अमित शाह कश्मीर, नागरिकता विधेयक और नक्सल समस्या से कैसे निपटेंगे

    • Author, संदीप सोनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में राजनाथ सिंह की जगह अमित शाह को गृहमंत्री बनाया है. अमित शाह को चुनावी राजनीति का माहिर खिलाड़ी माना जाता है, लेकिन अब उन्हें गृहमंत्री की कसौटी पर कसा जाएगा.

अपने पूर्ववर्ती गृहमंत्रियों की तरह भारत की क़ानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा संबंधी कई चुनौतियां उनके सामने होंगी, लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत में अवैध प्रवासियों का मुद्दा और नक्सलवाद वो चुनौतियां हैं जो गृहमंत्री अमित शाह की शुरुआत से ही परीक्षा लेंगी.

भारत प्रशासित कश्मीर और पूर्वोत्तर में अवैध प्रवासियों के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष के नाते अमित शाह चुनाव प्रचार के दौरान काफी कुछ कहते रहे हैं जिस पर बहुत विवाद भी हुआ है.

भारत प्रशासित कश्मीर के संबंध में धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए पर फ़ैसला लेना गृहमंत्री के तौर पर अमित शाह के लिए आसान नहीं होगा.

श्रीनगर में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार अल्ताफ़ हुसैन कहते हैं, ''गुजरात में फ़र्ज़ी मुठभेड़ों और कुछ अन्य वजहों से उनकी छवि नकारात्मक रही है. कश्मीर में धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए को हटाने के बारे में चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के नेता जिस तरह की बयानबाज़ी करते रहे हैं, उसी हिसाब से चले तो मैं ये पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि कश्मीर में लोग एक बार फिर सड़कों पर उतरेंगे. भारत सरकार कश्मीर के मामले में यदि कड़ाई से पेश आई तो बहुत ख़ून-ख़राबा हो सकता है. इसका असर भारत-पाकिस्तान संबंधों पर भी पड़ना तय है.''

अल्ताफ़ हुसैन के मुताबिक, ''अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद भारत सरकार कश्मीर के मामले में किसी शांति वार्ता को शुरू करेगी, इसकी बहुत उम्मीद अभी नहीं की जा सकती. लेकिन जिस बहुमत से प्रधानमंत्री मोदी ने दोबारा सरकार बनाई है, और यदि वो शांति की पहल करते हैं, तो इस मामले में मोदी-अमित शाह, पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी से आगे निकल सकते हैं.''

लेकिन क्या गृहमंत्री की कुर्सी राजनाथ सिंह से अमित शाह के पास आने के दौरान कश्मीर घाटी के हालात कुछ बदले हैं या ज़मीन पर हालात जस के तस हैं, इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार अल्ताफ़ हुसैन कहते हैं, ''आर्मी चीफ़ और कुछ मंत्री भले ही ख़ुद को शाबासी देते रहें लेकिन कश्मीर में बदला कुछ नहीं है. भारत सरकार को ये बात समझ में नहीं आती कि कश्मीर घाटी में अब पहले जैसी मिलिटैंसी के हालात नहीं हैं, जब चरमपंथियों की संख्या तीन-तीन हज़ार तक थी, अब ये संख्या 250-300 तक आ गई है.''

''लेकिन अब यहां के आम लोग, छोटे-छोटे बच्चे भी वहां पहुंच जाते हैं जहां सुरक्षाबलों की चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ हो रही होती है. नतीजा होता है कि चार चरमपंथी मारे जाते हैं तो साथ में पांच आम लोग भी मारे जाते हैं. इसलिए गृहमंत्री के तौर पर अमित शाह यदि कड़ाई से पेश आते हैं तो हालात बहुत बिगड़ सकते हैं.''

अल्ताफ़ हुसैन एक विरोधाभास की ओर भी ध्यान दिलाते हैं.

