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मोदी और राहुल के इंटरव्यू में पूछे गए सवालों के मतलब- नज़रिया
- Author, मुकेश कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
अब तक के सबसे कटु चुनाव प्रचार का शोर ख़त्म हो गया है. लेकिन इस शोर-शराबे के लिए केवल नेताओं को दोष देना ठीक नहीं होगा, मीडिया बिरादरी भी इसमें शामिल थी. बल्कि ये कहना ग़लत नहीं होगा कि मीडिया भी इस चुनावी जंग का एक बड़ा किरदार था.
पारंपरिक मीडिया यानी टीवी, रेडियो, प्रिंट हो या फिर सोशल मीडिया, हर मोर्चे पर मीडिया तैनात था. लेकिन क्या वह जनतंत्र के लिए तैनात था, क्या वह सच और अवाम की लड़ाई लड़ रहा था?
अगर इन सवालों पर कोई जनमत सर्वेक्षण हो गया तो मीडिया के लिए बहुत ही शर्मनाक स्थिति बन सकती है. उसके लिए मुँह छिपाना मुश्किल हो जाएगा.
पूरे चुनाव में मीडिया के पक्षपाती रवैए की बात उठती रही. एजेंडा सेटिंग के आरोप लगते रहे. हर तरफ़ से ये आवाज़ गूँजती रही कि वह सत्तापक्ष को बहुत ज़्यादा कवरेज दे रहा है, उसके पक्ष में हवा बनाने की सुपाड़ी उसने ले रखी है. उसका व्यवहार प्रवक्ताओं वाला दिखा.
यही नहीं, विपक्षी दलों और नेताओं के प्रति उसका रवैया शत्रुतापूर्ण रहा. आरोप और भी हैं और बहुत संगीन हैं. अगर पिछले तीन महीनों के मीडिया कॉन्टेंट का विश्लेषण किया जाएगा तो भारतीय मीडिया बुरी तरह बेपर्दा हो सकता है.
इसके लिए पीएम मोदी और बीजेपी को मिले कवरेज के आकार और प्रकार को आधार बनाया जा सकता है. मोदी-शाह की रैलियों, भाषणों और बयानों को कितना महत्व दिया गया और उसका स्वर क्या था, इसका विश्लेषण ही बता देगा कि मीडिया इस चुनाव में किसके साथ खड़ा था और क्या कर रहा था.
इंटरव्यू या प्रचार का हथकंडा?
लेकिन मीडिया कॉन्टेंट का विश्लेषण बड़ा काम है और इसके लिए लंबा समय भी चाहिए. अलबत्ता चुनावकालीन मीडिया के चरित्र को समझने के लिए एक शॉर्ट कट ये हो सकता है कि दो प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं के साक्षात्कारों का ही विश्लेषण कर दिया जाए.
बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी पर ही मीडिया का सबसे ज़्यादा फोकस रहा. एक तो संख्या के लिहाज़ से मोदी राहुल से आगे रहे और दूसरे उन्हें प्रचारित-प्रसारित करने के मामले में भी मीडिया ने ज़्यादा उत्साह दिखाया.
मोदी के इंटरव्यू में प्रतिप्रश्न न के बराबर थे और कहीं थे भी तो उनका उद्देश्य मोदी को परेशान करना नहीं था. उनकी दिनचर्या से जुड़े सवाल पूछना हो या उनकी कविता से.
दो इंटरव्यू, दो रवैया
मोदी के इंटरव्यू पुलवामा, बालाकोट एयर स्ट्राइक और राष्ट्रवाद के इर्द गिर्द ज़्यादा घूमते रहे जो कि बीजेपी की चुनावी रणनीति के हिसाब से बिल्कुल सही था. बेरोज़गारी, कृषि संकट, नोटबंदी आदि मुद्दे या तो उठाए ही नहीं गए या फिर उनका ज़िक्र दिखावटी था.
हास्यास्पद तो ये रहा कि प्रधानमंत्री जब रेडार, डिजिटल कैमरा या ई मेल जैसी चीज़ों पर बात कर रहे थे तो एंकरों के मुँह बंद रहे. वे उन्हें ब्रम्हवाणी मानते हुए ग्रहण करते रहे. इसके लिए उनका मज़ाक भी खूब बनाया गया.
ख़ुद मोदी के वक्तव्य ने जता दिया कि उनके इंटरव्यू देने के पीछ भी एक एजेंडा काम कर रहा था. ये एजेंडा था ये दिखाना कि वे कठिन सवालों का सामना कर सकते हैं. ज़ाहिर है कि वह पूरा नहीं हुआ.
अब मोदी के बरक्स राहुल गाँधी से लिए गए इंटरव्यू को देखिए. आप पाएंगे कि इनमें उन्हें वैसी छूट नहीं दी गई जैसी कि मोदी को बार-बार मिली. राहुल के साथ नरमी बरतना तो दूर, अधिक निर्ममता दिखाई गई.
इस संदर्भ में एक पत्रकार का दोनों नेताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है. मोदी के सामने वे आज्ञाकारी मुद्रा में थे जबकि राहुल पर चढ़ाई करने पर अमादा थे.
आम तौर पर माना जाता है कि जो नेता सत्ता में होता है मीडिया उससे ज़्यादा तीखे सवाल करता है. मगर यहां मामला उल्टा था. सारा दोष राहुल के सिर पर मढ़ा जा रहा था. ये रवैया सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रति निष्ठा और विपक्षी दलों के प्रति शत्रुता प्रदर्शित करता है.
भविष्य के संकेत
राहुल गाँधी का एक इंटरव्यू हिंदी चैनल के एक पत्रकार ने लिया. हालाँकि वो राहुल के प्रति थोड़ा नरम रहे मगर तीखे प्रश्न करने से नहीं चूके.
इन इंटरव्यू से पत्रकारों और मीडिया की साख में कोई इज़ाफ़ा हुआ होगा इसमें भारी संदेह है, क्योंकि आम दर्शक भी आसानी से समझने लगे हैं कि क्या खेल खेला जा रहा है.
इस लिहाज़ से ये समूचे मीडिया के लिए बहुत बुरा था. लोकतंत्र के लिए तो और भी बुरा रहा.
मीडिया ऐसा क्यों कर रहा था, वह दबाव में था या लोभ उसके सिर पर सवार था अथवा ये सभी बातें थीं, इसका अध्ययन और भी दिलचस्प हो सकता है. ये हमे मीडिया के भविष्य के बारे में भी ठोस संकेत दे सकता है.
हालाँकि संकेतों की ज़रूरत भी अब शायद नहीं रह गई है क्योंकि बहुत सारी चीज़ें दीवार पर लिखी इबारतों की तरह साफ़ हैं.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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