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नीतीश कुमार फैक्टर भले ग़ायब हो लेकिन उनके वोटबैंक से ही तय होगा बिहार का नतीजा
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार की 40 सीटों को लेकर जो एग्ज़िट पोल के नतीजे बता रहे हैं अगर वो असल नतीजे में तब्दील हो जाते हैं तो इसका सबसे बड़ा सियासी फ़ायदा नीतीश कुमार को होगा और अगर नतीजे एग्ज़िट पोल के परिणाम के उलट होते हैं तो फिर सबसे ज़्यादा नुकसान भी नीतीश कुमार को ही होना है.
ये स्थिति तब है जब 2014 से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शुमार नीतीश कुमार अब महज नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी के एक सहयोगी भर हैं और इस बार बिहार के चुनाव में उनका अपना काम और सुशासन बाबू की छवि कहीं नजर नहीं आई. नीतीश कुमार खुद नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर वोट मांगते नजर आए.
राष्ट्रीय जनता दल के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी बताते हैं, "पहले तो बिहार में कहा जा रहा था कि देश भर में मोदी के नाम पर वोट मांगे जाएंगे लेकिन बिहार में चेहरा नीतीश कुमार होंगे. पहले एकाध चरण में तो नीतीश ने मोदी का नाम नहीं लिया लेकिन हालात का अंदाज़ा होने के बाद वे अपनी सभाओं में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर वोट मांगने लगे."
चुनावी अभियान के दौरान राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव ने इस बात को भी मुद्दा बनाया कि नीतीश कुमार अपनी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र तक जारी नहीं कर पाए. इस बात की चर्चा भी होती रही कि बीजेपी के दबाव के चलते जदयू अपना घोषणा पत्र जारी नहीं कर सकी.
तेजस्वी यादव ने अपने पूरे चुनावी अभियान में जितना बीजेपी को टारगेट किया उससे कहीं ज़्यादा उन्होंने नीतीश कुमार को निशाने पर लिया और उन्हें 'पलटू चाचा' कह कर जनादेश का अपमान करने वाला नेता बताया.
तेजस्वी कहते हैं, "नीतीश चाचा जो बात कहते थे, उस सबसे पलट गए हैं, ये बिहार की जनता देख रही है. वे कहते थे मिट जाएंगे लेकिन मिलेंगे नहीं, आप देखिए क्या स्थिति है. कहते थे कि राजनीति लोक-लाज से चलने वाली चीज है लेकिन जनादेश का ऐसा अपमान किसने किया होगा. इतना ही नहीं वे बीजेपी का फुल फॉर्म बताते थे बड़का झुट्ठा पार्टी."
नीतीश का असर वैसा नहीं?
इस पूरे चुनावी अभियान के दौरान नीतीश कुमार ने मीडिया से कोई बातचीत नहीं की. उनकी पार्टी से जुड़े कई लोगों ने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में नीतीश कुमार मीडिया से बातचीत के लिए खुद को सहज नहीं पा रहे हैं, इसलिए बच रहे हैं.
हालांकि चुनाव निपटने के बाद नीतीश कुमार मीडिया के सामने आकर बोले कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनेगी और वो नई दिल्ली में एनडीए की बैठक में भी शरीक होने पहुंचे.
शिवानंद तिवारी कहते हैं कि कभी विपक्ष की ओर से संभावित सबसे बड़े पद का दावेदार होने वाले नेता के लिए यह पतन नहीं तो क्या है.
दरअसल बिहार की राजनीति को 2014 के आम चुनाव के नतीजों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उस वक्त बीजेपी, राम विलास पासवान की एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी के साथ चुनाव मैदान में थी, जबकि राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस के गठबंधन और जनता दल (यूनाइटेड) ने अलग अलग चुनाव लड़ा था.
उस चुनाव में बीजेपी को करीब 29.9 फ़ीसदी वोट मिले थे. जबकि एलजेपी को 6.5 फ़ीसदी वोट मिले थे. वहीं राष्ट्रीय जनता दल को 20.5 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को 8.6 फीसदी वोट मिले थे.
उस चुनाव में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड को 16 फ़ीसदी वोट मिले थे. इतने वोट बैंक के साथ नीतीश कुमार खुद एक राजनीतिक ताकत तो नहीं हो सकते लेकिन उनका साथ चाहे वो बीजेपी के साथ हो या फिर आरजेडी के साथ उसे निर्णायक बढ़त दिलाने का दम रखते हैं.
