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मोदी के प्रस्तावक रहे छन्नूलाल मिश्र के मन में कोई खटास है?
- Author, कुलदीप मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाराणसी से
नरेंद्र मोदी ने जब 2014 लोकसभा चुनाव में वाराणसी से चुनाव लड़ने का पर्चा भरा था तो मशहूर शास्त्रीय गायक पद्म भूषण छन्नूलाल मिश्र उनके प्रस्तावक बने थे.
उन्होंने उम्मीद जताई थी कि इस सरकार को गंगा सफ़ाई और संगीत के मोर्चे पर कुछ बढ़िया काम करके दिखाना चाहिए. प्रधानमंत्री ने उन्हें स्वच्छता अभियान के नवरत्नों में भी चुना था.
लेकिन 2019 का चुनाव आते-आते स्थानीय मीडिया में छन्नूलाल मिश्र की भाजपा से नाराज़गी की ख़बरें छपने लगीं.
क्या नाराज़ थे छन्नूलाल मिश्र?
इन ख़बरों में कहा गया कि वह मौजूदा सरकार की उपेक्षा से खिन्न लग रहे हैं.
उनके प्रशंसकों की उनके लिए भारतरत्न की मांग भी इस सरकार में पूरी नहीं हो पाई.
और इस मौक़े को न गंवाते हुए वाराणसी से कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय छन्नूलाल मिश्र का आशीर्वाद लेने उनके आवास पर पहुंच गए.
अजय राय की पीठ ठोंकते छन्नूलाल की तस्वीरें वाराणसी कांग्रेस के सोशल मीडिया पन्नों से जारी की गईं और इन तस्वीरों को यहां चाय की दुकानों पर उचकती भौहों के साथ देखा गया.
तो क्या वह वाक़ई मोदी सरकार से नाराज़ हैं?
यह पूछने के लिए हम उनसे मिलने पहुंचे. उनका घर वाराणसी में सिगरा थाने के पास छोटी गैबी की एक संकरी सी गली में है.
यहां उन्हें 'गुरुजी' कहा जाता है. घर में एक छोटा-सा कमरा है, जिसके दरवाज़े पर लगी तख़्ती पर 'गुरु मंदिर' लिखा है. एक तरफ़ छोटा सा मंदिर है और दीवारों पर उनकी तीन पूर्व राष्ट्रपतियों, मौजूदा प्रधानमंत्री और कुछ फ़िल्मी सितारों के साथ तस्वीरें लगी हुई हैं.
दीवार पर ही उन्हें 2010 में यूपीए के समय मिले पद्म भूषण और उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के समय मिले यश भारती सम्मान के प्रमाण पत्र भी टंगे हैं.
हमने उनसे सबसे पहले उनकी नज़रों में बनारस का अर्थ पूछा तो उन्होंने कहा, "वरुणा से अस्सी के बीच जो है, वह वाराणसी है. और महत्व यह है कि जहां के संगीत का रस हमेशा बना रहे, वह है बनारस. क्योंकि स्वर, लय और शब्द की रचना भगवान शंकर ने की है."
वह बताते हैं कि 50 बरस पहले जब वह आज़मगढ़ से यहां आकर बसे थे, तब से बनारस बहुत बदला है.
प्रधानमंत्री के बारे में पूछे बिना ही छन्नूलाल मिश्र ने उनकी प्रशंसा की, जिससे लगा कि भाजपा से नाराज़गी की ख़बरों को वह चुनावी मौसम में तूल नहीं देना चाहते.
वो कहते हैं, "मोदी जी ने बहुत काम किया है. यहां की सड़कें चौड़ी हो गईं. मां गंगा की सफ़ाई भी हो रही है."
'हम सबके हैं, सब हमारे हैं'
इस बार वह नरेंद्र मोदी के नामांकन के समय उनके प्रस्तावक नहीं थे. वह कहते हैं कि बार-बार एक ही आदमी को प्रस्तावक नहीं होना चाहिए.
