भारत प्रशासित कश्मीर में सरकार की चरमपंथियों के साथ होगी चाय पर चर्चा?

    • Author, रियाज़ मसरूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

भारत प्रशासित कश्मीर में हाल ही में 115 चरमपंथी, 40 आम नागरिक और 50 आर्मी, सीआरपीएफ़ और पुलिस के लोग मारे गए हैं.

ऐसे वक़्त में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने चरमपंथियों से हिंसा का रास्ता छोड़ अपने राजभवन में बातचीत करने का निमंत्रण दिया है.

पिछले काफ़ी समय से सरकार का स्टैंड था कि जो भी बंदूक़ उठाएगा, वो मारा जाएगा जिस पर आर्मी चीफ़ बिपिन रावत ने भी ज़ोर दिया था. बातचीत के लिए सरकार का निमंत्रण पहले भी दिया गया है लेकिन कभी कोई नतीजा नहीं निकला.

राज्यपाल इस वक़्त जम्मू-कश्मीर में अकेले ही एक अथॉरिटी हैं क्योंकि राज्य में विधानसभा चुनाव सुरक्षा कारणों की वजह से नहीं करवाए जा रहे हैं. बुधवार को प्रेस कांफ्रेस में गवर्नर ने पत्रकारों से कहा कि भारत से आज़ादी, स्वायतत्ता या दूसरे राजनीतिक नारे झूठ हैं जिन्हें स्थानीय नेता युवाओं को बरगलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

उन्होंने कहा, "ऐसी अफ़वाहें उड़ रही हैं कि ये हो रहा है वो हो रहा है. नेता लोगों को डराने में लगे हैं. आप भारतीय संविधान के दायरे में कुछ भी मांग सकते हैं. जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान है, अपना झंडा है. आप इससे ज़्यादा चाहते हैं तो संविधान के दायरे में वो भी हो सकता है लेकिन नेताओं के झूठ पर विश्वास मत करिए. हथियार उठाकर अपनी ज़िंदगी बर्बाद मत कीजिए. बल्कि आप राजभवन आए और मेरे साथ चाय पीजिए, बात कीजिए."

ऑफ़र सुनने में तो अच्छा लेकिन..

यूं तो मुख्य अलगाववादी नेता या तो जेल में हैं या अपने घरों में नज़रबंद हैं. लोकसभा चुनावों से पहले कई पूर्व चरमपंथियों को गिरफ्तार कर लिया गया था. कुछ ऐसे भी लो-प्रोफाइल चरमपंथी हैं जो जेल से छूटने के बाद अलगाववादियों से भी दूर रहे और भारत का पक्ष लेने वाले दलों से भी. वे गवर्नर मलिक की बातों में कुछ उम्मीद तो देखते हैं लेकिन थोड़े शक के साथ.

पूर्व में चरमपंथी रहे इरफ़ान (अपना पूरा नाम नहीं बताना चाहते) ने कहा, "कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने 1994 में लड़ाई बंद कर दी थी और मिलिट्री ऑपरेशन में इसके कई लोग मारे गए थे. इसके कमांडर यासीन मलिक ने शांति से राजनीतिक संघर्ष करना शुरू किया और वह इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बात करने दिल्ली तक गए. आज वह जेल में हैं. गवर्नर का ऑफ़र सुनने में अच्छा लग रहा है लेकिन ये स्पष्ट नहीं है."

हालांकि राज्यपाल मलिक के बयान से ये अटकलें लगनी तो शुरू हो गई हैं कि भारत सरकार कश्मीर में चरमपंथियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. लेकिन राज्यपाल ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि बातचीत के लिए आधिकारिक निमंत्रण देना उनके हाथ में नहीं है.

चरमपंथ का गढ़ कहे जाने वाले दक्षिण कश्मीर में अरशीद अहमद नाम के एक कॉलेज छात्र का कहना है, "केंद्र सरकार सभी नेताओं को एक्टिविस्ट को जेल में डाल चुकी है. गवर्नर के साथ कौन लंच करेगा. कश्मीर का मुद्दा नौकरियों और विकास के बारे में नहीं है, भारत सरकार लोगों की राजनीतिक अपेक्षाएं नहीं समझ रही है. एक तरफ़ आप बातचीत के लिए बुलाते हैं और दूसरी तरफ़ मिलिट्री ऑपरेशन चलते हैं."

एक और पूर्व चरमपंथी निसार अहमद गवर्नर की बात को लेकर सकारात्मक हैं. उन्होंने कहा, "पहले सरकार ने 2009 में पुनर्वास नीति की घोषणा की. कम से कम 450 कश्मीरी लड़के पाकिस्तान से अपने परिवारों में लौट आए. उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है. लेकिन अब प्रशासन हमारी परवाह नहीं करता है. अपने ही घरों में हम अजनबी हैं. लेकिन अब भी अगर गवर्नर के पास ये हुक्म है और भारत सरकार लड़ाई को सच में ख़त्म करना चाहती है तो बातचीत ही पहला क़दम है."

निसार पाकिस्तान में हथियारों की ट्रेनिंग के लिए नब्बे के दशक में पाकिस्तान चले गए थे लेकिम बाद में ट्रेनिंग कैंप छोड़कर वहां अपना परिवार शुरू किया.

जानकारों का मानना है कि भारत सरकार मुख्यधारा से ख़ुद को बाहर महसूस करने वाले लोगों को वापस लाने के जो प्रयास कर रही है, वो अधूरे मन से कर रही है. वो दो घटनाओं का ज़िक्र करते हैं. एक तो 1995 में, उस वक्त के गृहमंत्री एस.बी. चौहान ने दिल्ली में चार चरमपंथियों से बात की थी लेकिन बातचीत आगे नहीं बढ़ी.

साल 2000 में सबसे पुराने और बड़े चरमपंथी ग्रुप हिज़बुल मुजाहिदीन के मुख्य कमांडर अब्दुल माजिद डार ने अपने कई शीर्ष कमांडरों के साथ श्रीनगर के नेहरू गेस्ट हाउस में भारतीय गृह सचिव कमल पाण्डे के साथ बातचीत की. हिज़बुल ने वार्ता को सुविधाजनक बनाने के लिए सीज़फ़ायर की घोषणा की लेकिन सीज़फ़ायर के लिए 15 दिन लग गए और कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने डार की 2002 में हत्या कर दी.

अगर राज्यपाल मलिक की सहमति से नई दिल्ली को स्वीकृति मिली तो वहां पहली बात प्रतिनिधियों की पहचान पर ही होगी.

श्रीनगर के पत्रकार रियाज़ मलिक बताते हैं, ''हुर्रियत का नेतृत्व जेल में है और सेना ने चरमपंथियों के नेतृत्व को ख़त्म कर दिया है. सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि आप चाय पर चर्चा के लिए जा किसके पास रहे हैं?''

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