वो कहते हैं, ''राजनाथ सिंह के बारे में ऐसा लगता था कि कश्मीर के मामले में वो कुछ वाकई करना भी चाहते हैं. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. मसलन साल 2016 में राजनाथ सिंह ने मेरे एक सवाल के जवाब में कहा था कि पैलेट गन का कम से कम इस्तेमाल होगा, लेकिन बाद में उनके ही मातहत एक अफसर ने बयान दिया कि सेना पैलेट गन का इस्तेमाल करेगी. राजनाथ की जगह अब अमित शाह हैं जिनकी अपनी छवि कट्टर है. फिर भी गुंजाइश है कि अगर उन्होंने आम कश्मीरी को गले लगाया तो हालात बेहतर हो सकते हैं, वरना बात बिगड़ने में देर नहीं लगेगी.''

पूर्वोत्तर भारत और अवैध आप्रवासियों का मुद्दा

पूर्वोत्तर भारत आंतरिक सुरक्षा के हिसाब से भारत की सरकारों के लिए अक्सर चुनौतीपूर्ण रहा है. इस इलाके में उग्रवादी संगठन हाल के वर्षों में पहले के मुक़ाबले थोड़ा कम सक्रिय हैं लेकिन उनकी जड़ें वहां अभी भी मौजूद हैं.

राजनाथ सिंह के कार्यकाल के दौरान पूर्वोत्तर राज्यों, ख़ासतौर पर असम में अवैध आप्रवासियों का मुद्दा गृह मंत्रालय की प्राथमिकता में शामिल रहा है. इससे जुड़ी चुनौतियां अमित शाह को राजनाथ सिंह से विरासत में मिल रही हैं.

पूर्वोत्तर के राज्यों में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने अवैध आप्रवासियों को बाहर निकालने के लिए बड़ा दम भरा था, लेकिन तब वो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और चुनाव के माहौल के हिसाब से बोल रहे थे.

गृहमंत्री बनने के बाद अमित शाह के वही शब्द उनका पीछा करेंगे.

पूर्वोत्तर की राजनीति और अवैध आप्रवासियों से जुड़े घटनाक्रम पर पैनी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पीएम तिवारी कहते हैं, ''लोकसभा चुनावों में बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह पूर्वोत्तर इलाके और खासकर असम में अपनी तमाम रैलियों में दो बातें जरूर दोहराते थे. पहली यह कि बीजेपी केंद्र में लौटने के बाद नागरिकता (संशोधन) विधेयक लागू करेगी और दूसरी यह कि नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस यानी एनआरसी के जरिए तमाम अवैध आप्रवासियों की पहचान कर उनको देश से बाहर निकाल दिया जाएगा. लेकिन एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष के तौर पर यह सब कहना शाह के लिए जितना आसान था, अब देश के गृहमंत्री के तौर पर अपनी कही बातों पर अमल करना उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है.''

अवैध आप्रवासियों के मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर उभरे विरोध का उल्लेख करते हुए पीएम तिवारी कहते हैं, '' दो-तीन बातों को ध्यान में रखें तो शाह के समक्ष मौजूद पूर्वोत्तर की संभावित चुनौतियों की गंभीरता का अहसास होता है. पहली यह कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक का पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में काफी विरोध हुआ था. यह अलग बात है कि लोकसभा चुनावों के नतीजों पर इस मुद्दे का कोई असर नहीं नजर आया और बीजेपी की सीटों पहले के मुकाबले बढ़ गईं. लेकिन खासकर असम में बीजेपी सरकार के सत्ता में होने के बावजूद जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मुद्दे पर स्थानीय संगठनों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा, वह भावी खतरे का संकेत है.''

इसी तरह एनआरसी की प्रक्रिया भी शुरुआत से ही विवादों में रही है. एक ओर जहां सेना में दशकों तक काम करने वाले फौजियों को भी विदेशी घोषित कर डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया है. वहीं लाखों ऐसे विदेशी गायब हैं जिनकी शिनाख्त पहले अवैध आप्रवासी या विदेशी के तौर पर की गई थी.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है. अदालत ने अपनी पिछली सुनवाई में असम सरकार से पूछा भी था कि वह इन गायब विदेशियों का पता लगाने के लिए क्या कदम उठा रही है? एनआरसी के अंतिम मसौदे में लगभग 40 लाख नाम गायब थे और इनमें से कई का दावा है कि वो भारत के नागरिक हैं.

