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आंध्र प्रदेश में क्या वाईएसआर कांग्रेस से बढ़ेगी बीजेपी की नज़दीकी: नज़रिया
- Author, उमर फ़ारूक़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनावों के साथ हुए विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल करने वाले वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की.
प्रधानमंत्री ने गले लगकर जगन मोहन का स्वागत किया और रेड्डी ने प्रधानमंत्री को शॉल और तिरुपति बालाजी की तस्वीर तोहफ़े में दी.
इस मुलाक़ात में रेड्डी ने प्रधानमंत्री को अपने शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्योता भी दिया. मोदी से मुलाक़ात के बाद वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से भी मुलाक़ात की.
इन मुलाक़ातों के बाद जगन मोहन रेड्डी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई.
यह वही मुद्दा है, जिसे लेकर बीजेपी और आंध्र प्रदेश के पूर्व सीएम चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी के बीच लोकसभा चुनाव से पहले अलगाव हो गया था.
आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा न मिलने से ख़फ़ा आंध्र के तत्कालीन सीएम ने एनडीए से किनारा कर लिया था. इस बार लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने इसी मुद्दे को उठाया और जीत हासिल की.
अब जगन मोहन ख़ुद सत्ता में आ गए हैं तो उनके लिए भी इस मुद्दे पर कुछ करके दिखाने का दबाव बना हुआ है. सवाल उठ रहा है कि क्या वह आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा दिला सकते हैं? क्या प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह से उनकी यह मुलाक़ात इसी की एक कोशिश थी?
मोदी से क्या चाहते हैं जगन मोहन
जगन मोहन ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "अगर बीजेपी लोकसभा चुनावों में 250 सीटें जीतकर आई होती तो स्थिति अलग होती और तब हम आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की शर्त पर उन्हें अपने सांसदों का समर्थन दे देते."
जगनमोहन रेड्डी अकेले नहीं हैं, कई ऐसे क्षेत्रीय नेता हैं जिनकी उम्मीदों पर इस बार पानी फिर गया कि बीजेपी को किसी राजनीतिक दल के सहयोग की ज़रूरत नहीं हैं. वह ख़ुद 303 सीटें जीत आई है.
चंद्रशेखर राव को भी निराशा हुई है और जगनमोहन रेड्डी को भी क्योंकि उनका अंदाज़ा था कि शायद बीजेपी को 250 के क़रीब सीटें मिलेंगी. उसे कुछ सीटों की ज़रूरत पड़ेगी तो वे सौदेबाज़ी करेंगे कि उनके राज्यों को विशेष दर्जा दीजिए और बदले में समर्थन पाइए.
यह स्थिति ख़त्म हो गई. मोदी से मुलाक़ात के बाद जगनमोहन रेड्डी ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में माना कि अब केंद्र पर दबाव डालकर विशेष राज्य का दर्जा लेना असंभव है मगर वो अपना संघर्ष जारी रखेंगे और केंद्र पर ज़ोर देंगे कि उन्हें विशेष दर्जा दिया जाए क्योंकि उनकी आर्थिक हालत बहुत ख़राब है.
दूसरी मांग उन्होंने यह की कि केंद्र दिल खोलकर उनकी आर्थिक सहायता करे क्योंकि राज्य इस समय क़र्ज़ में डूबा हुआ है. उन्होंने कहा कि जब राज्य का बंटवारा हुआ था 2014 में तो 97,000 करोड़ रुपये का क़र्ज़ राज्य पर था, अब ये बढ़कर 2 लाख 15 हज़ार करोड़ रुपये हो गया है. 20 हज़ार करोड़ रुपये तो क़र्ज़ का ब्याज चुकाने में ही ख़र्च हो रहे हैं.