महादलितों की अहमियत
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2019 में नीतीश कुमार अपना वोटबैंक सुरक्षित रख पाए हैं?
जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता राजीव रंजन बताते हैं, "इस बार हम लोगों को वोट बैंक बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है, हमें कई इलाकों से मुसलमानों का समर्थन मिलने की उम्मीद है."
दरअसल, नीतीश कुमार ने 2005 से पहले बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय और दलितों का एक बड़ा वोट बैंक एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी.
नीतीश कुमार अपने इस वोट बैंक को लेकर कितने सजग हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे जब भी अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से मिलते हैं या फिर भरोसेमंद अफसरों को दिशा निर्देश दे रहे होते हैं, तो हमेशा याद दिलाते हैं कि बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय का ख्याल रखिए.
नीतीश कई बार ये भी कहते हैं कि आप लोगों को मालूम भी है कि इनकी आबादी बिहार की कुल आबादी की एक तिहाई है, हालांकि यह अभी तक रहस्य ही है कि इस वर्ग की आबादी का हिस्सा कितना है.
लेकिन एक मोटा आकलन यह बताता है कि बिहार की आबादी में करीब एक चौथाई आबादी इसी वर्ग की है, इसमें करीब सौ जातियों का समूह है, जिसे नीतीश कुमार ने साधकर ना केवल एकजुट किया बल्कि बीते 14 सालों से बिहार की सत्ता पर इनकी मदद से काबिज रहे.
चाहे वो 2005 रहा हो या फिर 2010 या फिर महागठबंधन के साथ मिलकर 2015 का ही चुनाव रहा हो, महादलितों का साथ नीतीश कुमार को मिलता रहा. 2009 के आम चुनाव में बीजेपी के साथ तो नीतीश कुमार की पार्टी 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हुए थे. 2013 में वे बीजेपी से अलग हुए, वो भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद. 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी को वोट ज़रूर मिला लेकिन वे महज दो सीटों तक सिमट गई.
इसके बाद ही नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाया और 2015 में दोनों का महागठबंधन कामयाब रहा था. तब राष्ट्रीय जनता दल 80 सीटों के साथ बड़ी पार्टी रही थी और जनता दल यूनाइटेड को 71 सीटें मिली थीं. इस प्रयोग के बारे में राजीव रंजन कहते हैं, "तब नीतीश जी की बदौलत ही लालू जी की पार्टी की वापसी हुई थी. हमारी सीटें भी बेहतर होतीं लेकिन कुछ सीटों पर हमें भीतरघात का सामना करना पड़ा था. नहीं तो हमारा स्ट्राइक रेट बेहतर होता."
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "नीतीश कुमार कभी लालू के कद के नेता नहीं बन पाए. लालू मास अपील वाले नेता हैं. नीतीश का उतना अपील कभी नहीं रहा. यही बात नीतीश कुमार को जब तब अखरती रही है. महागठबंधन के टूटने की वजह नीतीश की अपनी यही बैचेनी थी. आप इसे ऐसे भी समझिए कि नीतीश के जूनियर हैं सुशील मोदी जो इनसे अभिभूत रहते रहे हैं. तो दोनों का साथ स्वाभाविक है क्योंकि वहां नीतीश को कोई चुनौती नहीं मिल पाती है."
लव-कुश फ़ैक्टर
हालांकि 2019 में चुनाव से पहले नीतीश कुमार को अपनी जाति कुर्मी और कुशवाहा यानी 'लव-कुश' का करीब 10 फीसदी वोट भी मिलता रहा था.
लेकिन 2019 में कई वजहों से ये माना जा रहा है कि नीतीश कुमार का अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है. एक तो उनके लव-कुश फैक्टर को उपेंद्र कुशवाहा ने सेंध लगाई है. हालांकि इसमें कुशवाहा खुद बड़े पैमाने पर कामयाब नहीं हुए हैं लेकिन हर सीट पर इस वोट बैंक में बिखराव दिखा है.
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "कुशवाहा और यादवों की आपस में जमीनी स्तर पर नहीं बनती है, लेकिन इस बार कुशवाहा और यादव एकसाथ हुए हैं और इसका असर असली नतीजों पर देखने को मिलेगा."
इस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ही महागठबंधन ने भी चार कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं जनता दल यूनाइटेड ने इस बार तीन कुशवाहा उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.
नीतीश कुमार अपनी जाति के उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को केवल नालंदा में टिकट दे पाए. बिहार के चुनाव में यह इकलौता कुर्मी उम्मीदवार है. बावजूद इसके कुर्मियों का वोट नीतीश कुमार को ही मिल रहा है.
