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गोद लेने के लिए लड़कों के मुकाबले लड़कियां क्यों हैं पहली पसंद
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सविता की ज़िंदगी में बच्चे की कमी तो नहीं थी पर वो एक बेटी चाहती थीं. ऐसा भी नहीं था कि वो मां नहीं बन सकती थीं लेकिन उन्हें एक बच्ची को गोद लेना था.
इसी खुशी की तलाश में उत्तर प्रदेश में रहने वाली सविता और उनके पति एक अनाथालय पहुंचे. वहां उन्हें प्यारी सी बच्ची के रूप में एक नई दुनिया मिल गई.
एक-दूसरे से अनजान ये मां-बाप और बच्ची आज एक-दूसरे की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं.
यूपी की रहने वाली सविता अपनी ज़िंदगी में इस नए मेहमान को लाने की वज़ह कुछ इस तरह बताती हैं.
वह कहती हैं, ''मैं ऐसी जगह से आती हूं जहां बेटियां बोझ की तरह पाली जाती हैं. उन्हें बस निपटा देना होता है. छुपकर लिंग जांच कराई जाता है. लेकिन, मैं इस सोच को बदलते हुए अपनी बेटी को पालना चाहती थी. बेटियां भी उतने ही प्यार और सम्मान की हकदार हैं जितना की लड़के. इसलिए एक बेटा होने के बावजूद भी मैंने एक बच्ची को बराबरी और प्यार भरी ज़िंदगी देने का फ़ैसला किया. आज मेरी बेटी पीहू सबकी प्यारी बन गई है.''
जहां देश में बेटियां अनचाही औलाद मानी जाती हैं वहीं ऐसे भी लोग हैं जो बेटियों को गोद लेकर अपने और उनके जीवन की कमियां दूर कर रहे हैं. इतना ही नहीं लड़कों के मुकाबले लड़कियों को गोद लेने वाले लोगों की संख्या भी कहीं ज़्यादा है.
सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी (CARA) के 2018-2019 के आंकड़ों के मुताबिक इस एक साल में लोगों ने करीब 60 प्रतिशत लड़कियां गोद ली हैं. लोग लड़कों से ज़्यादा लड़कियों को गोद ले रहे हैं. 2018-2019 में भारत में कुल 3374 बच्चे गोद लिए गए थे. इनमें से 1977 लड़कियां और 1397 लड़के थे.
CARA बच्चा गोद लेने के मामलो में नोडल बॉडी की तरह काम करती है. यह मुख्य रूप से अनाथ, छोड़ दिए गए और आत्म-समर्पण करने वाले बच्चों के अडॉप्शन के लिए काम करती है.
नए आंकड़ों के मुताबिक भारत से बाहर की बात करें तो कुल 653 बच्चे गोद लिए गए जिनमें से 421 लड़कियां और 232 लड़के थे. इस तरह इस साल कुल 4027 बच्चे गोद लिए गए थे. गोद लेने के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे रहा है. यहां से कुल मिलाकर 477 बच्चे गोद लिए गए थे.
ये आंकड़ा कई सालों से ऐसा ही बना हुआ है. 2016-17 की बात करे तो भारत में 3210 बच्चे गोद लिए गए थे जिनमें से 1975 लड़कियां और 1295 लड़के थे. 2015-16 में 3011 बच्चे गोद लिए गए थे. इनमें लड़कियां 1855 और लड़के 1156 थे. 2017-18 में 3276 बच्चे गोद लिए गए थे लेकिन इसका लिंग आधारित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
भारत में महिलाओं और पुरुषों का लिंग अनुपात कभी भी बराबर नहीं हो पाया है और कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या बनी हुई है. 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 1000 पुरुषों पर 943 महिलाएं हैं. हरियाणा, दिल्ली, जम्मू और कश्मीर, चंडीगढ़ और महाराष्ट्र ऐसे राज्य हैं जहां ये अनुपात 900 से भी नीचे हैं.
ऐसे में गोद लेने का ये आंकड़ा थोड़ा हैरान करता है. घर के चिराग की चाह रखने वाले समाज में बेटियां गोद ली जा रही हैं. इस बदलाव की वजह क्या है.
संवेदनशील लोग ही चाहते हैं बेटियां
इस बारे में सविता बताती हैं, ''वो कई ऐसे लोगों से मिल चुकी हैं जो बच्चे गोद लेना चाहते हैं. ज्यादातर वो लोग बच्चे गोद लेते हैं जिनके बच्चे नहीं होते. इनमें से जिन्हें वंश चलाना है वो अपने रिश्तेदारों से लड़का गोद ले लेते हैं. लेकिन जिन्हें सिर्फ बच्चा पालना है वो लड़कियों को तवज्जो देते हैं.''
''जो थोड़े संवेदनशील लोग हैं वो ही गोद लिए बच्चे को स्वीकार भी करते हैं. इसलिए वो बच्चियों के प्रति ज़्यादा झुकाव दिखाते हैं क्योंकि समाज में उनकी स्थिति ज़्यादा खराब होती है. पहले के मुकाबले समाज में काफी बदलाव भी आया है. एक कारण ये भी है कि लोगों को लगता है कि बेटियां उनका ज़्यादा ख्याल रख सकती हैं. लोग एक सभी तरीके अपनाने के बाद ही बच्चा गोद लेने जाते हैं. ऐसे में बढ़ती उम्र में उन्हें बेटी का साथ ज़्यादा राहत और सुरक्षा देता है.''
संपत्ति एक बड़ा कारण
हालांकि, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में वूमन स्टडीज़ की असोसिएट प्रोफ़ेसर फिरदौस अज़मत इसके कुछ अलग कारण बताती हैं.
