो योगी का तीर निशाने पर नहीं लग पाया है. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकता कि ये क़दम पूरी तरह राजनीति से प्रेरित था और निस्संदेह आगे भी रहेगा.
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