नीतीश की पार्टी ने बिहार में अपनी पार्टी की ओर से पांच अत्यंत पिछड़ी जाति के उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है. इस एक कदम से उन्होंने बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय को एक साथ रखने की कोशिश जरूर की है, वहीं महागठबंधन ने चार जगहों पर अत्यंत पिछड़ों को टिकट दिया है.
भाजपा के स्वाभाविक सहयोगी?
असली मुक़ाबला इसी जमात के वोट बैंक को अपने हिस्से में करना है. हालांकि इस जमात में कई लोगों का समर्थन अभी भी नीतीश कुमार के पक्ष में दिखाई पड़ता है. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल की कोशिश इसी वोट बैंक में अपना दायरा बढ़ाने की है.
इसके अलावा नीतीश कुमार को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा है, एक तो 2014 में जब वे अकेले चुनाव लड़े थे तब उन्हें कई जगहों पर मुसलमानों का वोट भी मिला था, लेकिन इस बार उनके बीजेपी के साथ होने के चलते उन्हें मुसलमानों का समर्थन मिल पाया होगा, इसमें संदेह है.
इसके अलावा बिहार में नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति भी बहुत कामयाब नहीं हुई है. एक अच्छी नीयत के साथ शुरू की गई ये योजना पूरी तरह से नाकाम हो गई. शराबबंदी के चलते बिहार की जेलों में भी बड़ी संख्या में लोग हैं.
पटना के आम मतदाता गोपाल चौधरी कहते हैं, "शराबबंदी का आलम तो यह है कि लंबी-लंबी गाड़ी में चलने वाले लोगों के गाड़ी और घर पर शराब पहुंचाई जा रही है और ग़रीब आदमी, रिक्शा ठेला चलाने वाला तुरंत में गिरफ्तार कर लिया जाता है."
नीतीश कुमार के राज्य में बिहार में बिजली, सड़क और पानी की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, ख़ासकर मध्य बिहार के हिस्सों में नीतीश ने कुछ ज़्यादा ध्यान दिया है. लेकिन शासन व्यवस्था अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
नालंदा से महागठबंधन के उम्मीदवार चंद्रवंशी अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार जी के किस सुशासन की बात आप कर रहे हैं, दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं, अपराध कहीं से कम नहीं हुआ है. लेकिन ये मीडिया को दिखता नहीं है."
इन सबके बावजूद नीतीश कुमार बिहार में बीजेपी के स्वभाविक सहयोगी नजर आते हैं. बीजेपी के महासचिव और बिहार राज्य के प्रभारी भूपेंद्र यादव कहते भी हैं, " नीतीश कुमार और बीजेपी का साथ बेहद पुराना और जमीनी स्तर पर काफी मज़बूत है." दरअसल, नीतीश कुमार की अपनी राजनीति बीजेपी से भले अलग दिखने की रही हो लेकिन उनके साथ से बीजेपी बिहार में जीत हासिल करने की स्थिति में पहुंच पाती है.
यही वजह है कि बीजेपी से जब तब नीतीश के नाराज होने की ख़बरें आती रही हों लेकिन बीजेपी अपनी ओर से नीतीश को साथ रखने में भरोसा करती है. इसके लिए पार्टी अपनी जीती हुई पांच लोकसभा की सीटें भी छोड़ देती है. क्योंकि उसे मालूम है कि बिहार में आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन को हराने के लिए उसे नीतीश कुमार का सहारा चाहिए. इसमें नीतीश कुमार का भी फ़ायदा होता रहा है.
नालंदा के युवा राजद अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "नीतीश कुमार खुद अवधिया कुर्मी हैं. उसके मतदाताओं की संख्या नालंदा में भी 15 हज़ार से ज़्यादा नहीं है. आप देखिए केवल इस वोट बैंक के सहारे वे 14 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. बीजेपी की मदद से ही तो वे इस मुकाम तक पहुंचे जहां से कुर्मी ही नहीं बल्कि अत्यंत पिछड़े समुदाय के नेता को तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है."
हालांकि 2019 के चुनाव में बीजेपी- जेडीयू गठबंधन को बढ़त मिलती है तो बिहार में नीतीश कुमार को 2020 के विधानसभा तक कोई चुनौती नहीं मिलेगी. लेकिन अगर इस चुनाव में उनकी पार्टी को कम सीटें मिलीं तो फिर उनके नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे.
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