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नीतीश को अपने ही गढ़ नालंदा में मिल रही दमदार चुनौती
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नालंदा से
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने ही गढ़ नालंदा में इस बार विपक्षी महागठबंधन की तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
यह चुनौती कितनी तगड़ी है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार ने हरनौत के मनरेगा भवन के मैदान में करीब पंद्रह सौ लोगों की चुनावी सभा को संबोधित करने के बाद जब पूछा कि "आप लोग हाथ उठाकर कहें, तो उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को जीत का माला पहना दें", इस सवाल के जवाब में लोगों ने कोई बहुत उत्साह नहीं दिखाया. नीतीश कुमार को ये सवाल तीन बार पूछना पड़ा.
दरअसल कौशलेंद्र कुमार, नीतीश कुमार के बेहद खास माने जाते हैं और वे पिछली दो लोकसभा से क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इलाके के कई मतदाताओं का मानना है कि नीतीश जी को इस बार उम्मीदवार बदलना चाहिए था.
लेकिन कौशलेंद्र कुमार अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं. वे दावा करते हैं, "देखिए 2014 में तो हमारा दल अकेले चुनाव लड़ा था लेकिन हम जीते थे. इस बार तो रामविलास पासवान जी भी साथ में हैं, एनडीए है तो कहीं ज़्यादा समर्थन मुझे मिल रहा है."
वहीं इस सीट से महागठबंधन में जीतन मांझी की हम पार्टी के उम्मीदवार चंद्रवंशी अशोक आज़ाद पहली बार चुनाव मैदान में हैं. उनका दावा है कि इस सीट पर उनके सामने कोई चुनौती ही नहीं है क्योंकि स्थानीय समीकरण उनके पक्ष में हैं.
इस बार मुश्किल ज्यादा क्यों
हालांकि नीतीश कुमार के चलते यह इतना आसान नहीं दिखता है. दो बार सांसद रहने के बाद भी कौशलेंद्र कुमार की अपनी कोई पुख्ता पहचान इलाके में नहीं बन पायी है और लोग उनको नीतीश कुमार के प्रतिनिधि के तौर पर ही क्षेत्र से चुनाव जिताते आए हैं.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बार कौशलेंद्र कुमार के लिए मुश्किल इतनी ज़्यादा क्यों हो रही है. इस मुश्किल को भांपते हुए नीतीश कुमार नालंदा में लगातार चार दिन सभा कर चुके हैं और आने वाले दिनों में भी उनकी सभाओं का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है.
इलाके के एक मतदाता ने बताया कि "जब दो-तीन दिन बचेगा तो नीतीश जी तो यहां कैंप भी कर देंगे." पिछली बार भी उन्हें करना पड़ा था. काफी ज़ोर आजमाइश करने के बाद भी 2014 में कौशलेंद्र कुमार दस हज़ार से भी कम वोट से चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे.
तब आरजेडी और राम विलास पासवान की पार्टी का गठबंधन था और यहां से लोजपा के उम्मीदवार को तीन लाख से ज़्यादा वोट मिले थे.
इस बार महागठबंधन में राम विलास पासवान तो नहीं हैं, लेकिन गठबंधन पांच पार्टियों का बना है, जिसके चलते नीतीश कुमार कोई कसर नहीं रहने देना चाहते हैं.
कौशलेंद्र कुमार कहते हैं कि नीतीश जी के सुशासन में क्षेत्र का काफी विकास हुआ है और यही वजह है कि लोग सबकुछ से उठकर उन्हें समर्थन देंगे.
नालंदा के एकंगरसराय, इस्लामपुर, बिहारशरीफ़ और राजगीर जैसे विधानसभाओं में सड़कें गांव-गांव तक पहुंची हुई हैं, बिजली और पानी का संकट भी नहीं है. पहली नज़र में यह इलाका विकसित नज़र आता है.
बावजूद इन सबके नालंदा के चुनाव में सबसे अहम भूमिका जातिगत समीकरणों की ही है. यहां सबसे ज़्यादा मतदाता कुर्मी समुदाय के हैं. नीतीश कुमार और कौशलेंद्र कुमार भी इसी समुदाय के हैं और इनके मतदाताओं की संख्या चार लाख 12 हज़ार है.
बंटता दिख रहा है अति पिछड़ा वोट
लेकिन इन मतदाताओं से जुड़ी एक खास बात स्थानीय कुर्मी नेता बताते हैं, "केवल कुर्मियों के वोट से नीतीश नहीं जीतते रहे हैं, क्योंकि यहां के आधे से ज़्यादा कुर्मी तो पलायन करके दूसरे शहरों में अच्छी नौकरियां कर रहे हैं, और ये जाति इतनी कंजूस होती है कि चुनाव के वक्त लोग खर्च करके अपने घरों को भी नहीं आते. जितनी संख्या है केवल उसके आधे लोग ही चुनाव के दौरान होते हैं."
कुर्मी के साथ-साथ नीतीश कुमार की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह नालंदा के कुशवाहा एवं अति पिछड़े समुदाय को साथ जोड़े रखना रहा है.
लेकिन इस बार उनके इस वोटबैंक में सेंधमारी के लिए ही महागठबंधन ने रणनीतिक तौर पर अति पिछड़े समुदाय कहार जाति के चंद्रवंशी अशोक आजाद को उतारा है. जिसके चलते अति पिछड़ा वोट बंटता हुआ दिख रहा है.
यही वजह है कि कौशलेंद्र कुमार आज़ाद को बाहरी उम्मीदवार बता रहे हैं और इसे अपने प्रचार में खूब अहमियत दे रहे हैं.
