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गयाः लू के कारण कर्फ्यू फिर भी मजदूरी करने को मजबूर: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, गया से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की राजधानी पटना से लगभग 120 किमी दूर बुद्ध की नगरी गया में पिछले पांच दिनों से धारा 144 लागू है.
16 जून को गया के डीएम ने लू और भीषण गर्मी के प्रकोप को देखते हुए जिले में धारा 144 लागू करने के अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया था कि "धारा 144 तब तक लागू रहेगी जब तक लू और गर्मी का प्रभाव सामान्य नहीं होता."
इसके अलावा भी डीएम ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया था कि पूरे गया जिले में कोई भी सरकारी कार्य चाहे वह सरकारी हो गैर सरकारी जिसमें मजदूर काम करते हों, बंद रहेगा. यही नहीं, सारे सांस्कृतिक आयोजन, समागम भी दिन के 11 बजे से चार बजे तक प्रतिबंधित हैं.
ऐसे हालात में भी गया के कुजाफी गांव के रहने वाले अविनाश कुमार दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में शहर के लेबर चौक पर रोजाना आते हैं. सुबह आठ बजे से 10 बजे तक काम मिलने का इंतजार करते हैं. ना मिले तो घर लौट कर घर जाने का मन नहीं करता, यह सोचकर कि पत्नी को क्या जवाब देंगे.
इधर पूरे बिहार में लू से मरने वाले लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढती जा रही है, सरकार और सिस्टम इसे प्राकृतिक आपदा तक मानने लगे हैं. लेकिन फिर भी अविनाश और उनकी तरह सैकड़ो मजदूर एक भी दिन घर में नहीं बैठे.
अविनाश कहते हैं, "दिहाड़ी का सवाल है. घर बैठ जाएंगे तो बीबी-बच्चे का क्या होगा! कौन खिलाएगा उन्हें. किसी तरह तो घर चल रहा है."
शुक्रवार की दिहाड़ी में अविनाश को सड़क को काटकर नाली के पाइप के जाने का रास्ता बनाने का काम मिला था.
वो कहते हैं, ''ठेकेदार से बात कीवाड़ लगाने के लिए दीवार में छेद करने की हुई थी. पहुँचे तो ठेकेदार ने उस काम को कल पर टालते हुए बाहर नाली का रास्ता बनाने का काम दे दिया.''
चिलचिलाती धूप में पक्की सड़क को हथौड़ी और छेनी से काट रहे अविनाश कुछ देर तक लगातार हथौड़ा चलाते. फिर जब पसीना होने लगता है तब कुर्ते के बांह से चेहरा पोंछ लेते. अपनी टोपी उतारते और हाथ वाले पंखे की तरह उसको दो-चार बार हिलाकर फिर से पहन लेते.
शुक्रवार को काम ही 11 बजे के बाद मिला था. जैसे जैसे दिन चढ़ रहा था उमस और गर्मी बढ़ती जा रही थी. लेकिन अविनाश इससे मानो बेखबर होकर हथौड़ी से छेनी पर वार करते जा रहे थे.
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गर्मी और लू से पिछले एक हफ्ते में 100 से अधिक जानें खत्म हो गईं हैं, क्या हो रही मौतों से अविनाश को डर नहीं लगता?
इस पर कहते हैं, "डर लगता है सर. लेकिन क्या करें दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है और हमको लू नहीं लगता. हम इसका उपाय जानते हैं. समय पर खाना पानी नहीं मिलने से ही लू असर करता है. हम दिन में भूखे नहीं रहते. चाहे छूछे (केवल) रोटी ही क्यों न हो, खाते रहते है. देखिए, आज तो वही है."
अविनाश के लिए वैसे तो यह कोई नया काम नहीं था, लेकिन बाकी दिनों की तुलना में यह बेहद जोखिम भरा इसलिए था, क्योंकि डीएम के आदेशानुसार इस तरह के काम के लिए मजदूरी करना और करवाना दोनो गया में प्रतिबंधित है.
खुद तो उन्होंने पहले ही बता दिया था कि ऐसा करना पेट और परिवार की मजबूरी है, लेकिन जहां वे काम कर रहे थे वहां कोई यह मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं.
अविनाश ने खुद ही इशारों में बता दिया कि ठेकेदार कौन था? वह शख्स तस्वीरें लेने पर आपत्ति जता रहा था. उसकी पत्नी कह भी रही थी कि "आप मीडिया वाले लोग यही दिखाना चाहते हैं कि डीएम के आदेश के बावजूद हमलोग काम करा रहे हैं".
तस्वीरें लेने से मना करने के दौरान थोड़ी देर के लिए ऐसा लगा जैसे वे लोग अविनाश को काम से निकाल देंगे. मगर फिर इस शर्त पर तैयार हुए कि उनके और उनके घर की तस्वीरें नहीं ली जाएंगी.