2014 का समय याद करते हुए वह कहते हैं, "जिसने हमें सबसे पहले याद किया, उस पर 'याद' शब्द का उल्टा यानी 'दया' हुई भगवान की और वह विजयी हुए. हम आशीर्वाद दे रहे हैं मोदी जी को."
लेकिन इससे पहले कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को आशीर्वाद देने पर वह कहते हैं, "हमें सभी लोग मानते हैं और हम भी सबको मानते हैं. सभी पार्टियों के नेता लोगों को हम आशीर्वाद देते हैं क्योंकि हमसे सभी लोगों का व्यवहार अच्छा है. हम सबके हैं, सब हमारे हैं."
भाजपा से नाराज़गी के बारे में सीधे पूछा तो उन्होंने कहा, "हमको नाराज़गी नहीं है. हमारे पास अजय राय आए. हम तो कहीं गए नहीं और न ही किसी को बुलाया. वो हमारे शिष्य रह चुके हैं. स्कूल में राजघाट में उन्हें हमने असेम्बली का गाना सिखाया था. "
वह कहते हैं, "पहले जो हमारे पास आएगा, उसे हम आशीर्वाद पहले देते हैं."
हमने पूछा कि प्रधानमंत्री क्या इस बार आशीर्वाद लेने में पिछड़ गए?
इस पर उन्होंने कहा, "उन्होंने भी बुलाया था लेकिन प्रस्तावक रिपीट नहीं होना चाहिए."
विवादित विषयों पर नहीं की टिप्पणी
वाराणसी में इस बार काशी कॉरिडोर की ख़ासी चर्चा है. जिसके निर्माण के लिए घाट के किनारे कई पुराने घर तोड़े गए हैं.
छन्नूलाल मिश्र इस वक़्त बनारस के कला-संगीत क्षेत्र के अहम प्रतिनिधि हैं. हमने समझना चाहा कि घरों को तोड़े जाने से क्या बनारस का मिज़ाज प्रभावित हुआ है?
जवाब में वो कहते हैं, "ये तो मोदी जी जानें कि किस लक्ष्य के साथ उन्होंने ऐसा किया है. मुंडे मुंडे मतर्भिन्न:, यानी जितने लोग हैं, उतने विचार हैं. सबका विचार अपनी जगह सही है."
उनसे उनका विचार पूछा तो वह इस पर सीधा जवाब देने से बचे. उन्होंने कहा, "हम कलाकार हैं और हम इस पर कुछ नहीं कह सकते."
'आज नहीं तो कल देंगे'
लेकिन भारतरत्न न मिलने के सवाल पर भी वह सरकार से शिकायत नहीं करते.
वह कहते हैं, "यह देना-लेना सरकार का काम है. हमारा काम नहीं है. पर हम मांगेंगे नहीं. हम अपने लिए एक शेर कहते हैं- इलाही कोई तमन्ना नहीं ज़माने में/ मैंने सारी उम्र गुज़ारी है अपने गाने में. किसी स्वार्थ की वजह से हम उनका प्रस्तावक नहीं बने थे."
छन्नूलाल मिश्र को उम्मीद है कि अगर दोबारा केंद्र में मोदी सरकार आती है तो उन्हें इस कार्यकाल में भारतरत्न मिल सकता है.
वह कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि अगर मुझे भारतरत्न दिया जाता तो विपक्षी पार्टी कहती कि इनके प्रस्तावक थे इसीलिए दे दिया. मोदी जी के ऊपर बात आती. नहीं दिया तो मुझे कोई चिंता नहीं है. आज नहीं तो कल देंगे."
छन्नूलाल मिश्र ने कैमरा पर एक बार भी केंद्र सरकार से नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की लेकिन एक-दो बार ऐसा लगा कि उनकी बातों में शिकायत का एक मद्धम स्वर ज़रूर है.