आज़ाद नालंदा के नहीं हैं, उनका अपना घर गया है. उन्हें टिकट देने का फैसला लालू प्रसाद यादव का बताया जा रहा है. अशोक आज़ाद कहते हैं, "पिछले 20 सालों से नीतीश कुमार यहां के अति पिछड़ों का हक मारकर बैठे हुए हैं. अब यहां की जनता उनसे अपना हक चाहती है."
अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार विपक्षी नेताओं को जातिवादी कहते हैं लेकिन आपको नालंदा में उनका जातिवाद नज़र आएगा. यहां की सात विधानसभा सीटों में चार उनकी अपनी जाति का है, सांसद अपनी ही जाति का है, राज्यसभा सासंद भी उनकी ही जाति का है."
हालांकि नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू की और इलाके के लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री होने की वजह से ही इलाके में काफी काम हुए हैं, इस पर भी अशोक आज़ाद कहते हैं, "कैसा सुशासन. दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं. एक अति पिछड़ा को दौड़ा-दौड़ा कर आठ गोली मारी गई है."
महागठबंधन के उम्मीदवार को आरजेडी के वोट बैंक का पूरा समर्थन मिलने का भरोसा है. यादवों की संख्या तीन लाख के करीब है, जिन्हें आरजेडी का मतदाता बताया जा रहा है. मुसलमानों की संख्या एक लाख 60 हजार है. मुसलमानों ने 2014 में नीतीश कुमार के पक्ष में भी वोट किया था.
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे. इस बार बीजेपी के साथ होने से मुसलमानों का समर्थन उन्हें मिल पाएगा, इसमें संदेह दिख रहा है.
जातीय जोड़तोड़ और वोट बैंक में सेंध
नालांदा के युवा राजद जिला अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "महागठबंधन पांच पार्टियों का गठबंधन है और हम सब लोग एकजुट होकर आज़ाद जी को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं."
लेकिन नीतीश कुमार के पक्ष में खास बात यह है कि सवर्ण और बनिया समुदाय को मिलाकर भी यहां तीन लाख के करीब मतदाता हैं जिनका समर्थन जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार को मिल रहा है.
वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मांझी, रविदास और बेलदार जैसे समुदाय का समर्थन दिख रहा है, इन सबकी संख्या भी ढाई लाख के करीब है.
जातीय जोड़तोड़ और वोट बैंक में सेंध लगाने का काम चुनाव से ठीक पहले वाले दिन तक चलेगा. कौशलेंद्र कुमार के पास कम से कम दो चुनाव प्रबंधन करने का अनुभव है जबकि आज़ाद ने अभी राजनीतिक तौर पर पहला कदम भी रखा है.
कौशलेंद्र कुमार अनुभव के मामले में तो बीस हैं ही, साथ ही इलाके की सात विधानसभा में पांच में उनके विधायक हैं, लिहाज़ा चुनाव प्रचार भी ज़्यादा संगठित तौर पर दिख रहा है.
प्रतिष्ठा का सवाल
यह सीट नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा का सवाल भी है, लिहाज़ा वे इलाके में कहीं ज़्यादा समय देकर लोगों की नाराज़गी को दूर करने की कोशिशों में भी जुटे हैं. मोदी सरकार के उपलब्धियों और राष्ट्रवाद को भी मुद्दा बनाया जा रहा है.
इलाके में चुनावी सभा करने पहुंचे राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी महागठबंधन को मिलावटी बताते हुए कहा कि नालंदा को लोगों को नरेंद्र मोदी- नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा बनाए रखना चाहिए.
लेकिन नालंदा में सबसे बड़ा मुद्दा नीतीश कुमार ही हैं.
उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि नालंदा की पहचान नीतीश कुमार हैं, स्थानीय लोग मानते हैं कि नीतीश ने इलाके को पहचान दिलाई है, लिहाज़ा नाराज़गी के बाद भी वोट उन्हें ही करेंगे.
उनके अपने पैतृक गांव कल्याण बिगहा में एक युवा ने कहा, "बीस महीने जब उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ा था, तो हम लोगों को समझ ही नहीं आया था कि ये क्या हो गया. लेकिन ठीक है, वो जहां जाएंगे हमलोग उनके साथ ही हैं."
वहीं एक दूसरे युवा ने कहा, "नीतीश-मोदी जी राष्ट्रवाद और मज़बूत सरकार की बात कर रहे हैं, लेकिन बताइए युवाओं के लिए क्या कर रहे हैं. नौकरियां लगातार कम हो रही हैं और यह इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है."
दूसरी ओर महागठबंधन की कोशिश नीतीश को उनके गढ़ में ही घेरने की है. यही वजह है कि इस सीट पर चुनाव प्रचार के लिए पहली बार तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव एक साथ निकले.
अपना चुनाव क्षेत्र काराकाट को छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा ने भी यहां चुनावी सभाएं की हैं और मुकेश साहनी भी प्रचार कर रहे हैं. लेकिन इन सबके सामने चुनौती उस किले को भेदने की है जो नीतीश कुमार ने लव कुश के साथ सवर्ण और अति पिछड़ा समुदाय को जोड़कर तैयार किया है.
नीतीश कुमार के पाला बदलने से यह दरका ज़रूर है लेकिन अभी भी मज़बूत दिख रहा है. एकंगरसराय में ढाबे चलाने वाले एक शख्स ने कहा, "कौशलेंद्र को लेकर यहां नाराज़गी तो है. वे हार भी सकते थे अगर महागठबंधन ने यहां कोई दमदार उम्मीदवार मैदान में उतारा होता तब."
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