You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
इमरान ख़ान पर मोदी भरोसा क्यों नहीं कर पा रहे- नज़रिया
- Author, सुशांत सरीन
- पदनाम, रक्षा मामलों के जानकार
ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भारतीय प्रधानमंत्री के सामने दोबारा बातचीत के ज़रिए मसले सुलझाने की पहल की हो.
हाल के हफ़्तों में इस्लामाबाद ने कई ऐसे संकेत दिए हैं कि वो भारत से बातचीत करना चाहता है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है और कहा है कि '' पाकिस्तान अपने पड़ोसी मुल्कों से शांति की नीति अपनाता है. दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए काम करना और जम्मू-कश्मीर विवाद सहित सभी मुद्दों का शांतिपूर्ण समाधान बातचीत के ज़रिए निकालना चाहता है.''
मोदी सरकार ने अब तक इस पर कोई जवाब नहीं दिया है. ये पिछली कई बार से बेहद अलग है जब नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली सरकार में पाकिस्तान के साथ खुलकर अपनापन दिखाया, वह पाकिस्तान बिना किसी तय शेड्यूल के भी पहुंच गए, लेकिन इस बार वह पाकिस्तान को लेकर कोई भी क़दम सोच-समझ कर उठाना चाहते हैं.
भारत पाकिस्तान के संदेशों का जवाब देने में कूटनीतिक रूप से विनम्र और सही रहना चहता है.
भारत की ओर से नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान को न्योता ना दिए जाने से ही भारत ने ये साफ़ कर दिया कि वो पाकिस्तान को इस बार तवज़्जो नहीं देना चाहता.
इसे पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने अलग रंग दिया, उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी का चुनावी प्रचार पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी पर आधारित था ऐसे में वो तुरंत इमरान ख़ान को आमंत्रित कैसे कर सकते थे.
लेकिन सच ये है कि इमरान ख़ान को इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि भारत ने अपनी विदेश नीति में थोड़ा बदलाव किया.
इस बार सार्क देशों को ना बुलाकर बिम्सटेक गुट के देशों को आमंत्रित किया गया. भारत ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह यह क़तई नहीं दिखाना चाहता था कि पाकिस्तान के साथ वह चुनाव बाद पहले के ढर्रे पर वापस आ जाए.
देश के नए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ़ कर दिया कि भारत 'पड़ोसी सबसे पहले' यानी सार्क से अलग बिम्सटेक पर ध्यान लगा रहा है.
इससे पहले भारतीय विदेश मंत्रालय ने उन अफ़वाहों को भी ख़ारिज कर दिया जिसमें दावा किया जा रहा था कि भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कज़ाकिस्तान में होने वाली शंघाई कॉपरेशन ऑर्गेनाइजेशन समिट के दौरान मुलाक़ात कर सकते हैं.
मंत्रालय ने साफ़ किया कि ऐसी कोई भी बैठक तय नहीं की गई है.
भारत कहता है कि बातचीत और आतंकवाद एक साथ नहीं हो सकते. वर्तमान समय में भारत अपनी इसी नीति का पालन करता हुआ नज़र आ रहा है. लेकिन कूटनीति बारिकियों पर अभी तय टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी.
ये हो सकता है कि बिश्केक में दोनों देशों के प्रधानमंत्री जब आमने-सामने हों तो वे हाथ मिलाएं और एक औपचारिक मुस्कान भी उनके चेहरों पर नज़र आए. ये भी संभव है कि वह इस बैठक से अलग मुलाक़ात करें और कुछ अहम विषयों पर चर्चा हो.
इससे ये भी साफ़ होगा कि पाकिस्तान जो कहता है वो कहने को लेकर कितना गंभीर है. ये भी संभव है कि भारत के एनएसए और पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ के बीच भीतर खाने में कोई मुलाक़ात हो और बातचीत के रास्ते खुलें.
साफ़ तौर पर भारत के लिए चिंता के मुद्दों पर अब तक कार्रवाइयों के बिना पाकिस्तान की ये पहल उसकी मंशा पर सवालिया निशान खड़े करती है.
