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यौन सुख में ग़ैर-बराबरी पर बात करने को हम कितने तैयार हैं?- ब्लॉग
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीते सप्ताह ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे #ऑर्गेज़्मइनइक्वालिटी हैशटैग ने ध्यान खींचा.
कंडोम बनाने वाली एक कंपनी 'ऑर्गेज़्म इनइक्वालिटी' कैंपेन पर दिए गए अपने एक हालिया बयान की वजह से अभिनेत्री स्वरा भास्कर विवादों में आ गईं.
लेकिन इस मामले ने भारत में महिलाओं की 'सेक्शुअल हेल्थ' और लैंगिक समानता से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए.
दरअसल, 'ऑर्गेज़्म इनइक्वालिटी' पर बात करते हुए स्वरा ने एक प्रायोजित सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि भारत में तक़रीबन 70 प्रतिशत महिलाएं सेक्स के दौरान ऑर्गेज़्म तक नहीं पहुंचतीं. स्वरा के इस बयान के तुरंत बाद दो बातें हुईं.
पहला, ट्विटर-फ़ेसबुक समेत सारे सोशल मीडिया पर उन्हें घटिया टिप्पणियों के साथ सेक्सिस्ट ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा. दूसरा, इसी सोशल मीडिया के ज़रिए पहली बार भारत में 'ऑर्गेज़्म इनइक्वालिटी' जैसे गंभीर और ज़रूरी मुद्दे पर बातचीत की शुरुआत हुई.
एक ओर महिलाओं ने इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठा पाने को 'साहस और हिम्मत' से लेकर 'घबराहट, दुख और उदासी' तक से जोड़ा. वहीं दूसरी ओर उन्होंने इस मसले पर गरिमामय ढंग से बात कर पाने के लिए ज़रूरी शब्दावली के न होने पर भी बात की.
बीते एक हफ़्ते से लगातार सोशल मीडिया पर तैर रहे इस प्रकरण से कम-से-कम एक सवाल तो साफ़ हो जाता है. क्या भारत ऑर्गेज़्म इनइक्वालिटी पर बात करने के लिए तैयार है?
इस जटिल सवाल के जवाब की तलाश मुझे बीते एक दशक के दौरान लंदन से लेकर लखनऊ और लखीसराय तक में अपनी महिला मित्रों के साथ हुई बातचीत पर ले गई.
मुझे याद है, 2016 में अक्टूबर की एक उमस भारी शाम मेरी एक सहेली दफ़्तर के नीचे लंच के दौरान अख़बार पलटते हुए अचानक चौंक गई थी.
फिर एक ख़बर दिखाते हुए उसने मुझे बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा है कि पति को लंबे वक़्त तक सेक्स के लिए मना करना 'क्रूरता' है और तलाक़ मांगने का आधार भी.
"महिला का पुरुष पार्टनर को मना करना क्रूरता है और पुरुष पार्टनर जो सालों तक अपनी महिला साथी के ऑर्गेज़्म का ख्याल न रखे, उसका क्या? क्या वह क्रूरता नहीं है?", उसने व्यंगात्मक लहजे में हंसते हुए मुझसे पूछा.
19वीं सदी के दौरान सबसे पहले स्त्री सेक्शुअलिटी को 'निष्क्रियता' से जोड़ने वाले डॉक्टर सिग्मंड फ्रॉयड ने शायद ख़ुद भी नहीं सोचा होगा कि आने वाली पूरी एक सदी तक महिलाओं की यौनिकता को सिर्फ़ बच्चा पैदा करने से जोड़ कर देखा जाएगा.
लेकिन 2019 के भारत में मेरे साथ पली, बढ़ी, नौकरी या ग़ैर नौकरी पेशा-तमाम महिलाएं 'स्त्री निष्क्रियता' से जुड़े सभी विचारों को एक 'सामंतवादी पुरुष की कल्पना' बताते हुए कहती हैं कि कई मामलों में उनके पुरुष साथी उनकी ऊर्जा को मैच नहीं कर पाते हैं.