वह कहती हैं, ''इसके पीछे संपत्ति एक बड़ी वजह है. जब बच्चा गोद लेते हैं तो वो क़ानूनी रूप से आपकी संपत्ति का भी अधिकारी हो जाता है. अगर आप बेटा गोद लेंगे तो पूरी तरह से आपकी संपत्ति उसके पास चली जाएगी लेकिन अगर बेटी होती है तो वो शादी करके वहां से चली जाएगी. जरूरी नहीं कि वो संपत्ति का पूरा अधिकार मांगे या बिजनस है तो उसकी जिम्मेदारी ले.''
''ऐसे में अगर बेटा गोद लिया जाए तो परिवार और रिश्तेदारों में उसकी स्वीकृति नहीं हो पाती. लोग ये स्वीकार नहीं कर पाते कि किसी बाहर के बच्चे के पास पूरी संपत्ति जाए. बेटी ऐसे में ज़्यादा बेहतर विकल्प बनती है.''
फिरदौस बच्चियों की मानव तस्करी को भी इसका एक कारण मानती हैं.
वह कहती हैं, ''मैं ये तो नहीं जानती कि ऐसा कितना होता है लेकिन लड़कियों के साथ ये ख़तरा हमेशा रहता है. ऐसे लोग हो सकते हैं जो इस गलत मकसद से बच्चियां गोद लेते हों. हालांकि, जांच होती है पर पूरी तरह इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.''
आए दिन बच्चियों के कूड़े के ढेर में या नाले में मिलने की ख़बरे आती हैं. पैदा होते ही उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. ऐसे में अनाथ बच्चों में लड़कियों की संख्या ज़्यादा होती है.
सविता बताती हैं कि लड़कियों के मामले में मां-बाप के सामने ज़्यादा विकल्प होते हैं. जैसे ज़्यादातर मां-बाप को बहुत छोटे बच्चे चाहिए होते हैं ताकि वो आसानी से घर में घुलमिल जाएं और इस उम्र की अधिकतर लड़कियां ही मिलती हैं.
वह कहती हैं कि वजह जो भी हो लेकिन वो बच्चे एक अलग ही दुनिया में रहते हैं. जब आप उन बच्चों की दुनिया में पहुंचते हैं तो उनके असल हालातों का पता चलता है. जरूरी नहीं कि हर कोई बच्चा गोद ले लेकिन उनकी ज़िंदगी को जानने की कोशिश जरूर करनी चाहिए. ताकि आप जान सकें कि उपेक्षित किए गए उन बच्चों की ज़िंदगी कैसी है.
कैसे गोद लिए जाते हैं बच्चे
बच्चा गोद लेने के लिए केन्द्र सरकार ने सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) गठित की है. ये संस्था महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है.
साल 2015 में बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया के नियमों में संशोधन किया गया. गोद लेने के लिए मां-बाप को इन योग्यताओं को पूरा करना ज़रूरी है
- संभावित मां-बाप को शारीरिक रूप से, मानसिक तौर पर, भावनात्मक रूप से और आर्थिक दृष्टि से सक्षम होना ज़रूरी है.
- कोई भी संभावित माता-पिता जिनकी अपनी कोई जैविक संतान हो या न हो, वे बच्चा गोद ले सकते हैं.
- संभावित मां-बाप अगर दो साल से ज़्यादा वक़्त से शादीशुदा हों, तभी वो बच्चा गोद ले सकते हैं.
- बच्चा गोद लेने के लिए मां-बाप की उम्र एक बेहद अहम पहलू है. दंपत्ति के मामले में, भावी दत्तक माता-पिता की संयुक्त आयु मानी जाएगी.
- बच्चे और भावी दत्तक माता-पिता में से प्रत्येक की आयु में न्यूनतम अंतर 25 वर्ष से कम नहीं होना चाहिए।
- लेकिन यह नियम उस समय लागू नहीं होता है जब गोद लेने वाले संभावित माता-पिता रिश्तेदार हों या फिर सौतेले हों.
- जिन लोगों के पहले से ही तीन या इससे अधिक बच्चे हैं वे लोग बच्चा गोद लेने के लिए योग्य नहीं हैं. लेकिन विशेष स्थिति में वे भी बच्चा गोद ले सकते हैं.
सभी योग्यताओं और दस्तावेजों को पूरा करने के बाद ही गोद लेने की प्रक्रिया शुरू होगी. इसके लिए CARA की वेबसाइट पर उपलब्ध एक फॉर्म भरकर रजिस्ट्रेशन कराना होता है. दो लोगों की गवाही मांगी जाती है.
फिर भावी अभिभावकों के गृहनगर में पुलिस वेरिफिकेशन होती है, मेडिकल और मेरिटल स्टेटस के दस्तावेज देने होते हैं. अगर पहले से बच्चा है तो उसकी भी सहमति मांगी जाती है
फिर अभिभावकों का राज्य की एजेंसी से संपर्क कराया जाता है. एजेंसी आपके संपर्क में रहती है और कोई छोटा बच्चा आने पर जानकारी देती है. अगर बड़ा बच्चा चाहिए तो आप एजेंसी के पास जाकर बच्चों को देख सकते हैं.
कुछ दिनों के लिए बच्चा अभिभावकों के पास होता है और फिर रिव्यू किया जाता है कि माता-पिता और बच्चा एक-दूसरे के साथ खुश हैं या नहीं. अगर कोई समस्या होती है तो बच्चा वापस ले लिया जाता है. अगर सब ठीक होता है तो अंतिम औपचारिकताएं पूरी करके बच्चा अभिभावकों को सौंप दिया जाता है.
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