इस तरह अगर पाकिस्तान बिना कोई ऐक्शन लिए बात करना चाहता है और भारत बात करता है तो यह एक ग़लती होगी. भारत फिर पाकिस्तान के इस ट्रैप में फंस जाएगा.
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के तीन साल में पाकिस्तान ने भारत की पीठ में छूरा भोंका है. साल 2016 में की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत की पाकिस्तान को लेकर नीति में बड़े पैमाने पर बदलाव आया है.
बदला ना लेने की जो नीति पिछली भारतीय सरकारों ने अपनाई वह अब इतिहास जान पड़ता है.
नई नीति परक काम अब भी जारी है लेकिन ये सामंजस्यपूर्ण और विवादास्पद होने के बजाय अधिक यथार्थवादी, मज़बूत, और प्रतिशोधी है.
भारत को चाहिए कि पूर्व की कार्रवाइयों से अलग हट कर कुछ करे. हर बार जब पाकिस्तान पर वैश्विक दबाव पड़ाता है तो वह ऐसे क़दम उठाता है.
अब हाफ़िज़ सईद, अब्दुल रहमान मक्की और मसूद अज़हर जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के आतंकवादियों को 'नज़रबंद' करने के जैसे क़दम नाकाफ़ी हैं क्योंकि इन्हें ढील मिल ही जाती है.
कई पाकिस्तानी पत्रकारों ने रिपोर्ट में बताया है कि इन 'आतंकवादियों' को यूएन सरकार की ओर से शांत रहने और अंडरग्राउंड हो जाने के कहा जाता है और जैसे ही मुद्दे शांत होते हैं ये फिर सामान्य ज़िंदगी जीने लगते हैं.
यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए ये दिखावटी क़दम प्रयाप्त नहीं होंगे. ख़ासतौर पर ऐसी बातें कि किसी एनकाउंटर में हाफ़िज़ सईद या मसूद अज़हर का मारा जाना या फिर किसी वॉन्टेड चरमपंथी को भारत को सौंप देना.
पाकिस्तान के साथ दोबारा बातचीत करने का मतलब होगा कि पाकिस्तान को वह स्थान मुहैया करवाना जिसका इस्तेमाल वह अपनी स्थिति सुधारने के लिए और भविष्य में भारत को दोबारा नुक़सान पहुंचाने के लिए कर सकता है.
जैसे कि अभी हालात हैं, पाकिस्तान को शांति और बातचीत की ज़रूरत महसूस हो रही है. लेकिन इस बात से किनारा नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान बाक़ी देशों और विशेषकर भारत के साथ रिश्ते स्थापित करते वक़्त अपनी जिहादी नीति को केंद्र बिंदू बनाकर रखता है.
यहां तक कि पाकिस्तान की अपनी ज़मीन पर ज़िहाद के नाम पर चलने वाली तमाम फ़ैक्ट्रियों पर जो भी कार्रवाइयां की गई हैं, उसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान का हृदय परिवर्तन हो गया है.
इतना हो सकता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव जिसमें कि एफ़एटीएफ़ भी शामिल है, इसके चलते पाकिस्तान ने अपनी ज़िहादी नीति को थोड़ा सा बदल दिया है.
पाकिस्तान के ताजा आर्थिक हालात को देखें तो वह भारत के साथ निकट भविष्य में किसी भी तरह के संघर्ष या टकराव के मूड में दिखेगा.
मुद्दे की बात यह है कि अभी तक भी पाकिस्तान की तरफ़ से कोई स्पष्ट संदेश नहीं मिला है कि वह भारत के साथ शांतिवार्ता चाहता है. इमरान ख़ान की चिट्ठी में 'K' अक्षर यानी कश्मीर का ज़िक्र यह बताता है कि फ़िलहाल कुछ बदला नहीं है.
यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान की तरफ़ से बातचीत की यह पहल महज पाकिस्तान की ख़राब स्थिति को ही दर्शाता है. ऐसे में भारत पाकिस्तान को कोई लाइफ़ लाइन दे, इसका सवाल भी नहीं उठता. ख़ासतौर तब तक तो बिल्कुल भी नहीं जब तक कि भारत का यह दुश्मन देश भारत के तमाम सवालों पर संतोषजनक जवाब नहीं दे देता.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)