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एक विवाहित और पुरानी महिला मित्र इसे पितृसत्तात्मक सोच से जोड़ते हुए कहती हैं, "मैंने यह महसूस किया है कि अगर लड़की सेक्स में ज़रा भी दिलचस्पी दिखाए तो उससे जन्म-जन्मांतर तक प्रेम करने का दावा करने वाला उसका अपना साथी पुरुष ही सबसे पहले उसे शक की निगाहों से देखता है. एक ओर जहां पुरुष प्रेम की 26 कलाएं बताकर बेडरूम में 'माचो' बन जाता है वहीं स्त्री अगर सिर्फ़ एक अदद ऑर्गेज़्म की मांग कर ले तो उसे तुरंत 'स्लट' घोषित कर दिया जाता है".
उसने कहा, "भारतीय समाज की हमसे अपेक्षा है कि हम चुपचाप अपने शरीरों को सेक्स के लिए पुरुषों को अर्पित करते रहें और परिवार की मर्ज़ी से- जितने वो चाहें उतने बच्चे पैदा करते रहें. जहां हमने ख़ुद को 'सिर्फ़ बच्चा जनने की मशीन से इतर एक इंसान' मानकर थोड़े से सुख की माँग कर ली, वहीं सारे पहाड़ एक साथ हम पर टूट पड़ते हैं"
लंबे समय तक एक असंतुष्ट शादी में रहने के बाद एक मुश्किल तलाक़ से गुज़री मेरी एक परिचित मित्र का कहना है स्त्रियों को भी लंबे समय तक अपनी यौनिक उपेक्षा को क़ानूनी अलगाव का आधार बनाना चाहिए.
स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध को काले और सफ़ेद की बाइनरी में नहीं देखा जा सकता. यह एक बहुत संवेदनशील, जटिल और ग्रे स्पेस होता है. ऊपर से भारत में महिलाओं की मानसिक बुनावट उन्हें पारम्परिक तौर पर यह सिखाती रही है की वह सालों तक शारीरिक रूप से असंतुष्ट रहते हुए भी एक दुखी शादी में जीती रहें, बच्चे जनती रहें, लेकिन अपने सुख के लिए अपना मुँह न खोले.
एक ओर जहां पुरुष सेक्स को अधिकार बताते हुए इनकार करने पर तलाक़ तक मांग लेते हैं वहीं हमारे आसपास की ज़्यादातर महिलाओं को यह भी नहीं मालूम कि ऑर्गेज़्म होता क्या है. और फिर यह इतना संवेदनशील मुद्दा है कि आप सामाज में किसी से सीधे नहीं कह सकते कि आप शारीरिक असंतुष्टि की वजह से अलग होना चाहती हैं क्योंकि इसे कारण माना ही नहीं जाएगा.
यह दुखद हैं कि हम सिर्फ़ घरेलू हिंसा जैसी आंखों से दिखने वाली हिंसा को ही हिंसा मानते हैं. जबकि शादी में लंबे वक़्त तक किसी भी एक पार्टनर को ऑर्गेज़्म से वंचित रखना भी एक तरह की हिंसा है.
अब सवाल यह उठता है कि एक ओर महिलाओं के ख़िलाफ़ साल दर साल लगातार बढ़ रहे यौन/घरेलू हिंसा के आंकड़ों और ऑर्गेज़्म-इनइक्वालिटी पर आवाज़ उठाते ही उनके तर्कों पर चारित्रिक सर्टिफ़िकेट चिपकाकर उन्हें स्लट-शेम करते हुए ख़ारिज करने वाले भारतीय समाज के इस पाखंडपूर्ण विरोधाभास की जड़ में क्या है?
जवाब है- पितृसत्तात्मक और सामंतवादी सोच.
पुरुष स्त्री के साथ-साथ उसकी सेक्शुअलिटी को भी नियंत्रित करना चाहता है. साथ ही यह भी कि भारतीय समाज को अपने भीतर मौजूद हिंसा पर आपसी प्रेम से विजय प्राप्त करने के लिए अभी एक बहुत लंबा रास्ता तय करना होगा.
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