वह कहते हैं, "हम भी सोचते हैं कि कोई कारण ज़रूर होगा जिसकी वजह से उन्होंने हमें (भारतरत्न) नहीं दिया. 84 साल हमारी उम्र है. दो-चार साल और चलेंगे. हमने काशी को जीवित रखने के लिए और शहीद बहादुरों के लिए गाना गया है."
'अपने चमन से दूर सही'
अजय राय जब उनके घर पहुंचे थे तो छन्नूलाल मिश्र ने उनके लिए एक शेर पढ़ा था-
अपने चमन से दूर सही लेकिन ये भरोसा है मुझको
जब फूल खिलेंगे गुलशन में तो ख़ुशबू यहां तक आएगी.
स्थानीय ख़बरों में इस शेर के भी कुछ अर्थ निकाले गए. क्या वह कांग्रेस को एक 'दूर का चमन' यानी 'अपनी विचारधारा से अलग' कह रहे थे?
उनसे पूछा तो बोले, "इसका ये मतलब नहीं है. इसका मतलब है कि हम अपने चमन से दूर हैं क्योंकि हम अलग इस कमरे में रहते हैं. पर जब फूल खिलेंगे तो हम तक भी ख़ुशबू आएगी."
वह कहते हैं, "मोदी जी का स्वभाव बहुत अच्छा है. कर्मठ व्यक्ति हैं."
लेकिन क्या 2019 चुनावों से पहले या चुनावों के दौरान उनकी नरेंद्र मोदी से बात हो पाई?
वह कहते हैं, "हम अपने घर में ज़्यादतर समय रहते हैं. जब मोदी जी बनारस आते हैं तो भी हम उनसे मिलने नहीं जाते यह सोचकर कि धक्का खाने कौन जाए. जब वो बुलाएंगे, हमारे जाने की व्यवस्था करेंगे तब हम जा सकते हैं."
'प्रियंका आतीं तो उन्हें भी देते आशीर्वाद'
छन्नूलाल मिश्र प्रधानमंत्री के विकास कार्यों की तारीफ़ करते हुए राजनीतिक हो जाते हैं लेकिन राजनीति के विवादित विषयों पर बोलने से बच जाते हैं.
हिंदुत्व की राजनीति के सवाल पर भी उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की. उन्होंने कहा, "इस विषय में हम नहीं बोल सकते हैं. हिंदू-मुसलमान सब बराबर हैं. हमारे विचार से सब एक हैं."
उनसे पूछा कि अगर कांग्रेस से प्रियंका गांधी वाराणसी से चुनाव लड़तीं तो क्या वह उन्हें आशीर्वाद देते?
वह कहते हैं, "अगर वो हमारे पास आतीं तो हम उन्हें ज़रूर आशीर्वाद देते. लेकिन बिना हमारे पास आए हम किसी को आशीर्वाद नहीं देते. वो आतीं तो क्या होता, ये तो 'होइहैं सोई जो राम रचि राखा' वाली बात है."
'कलाकारों की परवरिश पर ध्यान दे सरकार'
मशहूर वीणावादक पंडित विश्वमोहन भट्ट ने हाल ही में कहा था कि राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों से संगीत बिल्कुल ग़ायब होता है.
छन्नूलाल मिश्र भी इससे असहमत नहीं.
आख़िर में वह सरकार से एक अपील करते हैं जो स्वयं में काफ़ी कुछ कहती है.
वह कहते हैं, "हम बस इतना कहते हैं कि कला और संस्कृति को जीवित रखा जाए और इस पर नेताओं को ध्यान देना चाहिए, हमारी यही प्रार्थना है. हम कोई नौकरी नहीं करते और न किसी के पास कुछ मांगने जाते हैं. लेकिन कलाकार के जीवन की परवरिश कैसे होगी, इस पर अगर सरकार ध्यान देगी तो बहुत अच्छा होगा. "
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