अब दावों और आपत्तियों को सुलझाने के बाद एनआरसी की अंतिम सूची 31 जुलाई को प्रकाशित होनी है. लेकिन अब तक मिले संकेतों से साफ है कि लाखों लोग इस सूची से बाहर रह सकते हैं. उसके बाद कानून और व्यवस्था को संभालना एक गंभीर चुनौती के तौर पर सामने आ सकती है.

आखिर में अगर इस बात को ध्यान में रखें कि पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगी दल ही सत्ता में हैं, तो बतौर गृह मंत्री अमित शाह के लिए इन समस्याओं से निपटने की चुनौती और जिम्मेदारी दोनों बढ़ जाती है.

पूर्वोत्तर में उग्रवादी गुटों की मौजूदगी याद दिलाते हुए पीएम तिवारी कहते हैं, ''इलाके के एनएससीएन (इजाक-मुइवा गुट) और उल्फा जैसे उग्रवादी संगठनों के साथ लंबे समय से जारी शांति प्रक्रिया को मंजिल तक पहुंचाना भी अमित शाह के लिए एक बड़ी और कड़ी चुनौती साबित होगी. गृहमंत्री के नाते इस मामले में शाह की भूमिका अहम होगी.''

नक्सल समस्या

प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह बार-बार ये कहते रहे कि नक्सलवाद की समस्या तीन साल में खत्म हो जाएगी और वो इसके समर्थन में आंकड़े गिनाते रहे.

लेकिन छत्तीसगढ़ में कई धमाके करके नक्सलियों ने अपनी मौजूदगी का एहसास कराकर राजनाथ सिंह के दावे को एक तरह से ख़ारिज किया. जानकार मानते हैं कि गृहमंत्री रहते हुए राजनाथ सिंह नक्सल समस्या की जड़ को नहीं समझ सके, और यही चुनौती नए गृहमंत्री अमित शाह के सामने होगी.

नक्सल समस्या को गहराई से समझने वाले भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी प्रकाश सिंह कहते हैं, ''गृह मंत्रालय में कई ज्वाइंट सेक्रेटी ऐसे रहे, जो कभी छत्तीसगढ़ या झारखंड नहीं गए हैं और कागज़ पर समस्या को सुलझा रहे हैं. नौकरशाह बड़े हल्के में कहते रहे कि नक्सल आंदोलन ख़त्म हो गया है, पिछले साल इतनी घटनाएं हुईं, इतने लोग मारे गए, इनका भौगोलिक विस्तार कम हो गया है, बस इसी तरह से पिटाई करते रहिए और दो साल में मामला ख़त्म हो जाएगा.''

प्रकाश सिंह याद दिलाते हैं कि कम से कम दो बार ऐसा हो चुका है जब सरकारों को लगा कि नक्सली कमज़ोर हो गए हैं और उसके बाद सरकारों के अनुमान ग़लत साबित हुए. वे कहते हैं, ''जंगलों में रहने वाले जनजातीय समुदाय का विस्थापन अभी भी जारी है. जंगल की ज़मीन कॉर्पोरेट समूहों को दी जा रही है. इससे वनवासियों में काफी नाराज़गी है. उन्हें लगता है कि सारा सरकारी तंत्र उनका शोषण कर रहा है.''

जानकार मानते हैं कि अमित शाह यदि नक्सल समस्या के मामले में अपने पूर्ववर्ती राजनाथ सिंह की तरह चले तो नक्सली समस्या का कोई समाधान नहीं होगा.

इससे एक कदम आगे प्रकाश सिंह का ये मानना है कि ''प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे कार्यकाल में नए गृहमंत्री अमित शाह के लिए ये एक आदर्श समय है जब सरकार को शांति वार्ता की पेशकश करनी चाहिए. अगर कोई फॉर्मूला काम कर जाए तो नक्सलियों का एक बड़ा हिस्सा हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण भी कर सकता है.''

लेकिन ये सब इस बात पर निर्भर करेगा कि अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय कैसी रणनीति बनाता है और उस पर किस तरह अमल करता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)