दोपहर के खाने का वक्त हो चला था. अविनाश ने खाने की इजाजत मांगी. फिर हाथ मुँह धोने बगल के हैंडपंप पर चले गए.
रात में जो खाना बच जाता है, वहीं सुबह में खाकर और उसे लंच में लेकर दिहाड़ी मजदूर अविनाश हर रोज सुबह आठ बजे तक डेल्हा के लेबर चौक पर काम के इंतजार में पहुंच जाते हैं. बीती रात बस रोटी ही बन पाई तो केवल रोटी ही उनका लंच होगा.
दूर खेत की मेड़ पर ताड़ के पेड़ के नीचे बैठकर वही रोटी बड़े इत्मीनान से तोड़-तोड़ कर खा रहे थे. खाते हुए उनसे हमारी बातचीत हुई.
उन्होंने बताया कि दो साल पहले अविनाश की शादी हुई थी. अब एक बच्ची भी है. माता-पिता बूढे हो चले हैं. उनसे अब काम नहीं होता. भाई का भी परिवार है. वो भी कमाता है.
कहते हैं, "मम्मी पापा बहुत गरीब थे. उनसे जितना हो सका पढ़ाया. आठवी तक पढ़े हम. उसके बाद नहीं पढ़ सके क्योंकि घर के हालत ठीक नहीं थे."
''इधर गर्मियों में दिहाड़ी कम मिलती है. खेती का काम बंद रहने के कारण सारे मजदूर शहर में ही काम ढूंढने आ जाते हैं. ऐसे में हर रोज काम मिलने की संभावना कम हो जाती है. ''
अविनाश को पिछले दिन तो काम मिल गया था, मगर उसके पहले लगातार दो दिन खाली हाथ घर लौटे थे.
काम के घंटों और अपनी दिनचर्या के बारे में अविनाश कहते हैं, "रात में 11 बजे तक सोते हैं. सुबह पांच बजे जग जाते. आठ घंटे का काम होता है. 300-350 रुपए मजदूरी है. 10 बजे से काम शुरु होता है, दिन में एक से दो बजे तक लगातार काम करते हैं. एक से दो बजे के बीच में कभी भी ब्रेक लेते हैं लंच के लिए. फिर उसके बाद वापस काम पर लौटते हैं. लगातार पांच बजे तक काम करते हैं. काम का घंटा पूरा हो जाता है. थोड़ा इधर-उधर 10 से 15 मिनट टहल लेते हैं. "
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उनके एक साथी मजदूर को पिछले दिनों काम करने के दौरान लू लग गई थी.
अविनाश को भी गर्मी में पैर के जख्मों ने परेशान किया है, वह कहते हैं, ''लू और गर्मी के कारण तो हम ही परेशान हैं. पैर में चार-चार जख्म हो गए हैं. बाल टूटने से ये जख्म होते हैं. एक खत्म होता है फिर नया हो जाता है. जख्म के साथ इस गर्मी में काम करने में बहुत मुश्किल आती है."
" लू के कारण हमारे साथ काम करने वाले एक मजदूर की हालत खराब हो गई थी. दोपहर का वक्त था. सेंट्रिंग का काम चल रहा था. सेंट्रिंग ठोकते-ठोकते मेरा साथी अचानक चक्कर खाकर गिर गया. उसको लू ही लगी थी. बर्दाश्त नहीं हो पाया था उससे. नाक फट गई थी (नाक से खून आना). उसमें करीब एक लाख रुपया इलाज में खर्चा हो गया है. हमारे पास तो इतना पैसा भी नहीं कि कुछ हो जाए तो इलाज कराएं! भगवान करे ना हो".
इसके बाद अविनाश झोले में रखे अपने सामानों को दिखाने लगते हैं. बैग में एक हाफ शर्ट, एक हाफ पैंट, दोनो पसीने से भीगे थे. कल काम किए थे तो वो अभी तक सूख नहीं पाया है.
ईंटा ढोने के लिए प्लास्टिक के बोरे से बनी एक टोपी थी. उसे दिखाते हुए कहते हैं," इसको लगाने से ईंट ढोने के दौरान दिमाग पर जोर नहीं पड़ता है."
अविनाश के फोन पर बार बार फोन आ रहा था. भाई की बेटी का जन्मदिन था. घरवाले बुला रहे थे, कहते हैं, "परिवार की बात है, जाना पड़ेगा. आज हाफ डे ही काम होगा."
लू से होने वाली मौतों में प्राय: वही लोग शामिल हैं जिनके पास काम के लिए घर से बाहर निकलने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
अविनाश और उनके जैसे सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर उन्हीं लोगों में से हैं.
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