कुल मिलाकर आंध्र प्रदेश की हालत अच्छी नहीं है और कोई भी राज्य सरकार जिसकी अच्छी हालत न हो, वह केंद्र सरकार से दोस्ताना संबंध चाहती है. यही जगनमोहन रेड्डी चाहते हैं कि कोई समस्या न उभरे.
मगर उसका दूसरा भाग यह है कि अगर केंद्र सरकार आंध्र को विशेष दर्जा नहीं देती है तो एक बार फिर से ये राज्य की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरेगा. अभी तो रेड्डी के लिए हनीमून पीरियड है मगर विशेष दर्जा नहीं मिला तो चंद्रबाबू नायडू और अन्य विपक्षी नेता यह पूछ सकते हैं कि जब वो सत्ता में थे, तब तो उन्होंने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था मगर अब ख़ुद क्या कर रहे हैं?
बीजेपी ने नए दोस्त बन सकते हैं रेड्डी?
इस सवाल का जवाब यह है कि अगर ऐसा हुआ तो इसका एक ही कारण होगा कि इस समय आंध्र प्रदेश में बीजेपी का नामोनिशान मिट गया है.
न एक सीट विधानसभा में आई, न लोकसभा में. वोटों का हिस्सा भी बुरी तरह से नीचे गिर गया और 2-3 प्रतिशत रह गया है.
वहां बीजेपी संगठन का कोई ढांचा नहीं है, कोई बड़ा नेता भी नहीं है. ऐसे में मोदी और अमित शाह अगर चाहते हैं कि आंध्र में बीजेपी का नाम बाक़ी रहे तो वे चाहेंगे कि वहां की सत्तारूढ़ पार्टी के साथ दोस्ताना संबंध हों.
लेकिन बात याद रखने की यह है कि विशेष दर्ज़ा देने का जो वादा है, वह 2014 में आंध्र प्रदेश के बंटवारे की बहस के दौरान भी संसद में किया गया था. फिर 2014 के चुनावी अभियान में नरेंद्र मोदी ने भी वादा किया था कि विशेष दर्ज़ा दिया जाएगा क्योंकि आंध्र की हालत ख़राब है.
इन सब बातों के बावजूद पांच वर्षों में मोदी सरकार विशेष राज्य का दर्ज़ा देने से साफ़ इनकार करती रही है. यह बड़ा मुद्दा बना और इसी वजह से शायद बीजेपी का इतना बुरा हाल हुआ है आंध्र प्रदेश में.
अभी भी अगर आंध्र को विशेष दर्जा नहीं मिला तो इसका नुक़सान बीजेपी को हो सकता है और बीजेपी से ज़्यादा जगनमोहन रेड्डी को हो सकता है.
रेड्डी की मजबूरी ज़्यादा
हो सकता है कि नरेंद्र मोदी सरकार एक अच्छा आर्थिक पैकेज ऑफ़र करे और कुछ सहायता करे, जैसा कि उन्होंने चंद्रबाबू नायडू को किया था.
चंद्रबाबू नायडू ने मुख्यमंत्री के रूप में आर्थिक पैकेज को स्वीकार कर लिया था मगर यही जगनमोहन रेड्डी थे जिन्होंने इसका विरोध किया था.
उनका कहना था कि आर्थिक पैकेज और विशेष दर्ज़ा अलग-अलग चीजे हैं. रेड्डी ने कहा था कि विशेष दर्ज़े के तहत टैक्स, अन्य चीज़ों और औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने में जो सहूलियत मिलती है, वह पैकेज में नहीं मिल सकती. ज़ाहिर है, अब यही दलील चंद्रबाबू नायडू दे सकते हैं.
रहा सवाल दोस्ताना संबंधों का, तो बीजेपी के लिए वाईएसआर कांग्रेस से संबंध उतने ज़्यादा मायने नहीं रखते, मगर जगनमोहन रेड्डी के लिए अहम बात होगी कि उनके केंद्र से उनके संबंध दोस्ताना बने रहें.
(बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर से बातचीत पर आधारित)
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